श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें368 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/77–86 ] पकड़कर उनके वासस्थानपर ले गये। वहाँ उन्होंने महाप्रभुको उनकी सिंहद्वारपर जो अवस्था थी, उसके विषयमें सबकुछ बतलाया ॥ 76 ॥ बाह्यदशामें आकर महाप्रभुका विस्मय और अपनी अवस्थाका वर्णन :- शुनि' महाप्रभु बड़ हैला चमत्कार। प्रभु कहे,—“किछु स्मृति नाहिक आमार ! ! 77 ॥ सबे देखि—हय मोर कृष्ण विद्यमान। विद्युत्प्राय देखा दिया हय अन्तर्धान ॥”78 ॥ अनुवाद—अपनी उस अवस्थाके विषयमें सुनकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। महाप्रभुने कहा,—“मुझे अपनी उस अवस्थाका कुछ भी स्मरण नहीं है। मुझे तो यही स्मरण है कि मैंने अपने कृष्णको देखा और वे विद्युतकी (बादलोंमें चमकनेवाली बिजलीकी) भाँति झलक दिखलाकर अन्तर्धान हो गये ॥” 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- हेनकाले जगन्नाथेर पाणि-शङ्ख बाजिला। स्नान करि' महाप्रभु दरशने गेला ॥ 79 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें पाणि-शङ्ख बजा। महाप्रभु स्नान करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करनेके लिये चले गये ॥ 79 ॥ अनुभाष्य—'पाणि-शङ्ख',—हाथमें पकड़कर मुखसे बजानेवाला शङ्ख; अथवा द्वारको खोलनेके समय हाथ-तालीका शब्द; पाठान्तरमें—'पानी-शङ्ख',—(आचमन करनेवाला) शङ्ख ॥ 79 ॥ महाप्रभुका महाभाव-विकार विस्मयजनक :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर अद्भुत विकार। याहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनदेखा-अनसुना महाभाव :- लोके नाहि देखे ऐछे, शास्त्रे नाहि शुनि। हेन भाव व्यक्त करे न्यासि-चूड़ामणि ॥ 81 ॥ अप्राकृत अधोक्षज-भावमुद्रा अक्षज ज्ञानीकी समझसे परे :- शास्त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय। इतर-लोकेर ताते ना हय निश्चय ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुमें प्रकाशित होने वाले अद्भुत विकारोंका वर्णन किया, जिन्हें सुनकर लोगोंको बहुत आश्चर्य होता है। क्योंकि लोगोंने न तो पहले किसीमें ऐसे विकार कभी देखे हैं और न ही शास्त्रोंमें सुने हैं, जिन्हें संन्यासी-चूड़ामणि महाप्रभुने प्रकाशित किया। शास्त्र और लोकातीत जो-जो भाव होते हैं, भगवद्-विमुख और साधारण लोगोंका उनमें विश्वास नहीं होता ॥ 80-82 ॥ अप्राकृत अनुभूतिसे श्रौत-पन्थामें ग्रन्थकारके द्वारा वर्णन :- रघुनाथ-दासेर सदा प्रभुसङ्गे स्थिति। ताँर मुखे शुनि' लिखि करिया प्रतीति ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा महाप्रभुके पास रहते थे। महाप्रभुकी इन सब लीलाओंको उन्हींके मुखसे श्रवण करके उनके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखते हुए सब लिख रहा हूँ॥ 83 ॥ महाप्रभुके द्वारा चटक-पर्वतको गोवर्धन मानकर महाभावके आवेशमें उसकी ओर द्रुतगतिसे दौड़ना :- एकदिन महाप्रभु समुद्रे याइते। 'चटक'-पर्वत देखिलेन आचम्बिते ॥ 84 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभु समुद्रकी ओर जा रहे थे कि उन्हें अचानक 'चटक'-पर्वत दिखलायी दिया ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—''चटक'-पर्वत',—बालूका पर्वत जैसा ऊँचा स्तूप; बालूका टीला ॥ 84 ॥ गोवर्धन-शैल-ज्ञाने आविष्ट हइला। पर्वत-दिशाते प्रभु धाञा चलिला ॥ 85 ॥