भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2381

364 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/43-54 ] करके महाप्रभुके पास जगन्नाथ पुरी चले गये। इसी प्रकार श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामीने भी उच्च पद और विपुल धनका त्याग किया। महाप्रभुने भी युवावस्थामें अपनी वृद्धा माता और युवा पत्नीको निःसहाय छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। महाप्रभुकी धारामें जितने भी आचार्य हुए हैं, उन्होंने भी अपना सर्वस्व त्याग किया है। उन्माद दशामें महाप्रभु कह रहे हैं कि मेरा मनरूपी योगी सबकुछ त्यागकर वृन्दावनमें चला गया है। ‘अन्येर हृदय-मन, मोर मन-वृन्दावन।' दूसरे लोगोंका जो हृदय है वह मन है, किन्तु मेरा मन वृन्दावन है। वृन्दावनमें जितने वृक्षादि स्थावर और पशु-पक्षी-मनुष्य आदि जङ्गम प्राणी हैं, वे सब गृहस्थ हैं। भूख-प्यास लगनेपर मेरा मनरूपी योगी अपने शिष्योंके सहित इन गृहस्थोंके आश्रममें भिक्षा करता है। यमुना व्रजेन्द्रनन्दनकी गृहिणी हैं। 'यामुन-जीवन केलि-परायण' प्यास लगनेपर यमुनाके निकट भिक्षा करता है, परन्तु भिक्षामें क्या माँगता है यामुन-जीवन। यमुनाके तटपर होनेवाली श्रीकृष्णकी केलि-लीलाएँ यमुनाका जीवन है, उन्हीं लीलाओंको यमुनाजीसे भिक्षाके रूपमें माँगता है। यमुना तटपर शृङ्गारवट जाकर भिक्षा माँगता है कि कब मेरा ऐसा दिन होगा जब श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमाका शृङ्गार करते समय मुझसे कहेंगे, —'कंघी, सिन्दूर, आलता आदि ले आओ।' और मैं कितनी सौभाग्यवती होकर इन सबको लाकर उन्हें समर्पित करूँगी। सेवाकुञ्जमें श्रीकृष्ण ललिताजीसे अनुरोध कर रहे हैं, —'देखो! तुम्हारी आराध्या देवी मान नहीं रही है, मेरी सहायता करो।' तो ललिताजी राधाजीको समझाने लगीं, —'अरी दुर्भागी! क्या कर रही हो? यह नहीं जानती कि यदि ये अभी चले जायेंगे, तो फिर तुम क्या करोगी? मान उतना ही करना चाहिये जितना उचित है।' सेवाकुञ्जसे यह भिक्षा माँगता है कि जब ललिताजी इस प्रकारके वचन राधाजीसे कहेंगी, मैं उस समय वहाँ अपने कानोंके दोनेमें कब इसका पान करूँगी। ब्रजमें जहाँ-जहाँपर जैसी लीला होती है, उसी प्रकारसे यह भिक्षाकी झोली फैलाकर उनसे प्रार्थना करता है। ये लीलाएँ ही लीलास्थलियोंकी सम्पत्ति हैं और वे उन्हें भिक्षामें दान कर सकती हैं। उनसे यह भिक्षा माँगता है कि आपके यहाँ जो कृष्ण-लीलाएँ हुईं, मेरे हृदयमें वे सदा स्फुरित होती रहें और मैं इस प्रकारसे श्रीराधाकृष्णकी सेवा कर सकूँ। विशेषकर ब्रजमें कुछ गृहस्थ हैं जो सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, जैसे राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, यमुना, गोवर्धन, तुलसी, वृन्दा, योगमाया, पूर्णिमा, निधिवन, सेवाकुञ्ज, वंशीवट, इमलीतट आदि। ब्रजकी धूलि भी साधारण नहीं है, यह राधा-कृष्णकी चरण-धूलि है, यह सबकुछ देनेमें समर्थ है। गोपियाँ कृष्णके नाम, रूप, गुण, रस, गन्ध, स्पर्शका आस्वादन करती हैं। जब उनका पूरा भोजन हो जायेगा और उसमें-से थोड़ा-सा अवशेष रह जायेगा, उसको यह योगी लेकर अपने शिष्योंको (केवल पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको, क्योंकि कर्मेन्द्रियाँ उसका आस्वादन नहीं कर सकतीं) देता है। गोपियोंके उस उच्छिष्टको प्राप्त करके ये शिष्य आनन्दसे उसकी सेवा करेंगे। सामान्य योगियोंका इष्टदेव अलख-निरञ्जन होता है। अलख अर्थात् जिसको देखा नहीं जाता, जिसका कोई रूप, नाम, गुण, लीला आदि नहीं है। उसके लिये वे कहते हैं कि मनमें ही उन अलख-निरञ्जनका दर्शन हो गया। किन्तु मेरे अभीष्ट कृष्णकी नाम, रूप, गुण, लीला आदि अनेक प्रकारकी मधुरियाँ हैं और मेरा मन उनका साक्षात् दर्शन चाहता है। उनकी लीला माधुरियोंका मैं आस्वादन करूँगा। सामान्य योगी ध्यान लगाते हैं और मेरा मनरूपी योगी ध्यान हटाकर जागरण करता है अर्थात् उन सब लीलाओंका ध्यान करता है। कब कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे, कब मेरा जीवन सफल होगा? इसी प्रकारसे महाबाउल होकर वृन्दावनमें यह विचरण करता है। कृष्ण जब ध्यानमें नहीं आते हैं, तब कृष्णके वियोगमें योगी