भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2363

346 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/123-131 ] अनुवाद-महाप्रभुको भगवान् श्रीजगन्नाथकी चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला और मसाला-रहित विशेष पानका बीड़ा महोत्सवमें मिला था॥123॥ अनुभाष्य-‘छुटा-पान-बिड़ा,’-मसाला आदि सामग्रीसे रहित अन्य प्रकारका ताम्बुल (पान)॥123॥ श्रीरघुनाथके द्वारा प्रतिदिन मालाकी सेवा :- सेइ माला, छुटा-पान प्रभु ताँरे दिला। 'इष्टदेव' करि' माला धरिया राखिला॥ 124 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको वह माला और पानका बीड़ा प्रदान किया और श्रीरघुनाथ भट्टने उस तुलसी-मालाको अपना 'इष्टदेव' मानकर रख लिया॥ 124 ॥ वृन्दावनमें आकर श्रीरूप-सनातनके साथमें रहना :- प्रभुर ठाञि आज्ञा लञा गेला वृन्दावने। आश्रय करिला आसि' रूप-सनातने ॥ 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुसे अनुमति लेकर श्रीरघुनाथ भट्ट वृन्दावन चले गये। उन्होंने वृन्दावन पहुँचकर श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामीका आश्रय ग्रहण किया॥ 125 ॥ श्रीरूपप्रभुके निकट रूपानुगवर श्रीरघुनाथके द्वारा भागवत-पाठ :- रूप-गोसाञिर सभाय करेन भागवत-पठन। भागवत पड़िते प्रेमे आउलाय ताँर मन ॥ 126 ॥ श्रीरघुनाथमें अष्टसात्त्विक भाव :- अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते। नेत्र रोध करे वाष्प, ना पारेन पड़िते ॥ 127 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीरूप गोस्वामीके सान्निध्यमें श्रीमद्भागवतका पाठ करने लगे। श्रीमद्भागवतको पढ़ते समय उनका मन प्रेममें व्याकुल हो जाता। भागवतका पाठ करते समय महाप्रभुकी कृपासे उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी धारा, शरीरमें कम्पन और कण्ठ गद्गद हो जाता। नेत्रोंमें अश्रु भर जानेके कारण दिखना बन्द होनेपर वे श्रीमद्भागवतको पढ़ नहीं पाते थे॥ 126-127 ॥ अनुभाष्य- 'आउलाय,'-अलग्न, शिथिल, आकुल, अस्थिर, उन्मत्त होना ॥ 126 ॥ अतीव मधुर कण्ठवाले श्रीभट्टगोस्वामी :- पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एकश्लोक पड़िते फिराय तिन-चारि राग ॥ 128 ॥ श्रीकृष्ण-स्मरणमें आत्मविस्मृत श्रीरघुनाथ :- कृष्णेर सौन्दर्य-माधुर्य यबे पड़े, शुने। प्रेमेते विह्वल तबे, किछुइ ना जाने ॥ 129 ॥ अनुवाद-कोयलके स्वरकी भाँति उनका मधुर कण्ठ था, उसपर भी वे अनेक प्रकारके रागोंमें अलाप करते थे। वे श्रीमद्भागवतके एक-एक श्लोकको तीन-चार प्रकारके रागोंमें पढ़ते थे। वे जब भी श्रीकृष्णके सौन्दर्य और माधुर्यके विषयमें पढ़ते अथवा सुनते, वे प्रेममें भाव-विभोर हो जाते, उन्हें अन्य किसी वस्तुका ज्ञान ही नहीं रहता ॥ 128-129 ॥ एकमात्र श्रीगोविन्दमें समर्पित प्राण श्रीरघुनाथ :- गोविन्द-चरणे कैला आत्मसमर्पण। गोविन्द-चरणारविन्द-याँर प्राणधन ॥ 130 ॥ अपने शिष्यके द्वारा श्रीगोविन्द-मन्दिर और विग्रहके आभूषणादिका निर्माण :- निज शिष्ये कहि' गोविन्देर मन्दिर कराइला। वंशी, मकर, कुण्डलादि 'भूषण' करि' दिला ॥ 131 ॥ अनुवाद-उन्होंने भगवान् श्रीगोविन्ददेवके श्रीचरणकमलोंमें आत्मसमर्पण कर दिया था। भगवान् श्रीगोविन्ददेवके चरणकमल ही उनके प्राणधन थे। उन्होंने अपने शिष्यसे कहकर भगवान् श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर बनवाया। उन्होंने श्रीगोविन्ददेवके लिये वंशी,