भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2383

366 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/61-70 ] खोला। उन्होंने देखा कि तीनों द्वार तो बन्द थे, किन्तु महाप्रभु कमरेके भीतर नहीं थे !60॥ चिन्तित हइल सबे प्रभुरे ना देखिया। प्रभु चाहिं बुले सबे व्याकुल हञा ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको उनके कमरेमें नहीं देखकर सभी भक्त चिन्तित हो गये। सभी व्याकुल होकर महाप्रभुको इधर-उधर ढूँढ़ने लगे ॥ 61 ॥ महाप्रभुकी अचेतन अवस्थामें प्राप्ति :- सिंहद्वारेर उत्तर-दिशाय आछे एक ठाञि। तार मध्ये पड़ि' आछेन चैतन्य-गोसाञि ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें स्थित एक कोनेमें श्रीचैतन्य गोसाईं अचेतन अवस्थामें पड़े हुए थे॥ 62 ॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंका हर्ष और विषाद :- देखि' स्वरूप-गोसाञि आदि आनन्दित हैला। प्रभुर दशा देखि' पुनः चिन्तिते लागिला ॥ 63 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको वहाँ देखकर श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्त पहले तो आनन्दित हुए, किन्तु महाप्रभुकी अचेतन दशाको देखकर वे बहुत चिन्तित हुए॥ 63 ॥ वैसी अवस्थावाले महाप्रभुका वर्णन :- प्रभु पड़ि' आछेन दीर्घ हात पाँच-छय। अचेतन देह, नासाय श्वास नाहि बय ॥ 64 ॥ एक एक हस्त-पाद—दीर्घ तिन हात। अस्थिग्रन्थि भिन्न, चर्म्मे आछे मात्र तात ॥ 65 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अचेतन होकर पड़े थे और उनकी देह पाँच-छह हाथ लम्बी हो गयी थी। नाकमें श्वास नहीं चल रही थी। महाप्रभुका एक-एक हाथ और पैर तीन-तीन हाथ लम्बे हो गये थे। उनकी अस्थियोंके जोड़ खुल गये, केवलमात्र त्वचासे ही अस्थियाँ टिकी हुई थीं। उनकी देहमें जीवनके अस्तित्वको दिखलानेवाली उष्णता भी थी॥ 64-65 ॥ अनुभाष्य— 'तात',—जीवनके अस्तित्वका ज्ञापक उष्ण-भाव (देहकी गर्मी) ॥ 65 ॥ हस्त, पाद, ग्रीवा, कटि, अस्थि, सन्धि यत। एक एक वितस्ति भिन्न हञाछे तत ॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके हाथ, पैर, गर्दन, कमर आदिकी अस्थियोंके जितने जोड़ थे, वे सभी एक-एक वितस्ति (हथेली फैलाकर अँगूठे और कनिष्ठ अँगुलीके छोरके बीचकी दूरी) जितने दूर हो गये॥ 66 ॥ चर्ममात्र उपरे, सन्धि आछे दीर्घ हञा। दुःखित हइला सबे प्रभुरे देखिया ॥ 67 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके अङ्गोंके जोड़ खुलकर लम्बे हो गये, त्वचामात्र उन जोड़ोंके ऊपर दिखलायी दे रही थी। महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्त बहुत दुःखी हुए॥ 67 ॥ मुखे लाला-फेन प्रभुर उत्तान-नयन। देखिया सकल भक्तेर देह छाड़े प्राण ॥ 68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे फेनयुक्त लार निकल रही थी और उनके नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये थे। उनकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्तोंकी देहसे प्राण निकलनेवाले ही थे॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'उत्तान-नयन',—नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये॥ 68 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उच्चस्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका उच्चारण :- स्वरूप-गोसाञि तबे उच्च करिया। प्रभुर काणे कृष्णनाम कहे भक्तगण लञा ॥ 69 ॥ अनुवाद—ऐसा देखकर श्रीस्वरूप दामोदर भक्तोंके साथ महाप्रभुके कानोंके निकट उच्चस्वरसे कृष्णनाम