भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2386, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2386

[ 14/86-97 चौदहवाँ अध्याय 369 अनुवाद—चटक-पर्वतको गिरिराज गोवर्धन मानकर उसमें आविष्ट होकर महाप्रभु पर्वतकी दिशामें दौड़ पड़े॥ 85॥ श्रीमद्भागवत (10/21/18) में— हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरण-स्पर्श-प्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सूयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 86॥ अनुवाद—ये गोवर्धन पर्वत—वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ—घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 86॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 18/34 संख्या देखें॥ 86॥ साथी श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :— एइ श्लोक पड़ि' प्रभु चलेन वायुवेगे। गोविन्द धाइल पाछे, नाहि पाय लागे॥ 87॥ शोर मचाते हुए लोगोंका पीछे दौड़ना :— फुकार पड़िल, महा-कोलाहल हइल। येइ याँहा छिल, सेइ उठिया धाइल॥ 88॥ सभी भक्तोंका वहाँपर आगमन :— स्वरूप, जगदानन्द, पण्डित-गदाधर। रामाइ, नन्दाइ आर पण्डित-शङ्कर॥ 89॥ पुरी-भारती-गोसाञि आइला सिन्धुतीरे। भगवान्-आचार्य-खञ्ज, चलिला धीरे धीरे॥ 90॥ अनुवाद—इस श्लोकको पढ़ते हुए महाप्रभु वायुके वेगसे दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्द भी महाप्रभुके पीछे दौड़े, किन्तु वे उनके निकट नहीं पहुँच पाये। कोई भक्त यह देखकर चिल्लाया और उसे सुनकर सभी कोलाहल करने लगे। जो जहाँपर भी था, वह उठकर महाप्रभुके पीछे दौड़ पड़ा। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती गोस्वामी समुद्रतटपर आ गये। श्रीभगवान् आचार्य लँगड़ाकर चलते थे, इसलिये वे धीरे-धीरे चलने लगे॥ 87-90॥ मार्गमें स्तम्भ आदि विकारका वर्णन :— प्रथमे चलिला प्रभु,—येन वायुगति। स्तम्भभाव पथे हैल, चलिते नाहि शक्ति॥ 91॥ अनुवाद—पहले तो महाप्रभु वायुकी गतिसे दौड़े चले जा रहे थे, किन्तु मार्गमें उनमें स्तम्भ-भाव उदित हो आया, जिसके कारण उनमें चलनेकी शक्ति तक चली गयी॥ 91॥ प्रति रोमकूपे मांस-व्रणेर आकार। तार उपरे रोमोद्गम-कदम्बप्रकार॥ 92॥ प्रति-रोमे प्रस्वेद पड़े रुधिरेर धार। कण्ठे घर्घर, नाहि वर्णेर उच्चार॥ 93॥ दुइ नेत्रे भरि' अश्रु बहये अपार। समुद्रे मिलिला येन गङ्गा-यमुना-धार॥ 94॥ वैवर्ण्य शङ्खप्राय, श्वेत हैल अङ्ग। तबे कम्प उठे,—येन समुद्रे तरङ्ग॥ 95॥ महाप्रभुका गिरना :— काँपिते काँपिते प्रभु भूमेते पड़िला। तबे त' गोविन्द प्रभुर निकटे आइला॥ 96॥ अनुवाद—महाप्रभुका प्रत्येक रोमकूप मुँहासेकी भाँति हो गया और उसके ऊपर रोमाञ्चका होना ऐसा प्रतीत हुआ मानो कदम्बका पुष्प खिल रहा हो। उनके प्रत्येक रोमकूपसे पसीनेके साथ रक्तकी भी धारा प्रवाहित हो रही थी। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, केवल उनके कण्ठसे घर-घरका शब्द निकल रहा था। उनके दोनों नेत्रोंसे अपार अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो गङ्गा और यमुनाकी धाराएँ समुद्रमें मिलने जा रही हों। उनकी अङ्गकान्ति शङ्खकी भाँति