भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2373

356 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/35-42 ] “पाइनु वृन्दावननाथ, पुनः हाराइनु। के मोर निलेक कृष्ण? काँहा मुइ आइनु??”37॥ अनुवाद—महाप्रभु ऐसे व्यग्र हो गये जैसे एक व्यक्तिका मूल्यवान् रत्न खो गया हो। उदास होकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। वे भूमिके ऊपर बैठकर अपने नाखूनोंसे भूमिपर कुछ लिखने लगे। गङ्गाकी धाराकी भाँति उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, उन्हें कुछ भी दिखलायी नहीं दे रहा था। वे विलाप करते हुए कहने लगे,—“मैंने वृन्दावन-नाथको प्राप्त करके पुनः खो दिया। मेरे कृष्णको कौन ले गया है? मैं कहाँ आ गया हूँ?”35-37॥ अर्द्धबाह्यदशाके लक्षण :- स्वप्नावेशे प्रेमे प्रभुर गर गर मन। बाह्य हैले हय—येन हाराइनु धन॥38॥ अनुवाद—स्वप्नमें रासलीलाके दर्शन करके उस आवेशमें महाप्रभुका मन प्रेममें विह्वल हो रहा था, परन्तु जैसे ही महाप्रभुकी स्वप्न टूटनेपर बाह्यदशा हुई, तो उन्हें लगा कि वे अपना समस्त धन खो बैठे हैं॥ 38॥ दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभुका अभ्यासवशतः नित्यकृत्य आदि करना :- उन्मत्तेर प्राय प्रभु करेन गान-नृत्य। देहेर स्वभावे करेन स्नान-भोजन-कृत्य॥39॥ अनुवाद—महाप्रभु उन्मत्त व्यक्तिकी भाँति गाने और नृत्य करने लगे। देहके स्वभावसे ही उनके स्नान-भोजन आदि कार्य होने लगे॥ 39॥ रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके निकट विलाप :- रात्रि हैले स्वरूप-रामानन्दे लञा। आपन मनेर भाव कहे उघाड़िया ॥40॥ अनुवाद—रात्रि होनेपर महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायको अपने मनके भाव खोलकर बतलाने लगे॥40॥ गोस्वामिपादोक्त श्लोक- प्राप्तप्रणष्टाच्युतवित्त आत्मा ययौ विषादोज्झित-देहगेहः। गृहीतकापालिकधर्मको मे वृन्दावनं सेन्द्रियशिष्यवृन्दः॥41॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी आत्माने कृष्णरूपी धनको एकबार प्राप्त करके पुनः खोकर विषादके कारण देह-गृहको परित्याग करके कापालिक-योगीका धर्म ग्रहण करके अपने इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावनमें गमन किया था। इसमें 'उपमालङ्कार' द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ अनुभाष्य- प्राप्त-प्रणष्टाच्युतवित्तः (आदौ प्राप्तं नयनसरणीलब्धं, पश्चात् प्रणष्टं पुनः नष्टम् अदृष्टम् च, अच्युतवित्तम् अच्युतरूपवित्तं येन सः) विषादोज्झितदेहगेहः (विषादेन कृष्णविरहज-क्लेशेन उज्झितः त्यक्तप्रायः देह एव गेहः येन सः) गृहीत-कापालिक- धर्मकः (गृहीतः अङ्गीकृतः कापालिकस्य योगिविशेषस्य धर्मः नैसर्गिकस्वभावादिकः येन सः) मे (मम) आत्मा (शुद्धमनः) सेन्द्रियशिष्यवृन्दः (इन्द्रियाण्येव शिष्यवृन्दानि तैः सह वर्तमानः) वृन्दावनं ययौ। श्लोक-भावानुवाद-पहले नयनपथपर गोचर होनेके बाद पुनः उनके अदृष्ट होनेपर अच्युतरूप धन खोकर कृष्णविरहसे उत्पन्न क्लेशसे प्राय देह और गेहको त्यागकर कापालिकके (विशेष योगीके) धर्मको (नैसर्गिक स्वभावादिको) ग्रहण करके मेरा शुद्धमन इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावन गया था॥ 41 ॥ श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका दिव्योन्माद (चित्रजल्प) :- प्राप्तरत्न हाराञा, तार गुण सङरिया, महाप्रभु सन्तापे विह्वल। राय-स्वरूपेर कण्ठ धरि', कहे—“हाहा हरि हरि”, धैर्य गेल, हइला चपल ॥42॥