श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें342 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/92–101 ] अध्यापक, परम-वैष्णव और भगवान् श्रीरघुनाथके उपासक थे॥92॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परमवैष्णव',—जो हृदयमें 'मुमुक्षु' अर्थात् मोक्षकी कामना रखते हैं, उनकी गणना शुद्धवैष्णवोंमें नहीं होती। वास्तवमें रामके उपासक होनेपर रामदासको 'वैष्णवप्राय' कहा जा सकता है। किन्तु उन दिनों शुद्ध-वैष्णवोंकी श्रेणीमें भेद करनेमें अधिकांश लोग ही अयोग्य थे, इसलिये कायस्थकुलमें उत्पन्न रामदास भी जगत्में 'परमवैष्णव'के रूपमें विख्यात थे॥92॥ अनुभाष्य—'काव्यप्रकाश',—मन्मथभट्टके द्वारा विरचित अपने नामसे विख्यात एक विशेष अलङ्कार-ग्रन्थ॥92॥ अष्टप्रहर रामनाम जपेन रात्रिदिने। सर्व त्यजि' चलिला जगन्नाथ-दरशने॥93॥ अनुवाद—रामदास विश्वास रात-दिन आठों प्रहर रामनामका जप करते थे। वे अपना सब कुछ त्यागकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥93॥ रामदासके द्वारा श्रीरघुनाथभट्ट प्रभुकी सेवा :- रघुनाथ-भट्टेरे सने पथेते मिलिला। भट्टेर झालि माथे करि' बहिया चलिला॥94॥ नानासेवा करि' करे पादसम्वाहन। ताते रघुनाथेर हय सङ्कुचित मन॥95॥ उन पण्डितके द्वारा की जानेवाली सेवाको ग्रहण करनेमें श्रीरघुनाथको आपत्ति :- “तुमि बड़ लोक, पण्डित, महाभागवत। सेवा ना करिह, सुखे चल मोर साथ॥” 96॥ अनुवाद—वे जब मार्गमें श्रीरघुनाथ भट्टसे मिले, तब वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोलीको अपने सिरपर ढोकर चलने लगे। वे उनकी अनेक प्रकारकी सेवाएँ करते, यहाँ तक कि वे उनके श्रीचरण भी दबाते थे। उनके द्वारा ऐसा करनेपर श्रीरघुनाथ भट्टके मनमें सङ्कोच होता था। इसलिये उन्होंने रामदास विश्वाससे कहा,—“आप बड़े व्यक्ति, विद्वान और महाभागवत हैं। आप मेरी सेवा मत कीजिये, मेरे साथ केवल सुखसे चलिये॥”94-96॥ रामदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति और वैष्णव-ब्राह्मणके दास्यमें आनन्द :- रामदास कहे,—“आमि शूद्र अधम! 'ब्राह्मणेर सेवा',—एइ मोर निज-धर्म॥97॥ सङ्कोच ना कर तुमि, आमि—तोमार 'दास'। तोमार सेवा करिले हय हृदय उल्लास॥”98॥ अनुवाद—रामदास विश्वासने कहा,—“मैं अधम शूद्र हूँ! 'ब्राह्मणोंकी सेवा'—यही मेरा निज-धर्म है। मैं आपका दास हूँ, इसलिये आप किसी प्रकारसे सङ्कोच मत कीजिये। आपकी सेवा करनेसे मेरे हृदयमें उल्लास होता है॥”97-98॥ रामदासके द्वारा निरन्तर रामनाम-जप :- एत बलि' झालि वहेन, करेन सेवने। रघुनाथेर तारकमन्त्र जपेन रात्रिदिने॥99॥ अनुवाद—यह कहकर वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोली वहन करके चलने लगे और उनकी अन्य सेवाएँ भी करने लगे। वे रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथके तारकमन्त्रका जप करते रहते॥99॥ श्रीरघुनाथका पुरीमें आगमन और महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एमते रघुनाथ आइला नीलाचले। प्रभुर चरणे याञा मिलिला कुतूहले॥100॥ दण्ड-प्रणाम करि' भट्ट पड़िला चरणे। प्रभु 'रघुनाथ' बलि' कैला आलिङ्गने॥101॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीजगन्नाथ पुरीमें आ पहुँचे। वे महाप्रभुके श्रीचरणोंमें उपस्थित होकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और उनके चरणोंमें