श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
354 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/24-30 ] और वह अपना एक पैर महाप्रभुके कन्धेपर रखकर जगन्नाथजीके दर्शन करने लगी ॥ 24 ॥ यह देखकर श्रीगोविन्दके द्वारा उस स्त्रीको मना करना :- देखिया गोविन्द व्यस्ते सेइ स्त्रीरे वर्जिला। तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीगोविन्दने तुरन्त उस स्त्रीको ऐसा करनेसे मना किया। किन्तु महाप्रभुने श्रीगोविन्दको उस स्त्रीको नीचे उतारनेके लिये मना किया ॥ 25 ॥ अनुभाष्य—गरुड़के ऊपर चढ़नेसे वैष्णवापराध और महाप्रभुके कन्धेके ऊपर पैर रखनेसे भगवान्के चरणकमलोंमें अपराध—इस आशङ्कासे शीघ्रतापूर्वक गोविन्दने उस स्त्रीको मना किया अर्थात् उसे नीचे उतार दिया ॥ 25 ॥ कृष्णदर्शनके द्वारा कृष्णके सेवासुखका विधान करने हेतु स्त्री-मूर्तिको अप्राकृत कृष्णभक्त मानना :- “'आदिवस्या' एइ स्त्रीरे ना कर वर्जन। करुक यथेष्ठ जगन्नाथ-दरशन ॥” 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा, —“दर्शनके लिये अतिव्यग्र इस स्त्रीको ऐसा करनेसे मत रोको, उसे जी भरकर भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करने दो॥” 26 ॥ अनुभाष्य—'आदिवस्या',—अन्त्यलीला 10/116 संख्या देखें ॥ 26 ॥ उस स्त्रीका तत्क्षणात् नीचे उतरना और महाप्रभुको प्रणाम करके अपनी दैन्यरूपी उक्तिका ज्ञापन :- आस्ते-व्यस्ते सेइ नारी भूमेते नामिला। महाप्रभुरे देखि' ताँर चरण वन्दिला ॥ 27 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीको अपने कियेका जब ज्ञान हुआ, तब वह तुरन्त ही नीचे उतर गयी और उसने महाप्रभुको देखकर उनके चरणकमलोंकी वन्दना की ॥ 27 ॥ उसकी प्रेम भरी उत्कण्ठाको देखकर उसे गुरु मानकर महाप्रभुके द्वारा दैन्यपूर्वक स्तुति :- तार आर्त्ति देखि' प्रभु कहिते लागिला। “एत आर्त्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला ! ! 28 ॥ अनुवाद—उस स्त्रीकी भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये उत्कण्ठा देखकर महाप्रभु कहने लगे, —“मुझे भगवान् जगन्नाथने अपने दर्शनके लिये इतना आग्रह प्रदान नहीं किया ! ! 28 ॥ अनुभाष्य—'आर्त्ति',—दर्शनका आग्रह; जगन्नाथके दर्शनके आग्रहके कारण [उस स्त्रीने] हित-अहितके विचारसे रहित होकर परम-वन्दनीय महाप्रभुके उत्तम अङ्गपर अनजानेमें चरण रखा था ॥ 28 ॥ इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा श्रीकृष्णके सेवकको 'स्त्री-पुरुषादि' रूपी बाह्य परिचयसे देखनेके निषेधकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे आविष्ट इहार तनु-मन-प्राणे। मोर स्कन्धे पद दियाछे, ताहा नाहि जाने ॥ 29 ॥ अनुवाद—इस स्त्रीके देह-मन और प्राण भगवान् श्रीजगन्नाथमें इतने आविष्ट हैं कि इसे यह तक भी पता नहीं चला कि इसने मेरे कन्धेपर अपना पैर रखा है॥ 29 ॥ अहो भाग्यवती एह, वन्दि इहार पाय। इहार प्रसादे ऐछे आर्त्ति आमार वा हय ! ! 30 ॥ अनुवाद—अहो ! यह परम सौभाग्यशालिनी है, मैं इसके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। मुझमें भी इसकी कृपासे ऐसी उत्कण्ठा उत्पन्न हो ! ! 30 ॥ अमृताणुकणिका—महाप्रभु विचार कर रहे हैं कि यदि उस स्त्रीके समान मेरा आवेश हो, तो मेरा जीवन धन्य हो जाय। ऐसा ही आवेश जीवनका प्रयोजन होना चाहिये। इसे सिखलानेके लिये महाप्रभुने कहा कि श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये उस स्त्रीमें इतना आवेश आ
