भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2368

[ 14/8-12 चौदहवाँ अध्याय 351 अपने-अपने द्वारा रचित कड़चा-ग्रन्थोंमें लिखकर रखी थीं और उनके द्वारा जगत्का परम उपकार साधित होता। यह दुःखका विषय है कि वे सब कड़चा आज तक भी लोगोंके नेत्रोंके अगोचर रहकर जीवोंके दुर्भाग्यका ही परिचय प्रदान कर रहे हैं॥ 8 ॥ क्षणे क्षणे अनुभवि' एइ दुइ जन। संक्षेपे बाहुल्ये करेन कड़चा-ग्रन्थन ॥ ९॥ अनुवाद-महाप्रभुकी विरह-उन्माद दशाकी क्षण-क्षणकी लीलाओंको अनुभव करके श्रीस्वरूप दामोदर अपने कड़चामें उनको संक्षेपमें और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी अपने कड़चामें उनको विस्तृतरूपमें लिखते थे ॥ ९॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'संक्षेपे बाहुल्ये', – स्वरूप-गोस्वामीने संक्षेपमें एवं रघुनाथदास-गोस्वामीने विस्तृत रूपसे कड़चाकी रचना की है॥ 9 ॥ अनुभाष्य-इन दो गोस्वामियोंने महाप्रभुकी लीलाओंको सदैव अनुभव करके उन लीलाओंकी थोड़ी-बहुत कड़चाके आकारमें रचना की है, परन्तु यथारीति (प्रचलित प्रथाके अनुकूल) ग्रन्थकी रचना नहीं की ॥ 9 ॥ स्वरूप- 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ- 'वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि-पाँजि-टीका-व्यवहार ॥ 10 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुकी लीलाओंके सूत्रकर्त्ता (सूत्ररूपमें लिखनेवाले) और श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी उन लीलाओंके वृत्तिकार (विस्तारसे लिखनेवाले) थे। मैं उन दोनों कड़चाके भावोंको ही कुछ विस्तार करके अब लिख रहा हूँ, जैसे रूईको धुननेसे वह कुछ फूल जाती है ॥ 10 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीस्वरूप गोस्वामीने सूत्र और श्रीरघुनाथने उनकी वृत्ति लिखी है; मैं उन दोनोंके द्वारा वर्णित विषयको ही थोड़ा-सा विस्तृत करके पाँजिटीकाकी (प्रस्तावनाकी) भाँति लिख रहा हूँ। 'पाँजिटीका' अथवा 'पञ्जितीका'का अर्थ यह है कि वृत्तिकारके मूल आकर-ग्रन्थके (ग्रन्थ जिसमें अनेक तथ्योंका विवरण दिया हो) विचारोंको रूईकी भाँति धुनकर कुछ वर्धित करके वर्णन किया गया है ॥ 10 ॥ अनुभाष्य- 'सूत्र',- “स्वल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥” [अर्थात् “सूत्र-बहुत कम अक्षरोंसे युक्त, सन्देहरहित, सारवान्, सर्वतोगामी (जिसका सम्पूर्ण ग्रन्थमें सर्वत्र अधिकार है), सफल और निर्दोष वचनोंको ही पण्डितगण 'सूत्र' कहते हैं।”] 'वृत्ति', – वृत्तिका अर्थ कारिका है; “कारिका यातना-वृत्त्योः” इत्यमरः ; [अर्थात् “अमरकोषमें 'कारिका'का अर्थ नरक-यातना और श्लोक कहा गया है।”] उसकी टीकामें- “संक्षेपेण श्लोकैर्विवरणं वृत्तिः ॥” [उसकी टीकामें कहा गया है, - “संक्षेपमें श्लोकसमूहके द्वारा विवरण ही 'वृत्ति' है।”] ॥ 10 ॥ अप्राकृत श्रद्धाके साथ अप्राकृत विप्रलम्भ-भाव श्रवण करके उसके अनुसरणसे ही प्रेमकी प्राप्ति :- ताते विश्वास करि' शुन भावेर वर्णन। हइबे भावेर ज्ञान, पाइबा प्रेमधन ॥ 11 ॥ अनुवाद-कृपापूर्वक आप सभी विश्वासके सहित महाप्रभुके विरह-उन्मादरूपी भावोंके वर्णनको श्रवण करें। इससे आपको विरह-उन्मादरूपी भावका ज्ञान होगा और आप प्रेमरूपी धनको प्राप्त करेंगे ॥ 11 ॥ अन्तर-दशामें महाप्रभुके हृदयमें कृष्णविरहिणी श्रीराधादि गोपियोंके भावोंका उदय, अन्तिम सात अध्यायोंमें ही 'गौरनागरवाद' का खण्डन :- कृष्ण मथुराय गेले गोपीर ये-दशा हैल। कृष्णविच्छेदे प्रभुर से-दशा उपजिल ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके मथुरा चले जानेपर गोपियोंकी जो सुदीर्घ विप्रलम्भमयी दशा हुई थी, श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी भी वैसी दशा उत्पन्न हुई ॥ 12 ॥