श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंथी और उन्हें अपनी विद्याका अभिमान भी था। सर्वज्ञ भगवान् महाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जानते थे॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति-वाञ्छा और विद्या-गर्व-इन दो दोषोंने रामदासको 'शुद्धवैष्णव' बनने नहीं दिया॥110॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। रामदासके द्वारा काव्य-शास्त्र-अध्यापन :- रामदास कैला तबे नीलाचले वास। पट्टनायक-गोष्ठीके पड़ाय 'काव्यप्रकाश' ॥111॥ अनुवाद-तब रामदास विश्वास जगन्नाथ पुरीमें ही वास करने लगे। वे वहाँ पट्टनायक-परिवारको (श्रीभवानन्द रायकी सन्तानोंको) 'काव्य-प्रकाश' पढ़ाते थे॥111॥ अनुभाष्य- 'पट्टनायक-गोष्ठीके', -भवानन्दकी सन्तानोंको ॥ 111॥ श्रीरघुनाथको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा संसारमें प्रवेश करनेमें अनिच्छुक और अप्रविष्ट साधकोंको उनके अपने स्थानपर रहकर स्त्रीसङ्गके द्वारा इन्द्रियसुखकी स्पृहापर आधारित अत्याहार, प्रयास अथवा लौल्यादिका निषेध :- अष्टमास रहि' प्रभु भट्टे विदाय दिला। “विवाह ना करिह” बलि' निषेध करिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ पुरीमें आठ मास रहनेके बाद श्रीरघुनाथ भट्टको महाप्रभुने विदायी दी और “विवाह मत करना”-उन्हें ऐसा कहकर निषेध किया॥112॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुने रघुनाथभट्टको संसारमें प्रवेश करनेसे पूर्व ही कृष्ण-परायण होते देखकर उन्हें 'अत्याहार'रूप विवाह करके भोगोंके स्थान मायामय संसारमें प्रवेश करनेसे निषेध किया। विषयी पत्नी-परायण सांसारिक लोग गृहव्रत-धर्मको अपनाकर भोक्ता पुरुषाभिमान और भोगबुद्धिके वशीभूत होकर अधिकांश कृष्णसेवाविमुख हो जाते हैं, इसलिये उनकी हरिभक्तिकी सम्भावना बहुत कम होती है॥ 112 ॥ काशीमें जाकर वैष्णवोंकी सेवा करनेका आदेश एवं अनर्थमुक्त श्रीकृष्णसुखतत्पर भागवतसे ही श्रीकृष्णकी सेवाके लिये चिन्मय-भागवत अध्ययन करनेका आदेश :- “वृद्ध माता-पितार याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन ॥ 113 ॥ पुरीमें एकबार आनेका आदेश; कण्ठमाला-प्रसाद देना :- पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।” एत बलि' कण्ठमाला दिला ताँर गले ॥ 114 ॥ अनुवाद- “तुम काशी जाकर अपने वृद्ध [वैष्णव] माता-पिताकी सेवा करना और किसी वैष्णवसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन करना तथा तुम एकबार पुनः नीलाचलमें आना।” ऐसा कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उतारकर उनके गलेमें डाल दी॥113-114॥ अनुभाष्य-इस स्थानपर जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्य श्रीरघुनाथ भट्टको उपलक्ष्य करके साधकको एकान्तिक परमगौरभक्त वैष्णव पिता-माताको अपनी हरिसेवाके अनुकूलरूपमें सेवा करनेके लिये ही आदेश दिया है; कृष्णभजनके इच्छुक साधकमात्रको ही हरि-गुरु-वैष्णव- विमुख पिता-माताकी सेवा करनेका आदेश नहीं दिया। इस प्रसङ्गमें निम्नलिखित दो श्लोक विचारणीय हैं, (भाः 5/5/18)- “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यात् न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्॥” [अर्थात् “भगवद्-सम्बन्धज्ञानके उपदेशके द्वारा जो सामने उपस्थित मृत्युरूपी संसारसे उद्धार नहीं करवा पाते, वे-‘गुरु’ नहीं हैं, वे-‘स्वजन’ नहीं हैं, वे-‘पिता’ नहीं हैं, वे-‘माता’ नहीं हैं, वे-‘देवता’ नहीं हैं, वे-‘पति’ नहीं हैं।”] और (भःरःसिः पूःविः 2/200)- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥”