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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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358 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/44-53 ]


[बायाँ स्तम्भ]

किया है। सामान्य योगीके पास कद्दूसे बने कमण्डलु और थाली (भिक्षापात्र) रहते हैं, मेरे मनरूपी योगीने कृष्णतृणारूपी लौकीकी थाली बनायी है,—'कृष्णको प्राप्त करूँगा', इस आशारूपी झोलीको कन्धेके ऊपर झुला रखा है,—और 'किस उपायसे कृष्णको प्राप्त करूँगा' इस चिन्तारूपी [पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बनाये हुए] कम्बलको शरीरपर ओढ़ा हुआ है। योगीगण राखकी विभूति धारण करते हैं, मेरा मनरूपी योगी धूलिकी विभूतिके द्वारा मलिन शरीरवाला हो गया है, प्रत्येक बातका 'हा हा कृष्ण' इस प्रकारके प्रलापमय वचनोंसे उत्तर देता है। सामान्य योगी लोग हाथमें बारह कड़े पहनते हैं, मेरे मनरूपी योगीके हाथमें अष्टसात्त्विक विकार, मनका वेग, कम्प-विकार, निश्वास, चपलता और चिन्ता, —ये बारह कड़े शोभा पा रहे हैं; [मेरे मनरूपी योगीने] कृष्णमाधुर्यकी लोभरूपी झोलीको मस्तकपर बाँध रखा है; और वह भिक्षा प्राप्त नहीं कर पानेके कारण दुबला हो गया है। व्यास-शुकादि जिन समस्त योगियोंने निर्मल आत्मारूपी कृष्णकी समस्त व्रजलीलाओंका भागवतादि शास्त्रोंमें वर्णन किया है, मेरा मनरूपी योगी उनके द्वारा रचित समस्त प्रेम-गीत और नृत्यका निरन्तर पाठ करता रहता है। बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार मेरे मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर मेरे देहरूपी अपने घरमें विषय-भोगरूपी महाधनका परित्याग करके वृन्दावन गमन किया है। शिष्यगण (दस इन्द्रियाँ) वृन्दावनमें स्थावर-जङ्गमरूपी समस्त प्रजावर्ग एवं वृक्ष-लता आदि गृहस्थ-आश्रमियोंके घरमें भिक्षा माँगकर फल-मूल-पत्रके सेवनरूपी वृत्तिका आचरण कर रहे हैं। व्रजगोपियाँ श्रीकृष्णके गुण, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—इन सभी सुधाका सर्वदा आस्वादन करती हैं, उनके भोजनके अवशिष्टको लाकर ज्ञानेन्द्रियरूपी पाँच शिष्य उस प्रसादको खाकर जीवनकी रक्षा करते हैं। सामान्य योगी जिस प्रकार एक कोनेमें (एकान्तमें) बैठकर ध्यान


[दायाँ स्तम्भ]

करते हैं, उसी प्रकार मेरा मनरूपी योगी भी कृष्णशून्य कुञ्जमण्डपके कोनेमें अपने शिष्योंके साथ कृष्णध्यानमें योगका अभ्यास करता है। कृष्ण—निर्मल आत्मस्वरूप हैं; मेरा मनरूपी योगी उन्हें साक्षात् देखना चाहता है, उन्हें प्राप्त नहीं कर पानेके कारण ध्यानमें रात्रि-जागरण करता है। मन कृष्ण-वियोगी बनकर अति दुःखमें इस योगीकी दशाको प्राप्त करके उस कृष्ण-विरहकी अवस्थामें दस-दशाको प्राप्त करता है, उस दशामें नितान्त व्याकुल होकर मन फिर योगी बननेको विफल हुआ देखकर भाग गया है; मेरा शरीर शून्य होकर रह गया है। इस श्लेष अलङ्कारके प्रयोगसे प्रलयावस्था तकका वर्णन हुआ है॥ 44-51 ॥

अनुभाष्य—पाठान्तरमें, — 'लोभेर झुलनी माथे' ; 'झुलनी' शब्दका अर्थ सिरको ढकने योग्य वस्त्र है॥ 45 ॥ 'तर्ज'—(अरबी भाषामें तर्जा) दो दलोंके बीच सङ्गीतमें परस्परके उत्तरका खण्डन; कवि-गान और प्रेम-गीतके साथ नृत्यके समजातीय ॥ 46 ॥ 'कापालिकगण'—विशेष योगी; वे मनुष्यके कपाल अर्थात् मस्तककी खोपड़ीको लेकर विचरण करते हैं। उनके तान्त्रिक अनुष्ठानोंके साथ सादृश्य रखकर यह अंश वर्णित हुआ है। कापालिकगण—अवैदिक और अस्पृश्य हैं, इसलिये अवैष्णव हैं; उनके व्यवहारकी ही उपमा-मात्रको ग्रहण किया गया है॥ 51 ॥

श्रीकृष्णवियोगमें प्रोषितभर्तृका गोपियोंकी दस दशाओंसे युक्त कृष्ण-विरही महाप्रभु :- कृष्णेर वियोगे गोपीर दश दशा हय। सेइ दश दशा हय प्रभुर उदय ॥ 52 ॥

अनुवाद—जैसे श्रीकृष्णके वियोगमें गोपियोंकी दस दशाएँ उपस्थित होती हैं, उसी प्रकार महाप्रभुमें दसों दशाएँ उदित होती थीं ॥ 52 ॥

उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेद प्रकरणमें (167) श्लोक—