भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2374, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2374

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[ 14/42-51 चौदहवाँ अध्याय 357 श्रीकृष्णमाधुर्यकी आकर्षणशक्तिके बलसे सब छाड़ि' गेला वृन्दावन ॥ 47 ॥ दशम-दशाकी प्राप्तिका वर्णन :- वृन्दावने प्रजागण, यत "शुन, बान्धव, कृष्णेर माधुरी। स्थावर-जङ्गम, यार लोभे मोर मन, छाड़िलेक वेदधर्म, वृक्ष-लता गृहस्थ-आश्रमे। योगी हञा हइल भिखारी ॥ 43 ॥ ध्रु॥ तार घरे भिक्षाटन, फल-मूल-पत्राशन, अनुवाद-श्रीकृष्णरूपी रत्नको प्राप्त करके उसे एइ वृत्ति करे शिष्यसने ॥ 48 ॥ खोकर श्रीकृष्णके गुणोंको स्मरण करते हुए महाप्रभु सन्तापसे विह्वल हो उठे। तब महाप्रभु श्रीराय रामानन्द कृष्णगुण रूप, रस, गन्ध, शब्द, परश, और श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें अपनी भुजाओंको से सुधा आस्वादे गोपीगण। डालकर 'हा हरि ! हा हरि !' कहते हुए चञ्चल हो उठे, ता-सबार ग्रास-शेषे, आनि' पञ्चेन्द्रिय शिष्ये, धैर्य खो बैठे और कहने लगे, "हे बान्धव ! श्रीकृष्णकी से भिक्षाय राखेन जीवन ॥ 49 ॥ माधुरीके विषयमें श्रवण करो, जिस माधुरीके लोभसे जागर-दशा :- मेरा मन लोकधर्म और वेदधर्मको छोड़कर योगी शून्यकुञ्जमण्डप-कोणे, योगाभ्यास कृष्णध्याने, बनकर भिखारी हो गया है ॥ 42-43 ॥ ताँहा रहे लञा शिष्यगण। कृष्णलीला-मण्डल, शुद्ध कृष्ण आत्मा निरञ्जन, साक्षात् देखिते मन, शङ्खकुण्डल, ध्याने रात्रि करे जागरण ॥ 50 ॥ गड़ियाछे शुक कारिकर। व्याधि, मोह और मृत्यु (प्रलय)-दशा; चित्रजल्प :- सेइ कुण्डल काणे परि', तृष्णा-लाउ-थाली धरि', मन कृष्णवियोगी, दुःखे मन हैल योगी, आशा-झुलि कान्धेर उपर ॥ 44 ॥ से वियोगे दश दशा हय। चिन्ता, मलिनाङ्गता और प्रलाप-दशा :- से दशाय व्याकुल हञा, मन गेल पलाञा, चिन्ता-कान्था उड़ि' गाय, धूलि-विभूति-मलिन-काय, शून्य मोर शरीर आउलय ॥" 51 ॥ 'हाहा कृष्ण' प्रलाप-उत्तर। अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 44-51 ॥ उद्वेग द्वादश हाते, लोभेर झुलि निल माथे, अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने आगे कहा, - श्रीकृष्णकी भिक्षाभावे क्षीण कलेवर ॥ 45 ॥ माधुरीके प्रति लोभ करके वेदधर्मको परित्यागकर मेरा तानव-दशा :- मन योगी होकर भिखारी हो गया है। योगी लोग जिस व्यास, शुकादि योगिगण, कृष्ण आत्मा निरञ्जन, प्रकार शङ्ख-कुण्डल धारण करते हैं, उसी प्रकार मेरे व्रजे ताँर यत लीलागण। मनरूपी योगीने कृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-मण्डलरूपमें भागवतादि शास्त्रगणे, करियाछे वर्णने, धारण किया है। सामान्य योगियोंके शङ्खकुण्डल शङ्खके सेइ तर्ज्जा पड़े अनुक्षण ॥ 46 ॥ कारीगर ही बनाते हैं, किन्तु मेरे मनरूपी योगीके उन्माद-दशा :- कृष्णलीला-मण्डलरूप भागवत-कुण्डलोंका साक्षात् बादरायण दशेन्द्रिये शिष्य करि', 'महा-बाउल' नाम धरि', श्रीशुकरूपी कारीगरने गठन किया है। सामान्य योगी शिष्य लञा करिल गमन। जो-जो चाहता है, मेरे मनरूपी योगीने उसे उसे स्वीकार मोर देह स्वसदन, विषय-भोग महाधन,

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