श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें354 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/24-30 ] और वह अपना एक पैर महाप्रभुके कन्धेपर रखकर जगन्नाथजीके दर्शन करने लगी ॥ 24 ॥ यह देखकर श्रीगोविन्दके द्वारा उस स्त्रीको मना करना :- देखिया गोविन्द व्यस्ते सेइ स्त्रीरे वर्जिला। तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीगोविन्दने तुरन्त उस स्त्रीको ऐसा करनेसे मना किया। किन्तु महाप्रभुने श्रीगोविन्दको उस स्त्रीको नीचे उतारनेके लिये मना किया ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गरुड़के ऊपर चढ़नेसे वैष्णवापराध और महाप्रभुके कन्धेके ऊपर पैर रखनेसे भगवान्के चरणकमलोंमें अपराध—इस आशङ्कासे शीघ्रतापूर्वक गोविन्दने उस स्त्रीको मना किया अर्थात् उसे नीचे उतार दिया ॥ 25 ॥ कृष्णदर्शनके द्वारा कृष्णके सेवासुखका विधान करने हेतु स्त्री-मूर्तिको अप्राकृत कृष्णभक्त मानना :- “'आदिवस्या' एइ स्त्रीरे ना कर वर्जन। करुक यथेष्ठ जगन्नाथ-दरशन ॥” 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा, —“दर्शनके लिये अतिव्यग्र इस स्त्रीको ऐसा करनेसे मत रोको, उसे जी भरकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करने दो॥” 26 ॥ अनुभाष्य—'आदिवस्या',—अन्त्यलीला 10/116 संख्या देखें ॥ 26 ॥ उस स्त्रीका तत्क्षणात् नीचे उतरना और महाप्रभुको प्रणाम करके अपनी दैन्यरूपी उक्तिका ज्ञापन :- आस्ते-व्यस्ते सेइ नारी भूमेते नामिला। महाप्रभुरे देखि' ताँर चरण वन्दिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीको अपने कियेका जब ज्ञान हुआ, तब वह तुरन्त ही नीचे उतर गयी और उसने महाप्रभुको देखकर उनके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 27 ॥ उसकी प्रेम भरी उत्कण्ठाको देखकर उसे गुरु मानकर महाप्रभुके द्वारा दैन्यपूर्वक स्तुति :- तार आर्त्ति देखि' प्रभु कहिते लागिला। “एत आर्त्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला ! ! 28 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीकी भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठा देखकर महाप्रभु कहने लगे, —“मुझे भगवान् जगन्नाथने अपने दर्शनके लिये इतना आग्रह प्रदान नहीं किया ! ! 28 ॥ अनुभाष्य—'आर्त्ति',—दर्शनका आग्रह; जगन्नाथके दर्शनके आग्रहके कारण [उस स्त्रीने] हित-अहितके विचारसे रहित होकर परम-वन्दनीय महाप्रभुके उत्तम अङ्गपर अनजानेमें चरण रखा था ॥ 28 ॥ इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णके सेवकको 'स्त्री-पुरुषादि' रूपी बाह्य परिचयसे देखनेके निषेधकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे आविष्ट इहार तनु-मन-प्राणे। मोर स्कन्धे पद दियाछे, ताहा नाहि जाने ॥ 29 ॥ अनुवाद—इस स्त्रीके देह-मन और प्राण भगवान् श्रीजगन्नाथमें इतने आविष्ट हैं कि इसे यह तक भी पता नहीं चला कि इसने मेरे कन्धेपर अपना पैर रखा है॥ 29 ॥ अहो भाग्यवती एह, वन्दि इहार पाय। इहार प्रसादे ऐछे आर्त्ति आमार वा हय ! ! 30 ॥ अनुवाद—अहो ! यह परम सौभाग्यशालिनी है, मैं इसके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। मुझमें भी इसकी कृपासे ऐसी उत्कण्ठा उत्पन्न हो ! ! 30 ॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु विचार कर रहे हैं कि यदि उस स्त्रीके समान मेरा आवेश हो, तो मेरा जीवन धन्य हो जाय। ऐसा ही आवेश जीवनका प्रयोजन होना चाहिये। इसे सिखलानेके लिये महाप्रभुने कहा कि श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये उस स्त्रीमें इतना आवेश आ