श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें370 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/97-107 ] श्वेत हो गयी, उनके दिव्य कलेवरमें समुद्रकी तरङ्गोंकी भाँति कम्पन होने लगा। वे काँपते-काँपते भूमिपर गिर पड़े। तब श्रीगोविन्द महाप्रभुके निकट आये ॥ 92-96 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा जल छिड़कना और पंखा झलकर महाप्रभुको चेतन करनेका प्रयास :- करङ्गेर जले करे सर्वाङ्ग सिञ्चन। बहिर्वास लञा करे अङ्ग संबीजन ॥ 97 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर कमण्डलुके जलको छिड़का और बहिर्वाससे उन्हें पंखा झलने लगे ॥ 97 ॥ महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर सभीके द्वारा रोना :- स्वरूपादिगण ताँहा आसिया मिलिला। प्रभुर अवस्था देखि' कान्दिते लागिला ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भी वहाँ आ पहुँचे और वे महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर क्रन्दन करने लगे ॥ 98 ॥ महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकारोंको देखकर सभीका विस्मय :- प्रभुर अङ्गे देखे अष्टसात्त्विक विकार। आश्चर्य सात्त्विक देखि' हैला चमत्कार ॥ 99 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने महाप्रभुके अङ्गोंमें अष्ट-सात्त्विक विकार देखे। वे इन सात्त्विक विकारोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'अष्टसात्त्विक विकार',—स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय ॥ 99 ॥ सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दादिके द्वारा जल छिड़कना :- उच्च सङ्कीर्त्तन करे प्रभुर श्रवणे। सुशीतल जले करे प्रभुर अङ्ग सम्मार्जने ॥ 100 ॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानोंके निकट उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन करने लगे और सुशीतल जलसे महाप्रभुके दिव्य अङ्गोंका सम्मार्जन (स्वच्छ) करने लगे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'श्रवणे',—कानके निकट ॥ 100 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- एइमत बहुबार कीर्त्तन करिते। 'हरिबोल' बलि' प्रभु उठे आचम्बिते ॥ 101 ॥ अनुवाद—इस प्रकार बहुत देर तक कीर्तन करनेपर महाप्रभु अचानक 'हरिबोल' बोलते हुए उठ खड़े हुए ॥ 101 ॥ प्रसन्नतासे भरकर सभीके द्वारा हरिध्वनि :- सानन्दे सकल वैष्णव बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि चतुर्दिक भरि' ॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके खड़े होनेपर सभी वैष्णव आनन्दसे 'हरि', 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलमयी 'हरि' ध्वनिसे चारों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ 102 ॥ महाप्रभुकी अर्द्धबाह्यदशा :- उठि' महाप्रभु विस्मित, इति उति चाय। ये देखिते चाय, ताहा देखिते ना पाय ॥ 103 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उठकर आश्चर्यचकित होकर इधर-उधर देखने लगे, वे जो देखना चाहते थे, वे उसे नहीं देख पा रहे थे ॥ 103 ॥ 'वैष्णव' देखिया प्रभुर अर्द्धबाह्य हइल। स्वरूप-गोसाञिरे किछु कहिते लागिल ॥ 104 ॥ अनुवाद—वैष्णवोंको 'हरि' 'हरि' बोलते देखकर महाप्रभु अर्द्धबाह्यदशामें आ गये। वे श्रीस्वरूप दामोदरको कुछ कहने लगे— ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'अर्द्धबाह्य',—सम्पूर्ण बाह्य संज्ञा (चेतनता) प्राप्त नहीं करके ॥ 104 ॥