भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2362

[ 13/113-123 तेरहवाँ अध्याय 345 [अर्थात् “हे मुने! जगत्में लौकिकी अथवा वैदिकी जो समस्त क्रियाएँ की जाती हैं, भक्तिको प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्ति उन समस्त क्रियाओंका हरिसेवाके अनुकूलरूपमें ही अनुष्ठान करेंगे।”] व्याकरणके ज्ञाता अवैष्णवसे भागवतको पढ़नेपर जड़ीय काव्यग्रन्थका ही पाठ-श्रवण होता है; क्योंकि ऐसे समस्त पाठक स्वयं ही भागवतके तात्पर्यको समझनेमें समर्थ नहीं होनेके कारण संसार भोग करते हैं, तो वे अन्योंको किस प्रकार अनर्थोंसे मुक्त करानेमें समर्थ होंगे? महाभागवत वैष्णवगण-गृह-बन्धनसे मुक्त होते हैं, इसलिये वे स्वयं ही 'भागवत' होनेके कारण भागवतके वास्तविक अर्थको जाननेवाले और भक्तिके प्रभावसे संसारसे मुक्त हैं॥ 113 ॥ श्रीभट्टको विदायी देना, महाप्रभुके विरहमें श्रीभट्टका क्रन्दन :- आलिङ्गन करि' प्रभु विदाय ताँरे दिला। प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला॥ 115 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथ भट्ट भावी विरहके कारण प्रेमके अभिभूत होकर रोने लगे॥ 115 ॥ भक्तोंसे आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथका काशीमें आगमन :- स्वरूप-आदि भक्त-ठाञि आज्ञा मागिया। वाराणसी आइला भट्ट प्रभुर आज्ञा पाञा॥ 116॥ काशीमें वैष्णव पण्डितसे भागवतका अध्ययन :- चारिवत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैला। वैष्णव-पण्डित-ठाञि भागवत पड़िला॥ 117॥ पिता-माताकी धाम-प्राप्तिके बाद विरक्त होकर पुनः महाप्रभुके निकट पुरीमें आगमन :- पिता-माता काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाञि आइला गृहादि छाड़िया॥ 118॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंसे भी वाराणसी (काशी) जानेकी अनुमति माँगी। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरघुनाथ भट्ट वाराणसी आ गये। उन्होंने चार वर्षोँ तक अपने घरमें रहकर माता-पिताकी सेवा की और एक वैष्णव पण्डितसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया। अपने माता-पिताके काशीमें देह-त्यागनेके पश्चात् वे विरक्त होकर पुनः अपना घर त्यागकर महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये॥ 116-118॥ पहलेकी भाँति श्रीरघुनाथका आठ मास तक रहनेके बाद महाप्रभुके द्वारा व्रजमें श्रीरूप-सनातनका सङ्गी बननेका आदेश :- पूर्ववत् अष्टमास प्रभु-पाश छिला। अष्टमास रहि' पुनः प्रभु आज्ञा दिला॥ 119॥ “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याञा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ 120॥ वृन्दावनमें नित्यकृत्य कर्त्तव्यका उपदेश :- भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण-भगवान्॥”121॥ अनुवाद-वे पहलेकी भाँति महाप्रभुके पास आठ मास तक रहे। आठ मास रहनेके पश्चात् महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ भट्टको आज्ञा दी,-“हे रघुनाथ! तुम वृन्दावन जाओ। वहाँ जाकर तुम रूप-सनातनके सान्निध्यमें रहना। तुम भागवत पढ़ना और सदैव कृष्णनामका जप-कीर्तन करना, भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुमपर कृपा करेंगे॥”119-121॥ महाप्रभुका कृपालिङ्गन; श्रीरघुनाथकी कृष्णप्रेम-मत्तता :- एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेमे मत्त हैला॥ 122॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे वे कृष्णप्रेममें मत्त हो गये॥ 122॥ जपके लिये तुलसी-माला आदि प्रदान :- चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर माला। छुटा-पान-बिड़ा महोत्सवे पाञाछिला॥ 123॥