भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2376

[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 359 चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं मलिनाङ्गता। प्रलापो व्याधिरुन्मादो मोहो मृत्युर्दशा दश ॥ ५३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्ता, जागरण, उद्वेग, तनुक्षीणता (शरीरका दुबला होना), अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु, —ये दस दशाएँ हैं॥ ५३ ॥ अनुभाष्य— [अत्र प्रवासाख्ये विप्रलम्भे दश दशाः कथिताः]—चिन्ता (अभीष्टलाभोपायध्यानं), जागरः (निद्राराहित्यः), उद्वेगः (मनःकम्पविशेषः), तानवं (कृशता), मलिनाङ्गता (अङ्गमालिन्यं), प्रलापः (असम्बद्धवचनं), व्याधिः, उन्मादः (विभ्रम-चेष्टासम्पन्नः) मोहः (चित्तविभ्रान्तिः) मृत्युः (स्पन्दनाभावः)। श्लोक-भावानुवाद—[यहाँ प्रवास कहे गये विप्रलम्भमें दस दशाएँ कही गयी हैं]—चिन्ता (अभीष्टको प्राप्त करनेके उपायका ध्यान), जागरण, उद्वेग (मनका विशेष कम्प), शरीरका दुबला होना, अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप (ऐसे वचन जिनका आपसमें सम्बन्ध नहीं हो), व्याधि, उन्माद (भ्रमित होकर चेष्टा), मोह (चित्तमें विभ्रान्ति) और मृत्यु (शरीरमें स्पन्दनका अभाव)। इन दस दशाओंकी उदाहरण-माला नीचे लिखी जा रही है; उनमेंसे— (1) 'चिन्ता'—जैसे हंसदूत (2) में— “यदा यातो गोपीहृदयमदनो नन्दसदना- न्मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुरुन्धन् मधुपुरीम्। तदामाङ्गीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयै- रगाधायां बाधामय-पयसि राधा विरहिणी ॥” अर्थात्— “अक्रूरेर अनुरोधे नन्दगृह हइते। गोपीहृदानन्द यबे गेल मधुराते॥ तबे विरहिणी राधा उद्घूर्णितमना। तीव्रपीडा-जलरूपा उत्कट भावना॥ निजेर विनाश-चिन्ता-व्याकुलता-फले। डुबिल अतलस्पर्श-चिन्तानदी-तले॥ 'आमार सन्धान लागि' प्रियतम कृष्ण। भावि काले ब्रजे आसि' हइया सतृष्ण॥ आमार मरण-कथा यबे लोकमुखे। शुनिबे, हृदये कभु ना पाइबे सुखे॥ दयितेर दुःख-भार विचार करिया। कभु मृत्यु-वाञ्छा नाहि करे मोर हिया॥” [अर्थात् जबसे गोपियोंके हृदयके आनन्दस्वरूप मुकुन्द अक्रूरके अनुरोधसे नन्दगृहको छोड़कर मथुरा चले गये, तभीसे विरहिणी श्रीराधाका चित्त उद्घूर्णा-ग्रस्त हो गया। अपने विनाशकी चिन्ताकी व्याकुलताके फलस्वरूप वे (श्रीकृष्ण विरहकी) तीव्र-पीडास्वरूप जलरूपा अगाध चिन्तानदीमें निमग्न होकर, इस प्रकार तीव्र चिन्ता करने लगीं, —“भविष्यमें मेरे प्रियतम कृष्ण सतृष्ण होकर मुझे ढूँढ़ते हुए जब व्रजमें आयेंगे, तब व्रजवासियोंके मुखसे मेरी मृत्युकी बातको सुनकर उनका हृदय कदापि प्रसन्न नहीं होगा अर्थात् अत्यन्त दुःखी होगा। अपने अत्यन्त प्रियतमके इस (भावी) दुःख रूपी भारका विचार करके ही मेरा चित्त कभी मृत्युकी कामना नहीं करता।”] (2) 'जागर:'—जैसे पद्यावली (322)में— “याः पश्यन्ति प्रियं स्वप्ने धन्यास्ताः सखि योषितः। अस्माकन्तु गते कृष्णे गता निद्रापि वैरिणी ॥” अर्थात्— “प्रिय सखी विशाखाके राधा-ठाकुराणी। निजे भाग्यहीना जानि कहिलेन वाणी॥ 'प्रियतम-दरशन स्वप्नेर काले। ये नारीर घटे, तार धन्य लिखे भाले॥ कृष्णेर गमन हले निद्रा-रूपा अरि। छाडियाछे मम सङ्ग साधितेछे वैरी॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें स्वयंको भाग्यहीन जानकर श्रीराधा-ठाकुराणी अपनी प्रियसखी श्रीविशाखासे बड़े खेदके साथ कह रही हैं, —“जो नारियाँ अपने प्रियतमका स्वप्नमें भी दर्शन प्राप्त करती हैं, वे धन्य हैं।