श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें352 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/12-16 ] अनुभाष्य—'ये-दशा हैल',—सुदीर्घ विप्रलम्भ ॥ 12 ॥ उद्धव-दर्शने यैछे राधार विलाप। क्रमे क्रमे हैल प्रभुर से उन्माद-विलाप ॥ 13 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका सन्देश लेकर व्रजमें आनेपर उद्धवको देखकर जैसे श्रीराधाका विलाप था, महाप्रभु भी क्रमशः उसी प्रकारका उन्माद-विलाप करने लगे॥ 13 ॥ अनुभाष्य—'राधार विलाप',—भाः (10/47/12-21) श्लोकोंमें भ्रमरगीत देखें ॥ 13 ॥ कृष्णविरहिणी श्रीराधाके भावमें ही विभावित महाप्रभु, इसलिये उनमें कृष्णसे सम्भोग-आङ्काङ्क्षा-वृत्तिका अभाव :— राधिकार भावे प्रभुर सदा 'अभिमान'। सेइ भावे आपनाके हय 'राधा'-ज्ञान ॥ 14 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सदा श्रीराधिकाके भावमें ही विभावित रहते थे, उस भावको वे अपना भाव ही मानते थे, इसलिये वे स्वयंको श्रीराधा ही समझते थे॥ 14 ॥ अनुभाष्य—अभिमान—(उःनीः)— “अभिमानो निजप्रेमोत्कर्षाख्यानं तु भङ्गितः।”—(उःनीः 9/23) [अर्थात् “भङ्गिमापूर्वक स्वपक्षके प्रेमके उत्कर्षका वर्णन ही 'अभिमान' कहलाता है।”] “सन्तु रम्याणि भूरीणि प्रार्थ्यं स्यादिदमेव सः। इति यो निर्णयो धीरैरभिमानः स उच्यते॥”—(उःनीः 14/19) [अर्थात् “ 'संसारमें नाना प्रकारकी मनोरम वस्तुएँ हैं, वे रहें, किन्तु मेरे लिये केवल यही प्रार्थनीय हैं'—इस प्रकार स्थिरीकरणको पण्डितगण 'अभिमान' कहते हैं।”] 'सदा अभिमान',—सर्वदा अप्राकृत सेवकाभिमान। यद्यपि श्रीगौरसुन्दर—स्वयं कृष्ण हैं, तथापि श्रीमती राधिका-सम्मिलित तनु होनेके कारण सर्वदा श्रीमतीके भावमें अभिन्न भावसे निमग्न थे। सम्भोगमय श्रीकृष्णभावमें अवस्थित होनेसे उन्हें अपने उद्देश्यकी सिद्धिमें बाधा होती। वर्तमान समयमें श्रीगौरविद्वेषी अवैष्णव विपरीत बुद्धिसे उनके द्वारा आचरित और प्रचारित भजन-प्रणालीके विचारोंको उलटा समझकर, श्रीगौरसुन्दरको अपनी मनगढ़न्त कल्पनाके द्वारा 'प्राकृत नागर' बनाकर, स्वयंको 'रङ्गेर नदीयानागरी' कहकर कृष्णभक्तिसे विच्युत हो रहे हैं। वर्तमान समयमें 'Theosophist अर्थात् ब्रह्मविद्यावादी'-सम्प्रदायके कुछ व्यक्ति ऐसा मानते हैं कि श्रीगौरसुन्दर तो स्वयं भगवान् हैं और उनके द्वारा जीवोंके मङ्गलके लिये 'विप्रलम्भ साधनको ही सिद्धिका एकमात्र पथ' कहकर प्रदर्शित करनेपर भी वह पथ जीवोंके लिये दुर्लभ है। अतएव जिस जीवकी जैसी इच्छा है, वह उसीके अनुरूप उपादानसे श्रीगौरसुन्दरको बनाकर और सजाकर इन्द्रियतर्पण-परायण अपने-अपने मनोकल्पित उपादान अर्थात् जिस किसी भी प्रकारके उपायसे भजन कर सकता है। इसका निषेध करते हुए श्रीगौरसुन्दरने अप्राकृत-विप्रलम्भभावमें कृष्णसेवाकी परम चमत्कारिताको प्रदर्शित करके जगत्का मङ्गल विधान किया है ॥ 14 ॥ महाप्रभुका अधिरूढ़-महाभावमें दिव्योन्माद :— दिव्योन्मादे ऐछे हय, कि इहा विस्मय ? अधिरूढ़-भावे दिव्योन्माद-प्रलाप हय ॥ 15 ॥ अनुवाद—दिव्योन्माद अवस्थामें ऐसा ही होता है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है ? अधिरूढ़ भावमें दिव्योन्माद-प्रलाप ही होता है ॥ 15 ॥ दिव्योन्मादकी संज्ञा और उसके प्रकारका भेद :— उज्ज्वलनीलमणिमें स्थायिभाव-प्रकरणमें (190) श्लोक— एतस्य मोहनाख्यस्य गतिं कामप्युपेयुषः। भ्रमाभा कापि वैचित्री दिव्योन्माद इतीर्यते। उद्घूर्णा-चित्रजल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः ॥ 16 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 16 ॥