भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2380

[ 14/43–54 चौदहवाँ अध्याय 363

उनका मन स्थिर नहीं रह पाता था॥ 54॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णकी रूपमाधुरी, वेणुमाधुरी, लीलामाधुरी और गुणमाधुरी—इनको वैष्णवों अथवा गुरुसे श्रवण करके जो लोभ उत्पन्न होता है, वह लोभ ही पात्र है। महाप्रभुके मनरूपी योगीको श्रीकृष्णके रूप, लीलादिकी माधुरीके आस्वादन करनेके लिये प्रगाढ़ अवस्था तक लोभ हो गया है। जिसे ऐसा लोभ हो जाता है, तो वह रागानुगा भक्तिका अधिकारी हो जाता है और वह लौकिक, वैदिकादि जितने भी धर्म हैं, उन सबका परित्याग कर देता है। जैसे एक बैलको भूख लगी है, तो वह सुगम मार्गकी अपेक्षा न करके सीधा काँटोंवाली मेढ़ आदि बाधाओंको भी पार करके खेतमें चरने चला जाता है। इसी प्रकार जिस व्यक्तिको इसका लोभ हो जाता है, वह वेद-धर्मका परित्याग कर देता है। वेदके दो भाग हैं—एक रहस्यपूर्ण भाग है और दूसरा बाहरी भाग है। वह वेद-वेदान्त-उपनिषदादिके प्रतिपाद्य भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी भक्तिके रहस्यपूर्ण भागको ग्रहण करता है, किन्तु शरीर और मन सम्बन्धित वेदके बाहरी धर्मका त्याग कर देता है। साधारण योगी लोग कारीगरके द्वारा बनाये गये मोटे-मोटे कुण्डल अपने दोनों कानोंमें धारण करते हैं, किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने भागवतमें शुकदेव गोस्वामीके द्वारा वर्णित श्रीकृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-कुण्डलके रूपमें धारण किया है। सामान्य योगीके समस्त क्रियाकलापोंको महाप्रभुके मनरूपी योगीने भी स्वीकार किया है, किन्तु अन्य रूपमें। सामान्य योगी लोग सूखी हुई लौकीका पात्र बनाकर उसे साथ लेकर चलते हैं। उसीमें खाने-पीनेकी वस्तुएँ भर लेते हैं और बादमें निकालकर खा लेते हैं। महाप्रभुके मनरूपी योगीका तृणारूपी कृष्ण-माधुरीका लोभ उसके लिये कमण्डलु है। यही उसका भोजनका पात्र है। तृष्णा अर्थात् लोभ और 'कृष्णको मैं पाऊँगा' यह आशारूपी झोली है। तृष्णा और आशा—इसके द्वारा ही वह जीवित रहता है। 'किस प्रकार कृष्ण मिलेंगे'—उसकी एकमात्र यही चिन्ता है। यही उसके लिये गुदड़ी है। उसे अन्य कोई चिन्ता नहीं है। सांसारिक लोगोंकी सैकड़ों चिन्ताएँ हैं और मकड़ीके जालकी भाँति स्वयं ही वे उसे अपने चारों ओर बना लेते हैं। किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने तृष्णा या आशाकी झोली ली है कि कैसे कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे? बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बना लिया है। उनकी कोई इन्द्रिय किसी वेगके अधीन नहीं है। महाप्रभु अपने आचरणके द्वारा शिक्षा दे रहे हैं कैसे दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर भोग-ग्रामसे निकालकर वृन्दावनमें ले जाना चाहिये। कृष्णविमुख मायाबद्ध जीवकी एक भी इन्द्रिय उसकी शिष्या नहीं है, अपितु वे उसकी स्वामिनी हैं। वह उनका शिष्य है। जैसा उसका मन कहता है, उसकी आँख कहती है, उसकी जिह्वा कहती है, वह वैसे ही करता है। विशेषकर जिह्वा उसकी स्वामिनी है, वह उसे वृन्दावनसे ठीक विपरीत दिशामें भोग-ग्राममें ले जाती है। वह सांसारिक विषय भोगोंको ही अपनी प्रचण्ड सम्पत्ति, महाधन समझता हैं। वह उसे ऐसे जकड़कर रखता है कि कभी कोई भिखारी, अतिथि अथवा वैष्णव भी आयें, तो उसमेंसे थोड़ा-सा भी धन नहीं देता। संसारमें कुछ दानी लोगोंका उदाहरण मिलता है। जैसे महाराज हरीशचन्द्रने अपने राज्यका, दधीचि ऋषिने वज्र बनानेके लिये अपने प्राणोंका और महाराज शिविने अपने शरीरके मांसका दान कर दिया। परन्तु उनका यह त्याग श्रीकृष्णकी प्रसन्नता अथवा प्रेमसेवाके लिये नहीं है। यह सात्त्विक त्याग है और उसके फलस्वरूप वे केवल इस जगत्में नश्वर उच्च लोकोंमें जानेके अधिकारी बने। परन्तु हम देखते हैं कि श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्तिके लिये श्रीरघुनाथदास गोस्वामी इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान पत्नीका त्याग