भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2358, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2358

[ 13/84-92 तेरहवाँ अध्याय 341 अनुवाद—'स्त्री'-शब्दको सुनते ही महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और वे उसी पथसे पुनः लौटने लगे॥ 84 ॥ स्त्रीका स्पर्श अथवा सङ्ग—आचार्य अथवा प्रचारककी मृत्युका कारण, इसलिये सब प्रकारसे परित्यज्य होनेके कारण श्रीगोविन्दके पास कृतज्ञता प्रकाशित करनेके छलसे शिक्षा-प्रदान :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, आजि राखिला जीवन। स्त्री-परश हैले आमार हइत मरण॥ 85 ॥ श्रीगोविन्दका नहीं चुकाया जा सकनेवाला ऋण, शरणागत श्रीगोविन्दका श्रीजगन्नाथको ही रक्षक-मानना :- ए-ऋण शोधिते आमि नारिमु तोमार।” गोविन्द कहे,—“जगन्नाथ राखेन, मुइ कोन् छार?” 86॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे गोविन्द, आज तुमने मेरा जीवन बचा लिया। यदि मैं स्त्रीको स्पर्श कर लेता, तो निश्चित ही मेरी मृत्यु होती। मैं तुम्हारे इस ऋणको कभी भी चुका नहीं पाऊँगा।” श्रीगोविन्दने कहा,—“भगवान् श्रीजगन्नाथने आपकी रक्षा की है, मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति कैसे आपकी रक्षा कर सकता है?” 85-86॥ महाप्रभुका श्रीगोविन्दको सब समय साथमें रहनेके लिये अनुरोध :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, मोर सङ्गे रहिबा। याँहा ताँहा मोर रक्षाय सावधान हइबा॥” 87॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—'हे गोविन्द! तुम निरन्तर मेरे साथ ही रहना। इधर-उधर कहीं भी कुछ अनिष्ट होनेका भय है, इसलिये तुम सदा सावधानीसे मेरी रक्षा करना॥” 87॥ संवाद श्रवण करके और महाप्रभुकी अवस्थाका स्मरण करके श्रीस्वरूप आदिको आशङ्का :- एत बलि' लेउण्टि' प्रभु गेला निज-स्थाने। शुनि' महा-भय पाइला स्वरूपादि मने॥ 88 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु लौटकर अपने वासस्थानपर आ गये। इस घटनाको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके मनमें बहुत भय हुआ॥ 88 ॥ श्रीरघुनाथ भट्टगोस्वामीका वृत्तान्त; उनकी आकुमार नैष्ठिक ब्रह्मचारी अथवा बृहद्व्रती-लीला :- एथा तपनमिश्र-पुत्र रघुनाथ-भट्टाचार्य। प्रभुरे देखिते चलिला छाड़ि' सर्व कार्य॥ 89 ॥ अनुवाद—इधर श्रीतपन मिश्रके पुत्र श्रीरघुनाथ-भट्टाचार्य अपने समस्त कार्योंको छोड़कर महाप्रभुके दर्शनके लिये चल पड़े॥ 89 ॥ सेवकके साथ श्रीरघुनाथकी गौड़से होते हुए पुरीकी यात्रा :- काशी हैते चलिला तँहो गौड़-पथ दिया। सङ्गे सेवक चले ताँर झालि साजाञा॥ 90॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्ट काशीसे जगन्नाथपुरीके लिये गौड़देशसे होकर जानेवाले मार्गसे चल पड़े। उनके साथ एक सेवक उनके सामानकी झोलीको उठाकर चल रहा था॥ 90 ॥ मार्गमें पुरी जा रहे रामदास-विश्वाससे मिलन :- पथे तारे मिलिला विश्वास-रामदास। विश्वासखानार कायस्थ तेंहो राजार विश्वास॥ 91 ॥ अनुवाद—उनको मार्गमें रामदास विश्वास मिले। कायस्थ जातिके रामदास विश्वास गौड़देशके राजाके हिसाब-कार्यालयमें कार्य करते थे॥ 91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वासखानार कायस्थ,'—गौड़ेश्वरके हिसाब (आय-व्ययका विवरण रखनेवाले) कार्यालयको 'विश्वासखाना' कहा जाता था; कायस्थ लोग ही वहाँ कार्य करते थे, क्योंकि वे राजाके विश्वासपात्र थे॥ 91 ॥ रामदास-रामानन्दी-सम्प्रदायके अन्तर्गत दीक्षित (रामायेत्) :- सर्वशास्त्रे प्रवीण, काव्यप्रकाश-अध्यापक। परमवैष्णव, रघुनाथ-उपासक॥ 92 ॥ अनुवाद—वे समस्त शास्त्रोंमें प्रवीण, काव्यप्रकाशके

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