भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2384, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2384

[ 14/70-77 चौदहवाँ अध्याय 367

करने लगे ॥ ६९ ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- बहुक्षणे कृष्णनाम हृदये पशिला। 'हरिबोल' बलि' प्रभु गर्जिया उठिला ॥ ७० ॥ अनुवाद-उनके द्वारा बहुत देर तक कृष्णनाम करनेके पश्चात् वह महाप्रभुके हृदयमें प्रविष्ट हो गया, तब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर गर्जन करते हुए उठे॥ ७० ॥ चेतन पाइते अस्थि-सन्धि लागिल। पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल ॥ ७१ ॥ अनुवाद-महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनकी अस्थियोंके जोड़ जुड़ गये और उनकी देह पहले जैसी हो गयी ॥ ७१ ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें इस वृत्तान्तका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथदास। 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछे प्रकाश ॥ ७२ ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी ऐसी लीलाको श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥ ७२ ॥ काशीमिश्रके घरमें कृष्णविरहग्रस्त महाप्रभुकी दशा :- स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका चतुर्थ श्लोक- क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्योरुविरहात् श्लथच्छ्रीसन्धित्वादधदधिकदैर्घ्यं भुजपदोः। लुठन् भूमौ काक्वा विकलविकलं गद्गदवचा रुदन् श्रीगौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ ७३ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकाशीमिश्रके घरमें श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुके समस्त जोड़ खुल गये, जिससे उनके हाथ और पैर बहुत लम्बे हो गये। भूमिपर काकुस्वरमें व्याकुल होकर गद्गद वचन बोलते हुए लोट-पोट खाते-खाते रोनेवाले वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं ॥ ७३ ॥ अनुभाष्य- क्वचित् मिश्रावासे (काशीमिश्रगृहे) व्रजपतिसुतस्य (नन्दनन्दनस्य) उरुविरहात् (अत्यन्तविच्छेदात्) श्लथच्छ्रीसन्धित्वात् (श्लथन् निजनिजाश्रयं त्यजन् श्रीः शोभा सन्धिश्च ययोः) भुजपदोः (बाहुचरणयोः) अधिकदैर्घ्यं दधत् (धारयन्) भूमौ लुठन् काक्वा (कातरया वाण्या) गद्गदवचा विकल-विकलम् (अतिशयेन विकलं) रुदन् सः गौराङ्गः मम हृदये उदयन् (प्रकटयन्) सन् मां मदयति (हर्षयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अर्द्धबाह्यदशामें महाप्रभुके द्वारा लोगोंके एकत्रित होनेके कारणकी जिज्ञासा :- सिंहद्वारे देखि' प्रभुर विस्मय हइला। “क्या कर, किवा”-एइ स्वरूपे पुछिला ॥ ७४ ॥ अनुवाद-स्वयंको सिंहद्वारपर देखकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,-“तुम लोग क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे हो?" ७४ ॥ अनुभाष्य-'क्या कर, किवा', -क्या कर रहे हो, क्यों ॥ ७४ ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना और सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- स्वरूप कहे,-“उठ, प्रभु, चल निज-घरे। तथाइ तोमारे सब करिमु गोचरे ॥ "७५ ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“हे महाप्रभु ! उठिये, अपने वासस्थानपर चलिये। वहींपर मैं आपको यह सब बतलाऊँगा ॥ "७५ ॥ एत बलि' प्रभुरे धरि' घरे लञा गेला। ताँहार अवस्था सब कहिते लागिला ॥ ७६ ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको