भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2378

[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 361 पद्मपुष्पकी भाँति हो रही है, उनके होंठ प्रखरतर तापयुक्त वायुके संस्पर्शसे जले हुए बन्धूक-पुष्पके समान हो रहे हैं। तुम्हारी विरह-वेदनाके फलस्वरूप उनकी अवस्था अत्यन्त दयनीय हो गयी है और उनके दोनों नेत्र भी शरत्कालीन सूर्यके प्रखर तापसे जले हुए कुमुदपुष्पकी भाँति मलिन हो रहे हैं।”] (6) 'प्रलाप:'—जैसे ललितमाधव (3/25) में— “क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालंकृतिः, क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व तव हन्त हा धिग्विधिः॥” अर्थात्— “प्रोषितभर्तृका राधा विलाप-कातर। बोले,—'सखि, कोथा नन्दकुलशशधर॥ शिखिचन्द्र-अलङ्कार कोथा गेल बल। गम्भीरमुरली-रव्कारी कोथा गेल॥ इन्द्रनीलमणिद्युति पुरुष उत्तम। रासरसताण्डवी वा तव सुहृत्तम॥ मम प्राणरक्षौषधिनिधि कोथा बल। धिग् विधि, भाग्ये लिखेछिले एइ फल??'” [अर्थात् माथुरविरहमें दिव्योन्माद दशाको प्राप्त (प्रोषितभर्तृका) श्रीमती राधिका ललिताको सम्बोधन करके प्रलाप करते हुए कह रही हैं,—“हे सखि ललिते! नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? शिखिपिच्छमौलि कहाँ हैं? जिनकी मुरलीका स्वर अत्यन्त गम्भीर है, वे कहाँ हैं? इन्द्रनीलकान्ति कहाँ हैं? अहो! वे रासमें रसताण्डवी कहाँ हैं? मेरे मृतसञ्जीवनी रसायन कहाँ हैं? हाय! मेरी अभिलषित दुस्त्यज निधि कहाँ हैं? तुम्हारे वे सुहृत्तम कहाँ हैं? हा विधि! तुमको शत-शत बार धिक्कार है॥”] (7) 'व्याधि:',—यथा ललितमाधवमें— “उत्तापी पुटपाकतोऽपि गरलग्रामादपि क्षोभणो, दम्भोलेरपि दुःसहः कटुरलं हृन्मग्नशूल्यादपि। तीव्रः प्रौढ़विषूचिकानिचयतोऽप्युच्चैर्ममायं बली, मर्मांण्यद्य भिनत्ति गोकुलपतेर्विश्लेषजन्मा ज्वरः॥” अर्थात्— “विरहिणी राधा कहे,—'शुन गो ललिते। कृष्णेर विरह-ज्वर ना पारि वर्णिते॥ मृण्मय सम्पुटे तप्त येरूप कनक। गरलादि हइतेओ क्षोभेर जनक॥ वज्र हइते सुदुःसह विद्ध शल्य। येन यन्त्रणाय तीव्रविषूचिकातुल्य॥ सजनि, आमार मर्म भेदितेछे येइ। अतिशय पराक्रमबले बली सेइ॥'” [अर्थात् दिव्योन्मादवती श्रीमती राधिका ललितासे बड़े उद्वेगके साथ कह रही हैं,—“हे सखि ! व्रजनवयुवराजके विरहसे उत्पन्न ज्वर जो पुटपाकसे (औषधि बनानेके लिये उनके पत्तोंको लपेटकर मिट्टीका लेप करके अग्निमें भूननेसे) भी अतिशय तापदायक है, विषराशिसे भी अधिक क्षोभजनक है, वज्रसे भी अत्यन्त दुःसह है, हृदयमें चुभे शूलसे भी अधिकतर कष्टप्रद है तथा अति विपुल हैजा आदि रोगसमूहसे भी अतिशय तीक्ष्ण है। अब वह अति बलवान होकर इस समय मेरे हृदयको भी बींध रहा है॥”] (8) 'उन्मादः', जैसे— “भ्रमति भवनगर्भे निर्निमित्तं हसन्ती, प्रथयति तव वार्त्तां चेतनाचेतनेषु। लुठति च भुवि राधा कम्पिताङ्गी मुरारे, विषमविरहखेदोद्वारिविभ्रान्तचित्ता॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—'तव विरह-कातरा। हे मुरारे, राधा अकारणे हास्यपरा॥ गृहमध्ये भ्राम्यमाणा प्रश्न यारे तारे। सचेतन-अचेतने किछु ना विचारे॥ विषम विरह-खेदे विधुरा राधिका। विभ्रान्तेर वशे एबे लुटिछे मृत्तिका॥'” [अर्थात् उद्धव (श्रीकृष्णसे) कह रहे हैं,—“हे मुरारि ! तुम्हारी उत्कट विरहचिन्तासे श्रीमती राधिका