भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2372, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2372

[ 14/30-36 चौदहवाँ अध्याय 355

गया था कि उसे यह भी नहीं पता चला कि वह स्तम्भ लकड़ीका है अथवा पत्थरका और उसका पैर किसके ऊपर है। वह तो आविष्ट होकर दर्शन करने लगी और जब आवेश समाप्त हो गया और उसे बाहरी ज्ञान आया, तब उसने महाप्रभुकी वन्दना की। महाप्रभु जब देवदासीके द्वारा गीत-गोविन्दका गान सुनकर उसकी ओर दौड़े, तब उन्हें काँटों अथवा मेड़का कोई ज्ञान नहीं था। उस समय क्या उस देवदासीमें ऐसा आवेश था अथवा महाप्रभुमें आवेश था? महाप्रभुमें आवेशके विषयमें सुना जाता है, किन्तु उस स्त्रीमें कोई आवेश नहीं था। इसलिये यदि महाप्रभु उसे स्पर्श कर लेते, तो फिर वे अपने प्राण त्याग देते। परन्तु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये आविष्ट उस वृद्धा स्त्रीके चरणका स्पर्श होनेपर भी महाप्रभुको कोई ग्लानि नहीं हुई, अपितु उन्होंने उस स्त्रीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। श्रीराय रामानन्द देवदासियोंको भावकी शिक्षा देते थे, अपने हाथोंसे उनके अङ्गोंका मार्जन करते और उनको वस्त्र धारण करवाते तथा उनका शृङ्गार करते थे। महाप्रभुने उनकी इस कार्यके लिये निन्दा नहीं करके उनकी प्रशंसा की। महाप्रभुने स्त्रीसे बात करनेके लिये छोटे-हरिदासका त्याग कर दिया, किन्तु श्रीराय रामानन्दका त्याग नहीं किया। इसलिये जिसमें जिस प्रकारके गुण और भाव हैं, उसे उसी प्रकारसे समझना चाहिये। उस वृद्धा स्त्रीमें श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेका आवेश था, इसलिये उसके द्वारा महाप्रभुके कन्धेके ऊपर अपने पैरको रखना दोषपूर्ण नहीं है, किन्तु अन्य परिस्थितिमें ऐसा करना दोषपूर्ण है। परिस्थिति और परिवेशका विचार करके उसका निर्णय करना चाहिये।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 30 ॥ पूर्वे आमि यबे कैलुँ जगन्नाथ-दरशन। जगन्नाथे देखि—साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 31 ॥

श्रीकृष्णमें आविष्टचित्त गोपीभावमय महाप्रभुके द्वारा सर्वत्र श्रीकृष्णका दर्शन :— स्वप्नेर दर्शनावेशे तद्रूप हैल मन। याँहा ताँहा देखि सर्वत्र मुरली-वदन ॥”32 ॥ अनुवाद—इसके पूर्व मैं मन्दिरमें आकर जब श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहा था, तब मुझे वे श्रीजगन्नाथ साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन दिखलायी दे रहे थे। रात्रिमें स्वप्नमें जो व्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन हुए थे, उसमें आविष्ट होनेके कारण मेरा मन उसी लीलाका स्मरण कर रहा था, इसलिये मुझे यत्र-तत्र-सर्वत्र ही मुरली-वदन दिखलायी देने लगे थे॥”31-32 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :— एबे यदि स्त्रीरे देखि' प्रभुर बाह्य हैल। जगन्नाथ-सुभद्रा-बलरामेर स्वरूप देखिल ॥ 33 ॥ कुरुक्षेत्रमें वासुदेवके दर्शनसे श्याम-विरहिणी गोपीभावमय महाप्रभु :— कुरुक्षेत्रे देखि' कृष्णे ऐछे हैल मन। 'काँहा कुरुक्षेत्रे आइलाङ, काँहा वृन्दावन??'34 ॥ अनुवाद—किन्तु अब जब उस स्त्रीको देखा तो महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और उन्हें श्रीजगन्नाथ- सुभद्रा-बलरामके स्वरूप दिखलायी देने लगे। उन तीनोंके दर्शन करके महाप्रभुके मनमें भाव आया कि मैं श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें देख रहा हूँ और वे सोचने लगे,—'कहाँ मैं कुरुक्षेत्रमें आ गया हूँ और कहाँ मैं वृन्दावनमें था?'33-34 ॥ श्रीकृष्णके सङ्गसे वञ्चित गोपीभावमें कातर महाप्रभु :— प्राप्तरत्न हाराञा ऐछे व्यग्र हइला। विषण्ण हञा प्रभु निज-वासा आइला ॥ 35 ॥ श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :— भूमि उपर बसि' निज-नखे भूमि लिखे। अश्रुगङ्गा नेत्रे बहे, किछुइ ना देखे ॥ 36 ॥