भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2377, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2377

360 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53 ] श्रीकृष्णके मथुरा जानेपर निद्रा भी मेरी वैरिणी हो गयी है, अर्थात् मुझे त्यागकर दूर चली गयी है।”] (3) 'उद्वेगः',—जैसे हंसदूत (104) में— “मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हन्त करवै न पारं नावारं सुमुखि कलयाम्यस्य जलधेः। इयं वन्दे मूर्द्धा सपदि तमुपायं कथय मे परामृश्ये यस्माद्कृतिकणिकायापि क्षणिकया॥” अर्थात्— “ललिताके कहे राधा,—'सुमुखि ललिते। दहिछे हृदय मम, ना पारि बलिते॥ हाय कि करिबे, देखि,—जलधि अपार। नमि आमि तव पदे, करह विचार॥ उपदेश दाओ मोरे—किबा आमि करि। क्षणेकेर तरे किछु धैर्य किसे धरि॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें परम-उद्विग्न श्रीराधा उनको सान्त्वना देनेवाली अपनी प्रिय सखी ललितासे दीनताके साथ कह रही हैं,—“हे सुमुखि ललिते! इस समय मेरा हृदय अति विरह ज्वालासे जल रहा है, मैं कुछ भी कह पानेमें असमर्थ हूँ। हाय! मैं क्या करूँ? मुझे इस विरह-समुद्रका ओर-छोर नहीं दिखायी दे रहा है। मैं नतमस्तक होकर तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। शीघ्र ही मुझे ऐसा कोई उपाय बतलाओ, जिससे मैं क्षणकालके लिये ही धैर्य धारण कर सकूँ।”] (4) 'तानवं', जैसे— “उदश्र्वद्वक्राम्भोरुहविकृतिरन्तःकलुषिता। सदाहाराभावग्लपितकुचकोका यदुपते। विशुष्यन्ति राधा तव विरहतापादनुदिनं निदाघे कुल्येव क्रशिमपरिपाकं प्रथयति॥” अर्थात्— “उद्धव फिरिया यबे कृष्ण-सन्निधाने। राधिका-विशाखा-वार्त्ता कृष्ण तार स्थाने॥ जिज्ञासिल, तदुत्तरे उद्धव कहिल। मथुराय कृष्णचन्द्र साग्रहे शुनिल॥ 'यदुपते, कि बलिब सेइ सब कथा। तोमार विरहे राधा पाय ये ये व्यथा॥ मलिन विवर्ण ताँर वदन-कमल। सुविषाद-दैन्ये ढाका अन्तरेर स्थल॥ आहार-अभावे वक्षश्चकोरिका द्वय। ग्लानियुक्त देखियाछि, शुन रसमय॥ निदाघे सलिल येन शुकाइया याय। तोमार विरहतापे राधा क्षीणकाय॥'” [अर्थात् उद्धव जब व्रजसे लौटकर मथुरामें श्रीकृष्णके पास पहुँचे, तब श्रीकृष्णने उनसे श्रीराधिका, श्रीविशाखा (आदि)के विषयमें जिज्ञासा की। उसके उत्तरमें उद्धव जो कहने लगे उसे श्रीकृष्ण आग्रहपूर्वक सुनने लगे,—“हे यदुपते! तुम्हारे विरहमें श्रीराधा जो-जो कष्ट अनुभव कर रही हैं, मैं उस विषयमें क्या कहूँ? उनका मुखकमल मलिन और कान्तिहीन हो रहा है। सुविषाद-दैन्यसे उनका अन्तःकरण आच्छन्न हो रहा है। आहारके अभावमें उनके दोनों कुचरूप चक्रवाक ग्लानियुक्त हो रहे हैं। हे रसमय! और भी श्रवण करो! तुम्हारे विरहतापसे वे ग्रीष्मऋतुमें शुष्क कृत्रिम क्षुद्रनदीकी भाँति सूखकर क्षीणताकी पराकाष्ठाका विस्तार कर रही हैं।”] (5) 'मलिनाङ्गता', जैसे— “हिमविसरविशीर्णाम्भोजतुल्याननश्रीः, खरमरुदपरज्यद्वन्धुजीवोपमौष्ठी। अघहर शरदर्कौत्तापितेन्दीवराक्षी तव विरहविपत्तिम्लापितासीद्विशाखा॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—शुन, अघहर मम। खरतर-वायुभरे बन्धुतरु सम॥ विशाखार ओष्ठ शुष्क विरह-कातरा। हिमपुअशीर्ण-पद्मतुल्य-बिम्बाधरा॥ विरह-विपत्तिवशे विशाखा सुदीना। शारदीय-रवितप्त-कुमुदनयना॥” [अर्थात् (विशाखाकी विरह-दशाका वर्णन करते हुए) उद्धवने कहा,—“हे दुःखनाशक! सुनो! तुम्हारे विरहमें कातर श्रीविशाखाकी मुखकान्ति हिमसे जले हुए

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