भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2379, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2379

362 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53-54 ] कभी घरमें इधर-उधर भ्रमण करती हैं, कभी अकारण हँसती हैं। कभी चेतन-अचेतन वस्तुमात्रसे तुम्हारी वार्त्ता पूछती हैं, कभी-कभी तो काँपती हुई भूमिपर लोटने लग जाती हैं॥”] (9) ‘मोहः’, जैसे— “निरुन्धे दैन्याब्धिं हरति गुरुचिन्तापरिभवं, विलुम्पत्युन्मादं स्थगयति बलाद्बाष्पलहरीम्। इदानीं कंसारे कुवलयदृशः केवलमिदं, विधत्ते साचिव्यं तव विरहमूर्च्छा सहचरी॥” अर्थात्— “ललिता कृष्णेर स्थाने लिखिल पत्रिका। 'तव सुविच्छेदे मूर्च्छा लभिया राधिका॥ हे कंसारे, साचिव्येरे विधाता हइया। दैन्यसिन्धु हरे, चित्त-विकार शमिया॥ बले बाष्प-तरङ्गेरे स्तम्भन करिया। राधा आछेन तव गुरुचिन्ता लइया॥ नारीवधरूप महानिधि आशा करि। श्रीराधा-विषये तुमि चिन्ता परिहरि'॥ आजि वा आगामी कल्य लभिबे सन्देश। सुखे अवस्थान कर, आनन्दे विशेष॥'” [अर्थात् मथुरामें निवास करनेवाले श्रीकृष्णको ललिता पत्रके द्वारा संवाद दे रही हैं,–“हे कंसारि! इस समय केवल तुम्हारी विरहमूर्च्छा ही तुम्हारी प्राणेश्वरीकी सहायता कर रही है। वह दैन्यसमुद्रको रोक रही है। गुरुतर चिन्ताजनित दुरावस्थाको हरण कर रही है, उन्मादको दूर रख रही है और बलपूर्वक वाष्पलहरीको भी स्थगित कर रही है अर्थात् रोदनको भी स्थगित कर रही है। श्रीराधा तुम्हारी अत्यधिक गम्भीर चिन्तामें नारीवधरूपी महानिधिकी आशा कर रही हैं। अब तुम श्रीराधाके विषयमें अपनी समस्त चिन्ताओंका त्याग कर सकते हो। आज अथवा आगामी कलमें ही तुम्हें (उनकी मृत्युका) सन्देश प्राप्त हो जायेगा। तुम मथुरामें विशेष आनन्दपूर्वक सुखसे अवस्थान करो।”] (10) 'मृत्युः',–जैसे हंसदूत (96)में– “अये रासक्रीड़ारसिक मम सख्यं नवनवा, पुरा बद्धा येन प्रणयलहरी हन्त गहना। स चेन्मुक्तापेक्षस्त्वमसि धिगिमां तूलसकलं, यदेतस्या नासानिहितमिदमद्यापि चलति॥” अर्थात्— “मथुरा-प्रवासी कृष्णे तिरस्कार करि'। हंसद्वारे कहे देवी ललिता-सुन्दरी॥ 'रासक्रीड़ा-रसमय, रसेरे कारणे। बेंधेछिले राधिकारे प्रणयबन्धने॥ मम प्रिय सखी-प्रति निरपेक्ष केन। राधिका एसब कथा सदा स्मरे येन॥ नासारन्ध्रे तुलाखण्ड परीक्षा करिब। श्वास बहिलेइ धिक् ताहाके जानिब॥'” [अर्थात् (ब्रजसे) मथुरा जाकर वास करनेवाले श्रीकृष्णका तिरस्कार करते हुए श्रीललिता-सुन्दरी हंसके द्वारा उन्हें सन्देश भेज रही हैं,–“हे रासक्रीड़ा रसिक! उस समयके विशेष सौभाग्यका क्या तुम्हें स्मरण है? पूर्वकालमें व्रजवासके समय तुमने मेरी सखीको नित्य नवनवायमान दुर्बोध प्रेम-परम्परामें आबद्ध कर लिया था। अहो! इस समय वही तुम यदि उनके प्रति निष्ठुर और निरपेक्ष व्यवहार करोगे, तो मैं इस हतभागिनी राधाको ही धिक्कार प्रदान कर रही हूँ, क्योंकि इसकी चरम दशा मृत्युके निकट होनेके कारण नाड़ीकी अत्यन्त क्षीणतावशतः श्वासोंका सञ्चार बोध करनेके लिये उसकी नासिकाके सामने रखा रुईका खण्ड अभी भी धीरे-धीरे हिल रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि तुम्हारे आगमनकी आशासे इसके शरीरमें प्राण किसी प्रकारसे बचे हुए हैं। तुम निश्चित ही नहीं आओगे, यदि यह बात वह जान लेगी तो महा-अनर्थ हो जायेगा। इसलिये अनुरोध करती हूँ कि अविलम्ब ब्रजमें आगमनकर प्रियसखियोंसे परिवेष्टित प्रियसखीको सञ्जीवित करो॥”] ॥ 53 ॥ एइ दश-दशाय प्रभु व्याकुल रात्रि-दिने। कभु कोन दशा उठे, स्थिर नहे मने॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभु इन दस दशाओंमें रात-दिन व्याकुल रहते थे। कभी किसी भी दशाके उठनेसे