श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 14/43-61 चौदहवाँ अध्याय 365 अत्यन्त दुःखी हो जाता है और कृष्णविरहमें उसकी चिन्ता, जागरण, प्रलाप, उन्माद, मृत्यु आदि दस दशाएँ होती हैं। भक्तिमें मृत्यु नहीं होती। श्रीमती राधिका और महाप्रभुकी यह दस दशाएँ होती थीं जो अन्य किसीमें नहीं देखी जाती। कृष्णके मथुरा चले जानेपर उनके विरहमें उन्मत्त होकर श्रीमती राधिकाने कहा,–‘मेरी यह कामना है कि मेरे मर जानेपर मेरी भुजाओंके द्वारा तमाल वृक्षका आलिङ्गन करवा देना। और शरीर जलानेके बाद जब उसके पञ्चतत्त्व अलग हो जायेंगे, तब मेरे अन्दरकी अग्निको नन्दबाबाके आँगनमें सूर्यके प्रकाशमें मिला देना। मेरे शरीरकी जो मिट्टी है वह राख बन जायेगी, उसे नन्दबाबाके भवनकी भूमिके साथ मिला देना जिससे मुझे कृष्णके चरणोंका स्पर्श प्राप्त हो सके। शरीरके जलको पावन सरोवरमें मिला देना जिससे मैं कृष्णको स्नान करा सकूँ। शरीरकी वायुको चामरमें मिला देना जिससे मेरे शरीरकी वायु कृष्णके अङ्गोंसे मिले और आकाशको नन्दबाबाके आकाशमें मिला देना।’ किन्तु राधाजी पुनः विचार करती हैं कि जब मेरे प्रियतम कृष्ण मेरे मरनेके बाद व्रजमें आयेंगे और पूछेंगे कि राधा और अन्य गोपियाँ कहाँ हैं और लोगोंके मुखसे सुनेंगे कि राधा मर गयी, गोपियाँ भी मर गयीं, तो यह सुनकर वे भी मरनेको तत्पर होंगे। उन्हें अत्यन्त दुःख होगा। इस विचारसे गोपियाँ ‘मैं मर जाऊँ’ ऐसा नहीं सोचतीं। ‘कृष्ण व्रजमें आयेंगे’ वे एक यही आशा लेकर जीवित रहती हैं। महाप्रभुकी कब-कब कैसी-कैसी दशा होती है, कोई नहीं कह सकता। उनका चित्त स्थिर नहीं रहता, वे कभी विलाप करते हैं, कभी उनके अङ्गोंमें पुलक हो जाते हैं, कभी आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा होती है और कभी रोमाञ्च हो उठता है।–“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 43-54 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके विप्रलम्भ-भावके उपयोगी-कालोचित श्लोकका पाठ :— एत कहि’ महाप्रभु मौन करिला। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 55 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उनके भावके अनुसार गानके द्वारा महाप्रभुकी चेतनताका सम्पादन :— स्वरूप-गोसाञि करे कृष्णलीला-गान। दुइ जने किछु कैला प्रभुर बाह्य-ज्ञान ॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभु दिव्योन्मादकी दशामें अपने भावोंको कहकर मौन हो गये। श्रीरामानन्द राय विप्रलम्भ-भावोपयोगी श्लोक पढ़ने लगे और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी कृष्णलीलाका गान करने लगे। इन दोनोंके इस प्रकार कुछ कहनेपर महाप्रभुको बाह्य-ज्ञान हुआ ॥ 55-56 ॥ घरमें महाप्रभुका शयन :— एइमत अर्द्धरात्रि कैला निर्यापण। भितर-प्रकोष्ठे प्रभुरे कराइला शयन ॥ 57 ॥ सभीका निर्दिष्ट स्थानपर शयन :— रामानन्द-राय तबे गेला निज घरे। स्वरूप-गोविन्द दुँहे शुइलेन द्वारे ॥ 58 ॥ अनुवाद—इस प्रकार अर्द्धरात्रि बीत जानेपर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको भीतरके प्रकोष्ठमें लिटा दिया। तब श्रीरामानन्द राय अपने घर चले गये और श्रीस्वरूप दामोदर एवं श्रीगोविन्द महाप्रभुके कमरेके द्वारपर ही सो गये ॥ 57-58 ॥ महाप्रभुका सम्पूर्ण रात्रि जागकर कृष्णनामका कीर्तन :— सब रात्रि महाप्रभु करे जागरण। उच्च करि’ कहे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 59 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सारी रात जागते रहे और उच्च स्वरसे कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करते रहे ॥ 59 ॥ कीर्तन और शब्दके अभावमें महाप्रभुको सभीके द्वारा ढूँढ़ना और उनका नहीं मिलना :— शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट कैला दूरे। तिनद्वार देओया आछे, प्रभु नाहि घरे ! ! 60 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बादमें महाप्रभुका कीर्तन नहीं सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके कमरेका द्वार