श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2370, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/16-24 चौदहवाँ अध्याय 353 अमृतप्रवाह भाष्य—मोहनाख्य-भावकी किसी प्रकारकी अवस्थामें भ्रमकी आभा होनेपर 'वैचित्री'-नामक दिव्योन्मादका उदय होता है। उद्घूर्णा और चित्रजल्पादि—दिव्योन्मादके बहुतसे विशेष भेद हैं॥ 16॥ अनुभाष्य— कामपि (अनिर्वचनीयां) गतिम् (अवस्थाम्) उपेयुषः (प्राप्तस्य) सतः एतस्य मोहनाख्यस्य (मोहनम् आख्या यस्य तस्य) भ्रमाभा (भ्रमस्य इव आभा यस्याः सा) कापि (अपूर्वा) वैचित्री (चमत्कारिता-प्रतिपादिका-वृत्तिविशेषरूपा) दिव्योन्मादः इति ईर्य्यते (कथ्यते); उद्घूर्णाचित्रजल्पाद्याः बहवः तद्भेदाः (दिव्योन्मादभेदाः) मताः (कथिताः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके दिव्योन्माद (उद्घूर्णा) का दृष्टान्त :— एकदिन महाप्रभु करियाछेन शयन। कृष्ण रासलीला करे,—देखिला स्वपन॥ 17॥ त्रिभङ्ग-सुन्दर-देह, मुरलीवदन। पीताम्बर, वनमाला, मदनमोहन॥ 18॥ मण्डलीबन्धे गोपीगण करेन नर्त्तन। मध्ये राधासह नाचे व्रजेन्द्रनन्दन॥ 19॥ देखि' प्रभु सेइ रसे आविष्ट हैला। 'वृन्दावने कृष्ण पाइनुं'—एइ ज्ञान कैला॥ 20॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु शयन कर रहे थे, तब उन्होंने स्वप्नमें देखा कि श्रीकृष्ण रासलीला कर रहे हैं। श्रीकृष्णकी त्रिभङ्ग-सुन्दर देह है, उनके मुखपर मुरली विद्यमान है, उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके गलेमें वनमाला है और वे मदनको (कामदेवको) भी मोहित करनेवाले हैं। गोपियाँ मण्डलाकारमें नृत्य कर रही हैं और उनके मध्यमें श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीराधाके साथ नृत्य कर रहे हैं। इस लीलाको देखकर महाप्रभु उस रसमें आविष्ट हो गये और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ—'मुझे वृन्दावनमें कृष्ण प्राप्त हुए हैं।'॥ 17-20॥ अनुभाष्य—'रसे आविष्ट हैला',—तन्मयता प्राप्त कर ली॥ 20॥ जागृत-अवस्थामें (बाह्यदशामें) महाप्रभुका कृष्ण-विच्छेदमें दुःख :— प्रभुर विलम्ब देखि' गोविन्द जागाइला। जागिले 'स्वप्न'-ज्ञान हैल, प्रभु दुःखी हैला॥ 21॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभुके उठनेमें देर होते देखकर श्रीगोविन्दने उन्हें जगाया। जागृत होनेपर महाप्रभु यह जानकर कि रासलीलामें उन्हें जो कृष्ण मिले थे, वह स्वप्न था, इसलिये वे बहुत दुःखी हुए॥ 21॥ अभ्यासवशतः नित्यकृत्य करना :— देहाभ्यासे नित्यकृत्य करि' समापन। काले याइ' कैला जगन्नाथ-दरशन॥ 22॥ अनुवाद—परन्तु महाप्रभुने अभ्यासवशतः देहसे सम्बन्धित नित्यकृत्य समाप्त करके समयपर जाकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन किया॥ 22॥ गरुड़-स्तम्भसे महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— यावत्काल दर्शन करेन गरुड़ेर आगे। प्रभुर आगे दर्शन करे लोक लाखे लाखे॥ 23॥ अनुवाद—जिस समय महाप्रभु गरुड़ स्तम्भके पीछे खड़े होकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे, उस समय महाप्रभुके आगे खड़े होकर लाखों-लाखों लोग भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहे थे॥ 23॥ एक उड़िया स्त्रीके द्वारा अनजानेमें महाप्रभुके कन्धेपर पैर रखकर श्रीजगन्नाथ-दर्शन :— उड़िया एक स्त्री भीड़े दर्शन ना पाञा। गरुड़े चड़ि' देखे प्रभुर स्कन्धे पद दिया॥ 24॥ अनुवाद—एक उड़िया स्त्री भीड़में भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन नहीं कर पानेके कारण गरुड़-स्तम्भपर चढ़ गयी