भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2360, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2360

[ 13/100-110 तेरहवाँ अध्याय 343 दण्डवत् प्रणाम करते हुए लेट गये। महाप्रभुने—'ओह ! रघुनाथ'—कहकर उनका आलिङ्गन किया॥ 100-101 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी प्रणति-ज्ञापन, भगवान्‌के द्वारा अपने भक्तोंकी कुशलताकी जिज्ञासा :— मिश्र आर शेखरेर दण्डवत् जानाइला। महाप्रभु ताँ-सबार वार्त्ता पुछिला ॥ 102 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेकी आज्ञा और अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण :— “भाल हइल आइला, देख 'कमललोचन'। आजि आमार एथा करिबा प्रसाद भोजन॥” 103 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी ओरसे महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उनका समाचार पूछा और कहा,—“अच्छा हुआ कि तुम यहाँपर आये। अब तुम कमलनयन भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करो। आज तुम मेरे यहाँपर ही प्रसादका सेवन करना॥” 102-103 ॥ अनुभाष्य—'मिश्र आर शेखरेर',—तपनमिश्र और चन्द्रशेखरका ॥ 102 ॥ वासस्थान-प्रदान और श्रीस्वरूपादि भक्तोंके साथ मिलन :— गोविन्देरे कहि' एक वासा देओयाइला। स्वरूपादि भक्तगण-सने मिलाइला ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको कहकर श्रीरघुनाथ भट्टके रहनेकी व्यवस्था करवा दी और उनको श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंसे भी मिलवाया॥ 104 ॥ आठ मास तक महाप्रभुके साथमें रहना और महाप्रभुकी स्नेहरूपी कृपाकी प्राप्ति :— एइमत प्रभु-सङ्गे रहिला अष्टमास। दिने दिने प्रभुर कृपा बाड़ये उल्लास ॥ 105 ॥ श्रीरघुनाथका अपने वासस्थानपर महाप्रभुको निमन्त्रण :— मध्ये मध्ये महाप्रभुर करेन निमन्त्रण। घर-भात करेन, आर विविध व्यञ्जन ॥ 106 ॥ अमृतको भी निन्दित करनेवाले नैवेद्य बनानेकी विद्यामें पारदर्शी श्रीरघुनाथ :— रघुनाथ भट्ट—पाके अति सुनिपुण। येइ रान्धे, सेइ हय अमृतेर सम ॥ 107 ॥ भट्ट गोस्वामीको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :— परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन। प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण ॥ 108 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट आठ मास तक महाप्रभुके सङ्गमें रहे। दिन-प्रतिदिन महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करनेके कारण उनका उल्लास वर्धित होता गया। वे बीच-बीचमें महाप्रभुको निमन्त्रण करते और वे स्वयं ही घरपर चावल तथा विविध व्यञ्जन बनाते। वे पाककलामें अति सुनिपुण थे। वे जो कुछ भी पकाते थे, वही अमृतके समान बनता था। महाप्रभु उनके द्वारा बनाये गये भोजनको बहुत सन्तुष्ट होकर ग्रहण करते थे। महाप्रभुका उच्छिष्ट ही उनका भोजन होता था॥ 105-108 ॥ रामदासके साथ साक्षात्कार होनेपर भी अन्तर्यामी महाप्रभुकी उसके प्रति उदासीनता :— रामदास यदि प्रथम प्रभुरे मिलिला। महाप्रभु अधिक ताँरे कृपा ना करिला ॥ 109 ॥ अनुवाद—जब रामदास विश्वास महाप्रभुसे पहली बार मिले, तब महाप्रभुने उनपर अधिक कृपा नहीं की॥ 109 ॥ उदासीनताका कारण :— अन्तरे मुमुक्षु तैं हो, विद्या-गर्ववान्। सर्वचित्त-ज्ञाता प्रभु—सर्वज्ञ भगवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद—रामदास विश्वासके हृदयमें मुक्तिकी कामना