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गया था कि उसे यह भी नहीं पता चला कि वह स्तम्भ लकड़ीका है अथवा पत्थरका और उसका पैर किसके ऊपर है। वह तो आविष्ट होकर दर्शन करने लगी और जब आवेश समाप्त हो गया और उसे बाहरी ज्ञान आया, तब उसने महाप्रभुकी वन्दना की। महाप्रभु जब देवदासीके द्वारा गीत-गोविन्दका गान सुनकर उसकी ओर दौड़े, तब उन्हें काँटों अथवा मेड़का कोई ज्ञान नहीं था। उस समय क्या उस देवदासीमें ऐसा आवेश था अथवा महाप्रभुमें आवेश था? महाप्रभुमें आवेशके विषयमें सुना जाता है, किन्तु उस स्त्रीमें कोई आवेश नहीं था। इसलिये यदि महाप्रभु उसे स्पर्श कर लेते, तो फिर वे अपने प्राण त्याग देते। परन्तु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये आविष्ट उस वृद्धा स्त्रीके चरणका स्पर्श होनेपर भी महाप्रभुको कोई ग्लानि नहीं हुई, अपितु उन्होंने उस स्त्रीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। श्रीराय रामानन्द देवदासियोंको भावकी शिक्षा देते थे, अपने हाथोंसे उनके अङ्गोंका मार्जन करते और उनको वस्त्र धारण करवाते तथा उनका शृङ्गार करते थे। महाप्रभुने उनकी इस कार्यके लिये निन्दा नहीं करके उनकी प्रशंसा की। महाप्रभुने स्त्रीसे बात करनेके लिये छोटे-हरिदासका त्याग कर दिया, किन्तु श्रीराय रामानन्दका त्याग नहीं किया। इसलिये जिसमें जिस प्रकारके गुण और भाव हैं, उसे उसी प्रकारसे समझना चाहिये। उस वृद्धा स्त्रीमें श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेका आवेश था, इसलिये उसके द्वारा महाप्रभुके कन्धेके ऊपर अपने पैरको रखना दोषपूर्ण नहीं है, किन्तु अन्य परिस्थितिमें ऐसा करना दोषपूर्ण है। परिस्थिति और परिवेशका विचार करके उसका निर्णय करना चाहिये।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 30 ॥ पूर्वे आमि यबे कैलुँ जगन्नाथ-दरशन। जगन्नाथे देखि—साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 31 ॥
श्रीकृष्णमें आविष्टचित्त गोपीभावमय महाप्रभुके द्वारा सर्वत्र श्रीकृष्णका दर्शन :— स्वप्नेर दर्शनावेशे तद्रूप हैल मन। याँहा ताँहा देखि सर्वत्र मुरली-वदन ॥”32 ॥ अनुवाद—इसके पूर्व मैं मन्दिरमें आकर जब श्रीजगन्नाथके दर्शन कर रहा था, तब मुझे वे श्रीजगन्नाथ साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन दिखलायी दे रहे थे। रात्रिमें स्वप्नमें जो व्रजेन्द्रनन्दनके दर्शन हुए थे, उसमें आविष्ट होनेके कारण मेरा मन उसी लीलाका स्मरण कर रहा था, इसलिये मुझे यत्र-तत्र-सर्वत्र ही मुरली-वदन दिखलायी देने लगे थे॥”31-32 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :— एबे यदि स्त्रीरे देखि' प्रभुर बाह्य हैल। जगन्नाथ-सुभद्रा-बलरामेर स्वरूप देखिल ॥ 33 ॥ कुरुक्षेत्रमें वासुदेवके दर्शनसे श्याम-विरहिणी गोपीभावमय महाप्रभु :— कुरुक्षेत्रे देखि' कृष्णे ऐछे हैल मन। 'काँहा कुरुक्षेत्रे आइलाङ, काँहा वृन्दावन??'34 ॥ अनुवाद—किन्तु अब जब उस स्त्रीको देखा तो महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और उन्हें श्रीजगन्नाथ- सुभद्रा-बलरामके स्वरूप दिखलायी देने लगे। उन तीनोंके दर्शन करके महाप्रभुके मनमें भाव आया कि मैं श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें देख रहा हूँ और वे सोचने लगे,—'कहाँ मैं कुरुक्षेत्रमें आ गया हूँ और कहाँ मैं वृन्दावनमें था?'33-34 ॥ श्रीकृष्णके सङ्गसे वञ्चित गोपीभावमें कातर महाप्रभु :— प्राप्तरत्न हाराञा ऐछे व्यग्र हइला। विषण्ण हञा प्रभु निज-वासा आइला ॥ 35 ॥ श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुकी महाभाव-चेष्टा :— भूमि उपर बसि' निज-नखे भूमि लिखे। अश्रुगङ्गा नेत्रे बहे, किछुइ ना देखे ॥ 36 ॥
356 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/35-42 ] “पाइनु वृन्दावननाथ, पुनः हाराइनु। के मोर निलेक कृष्ण? काँहा मुइ आइनु??”37॥ अनुवाद—महाप्रभु ऐसे व्यग्र हो गये जैसे एक व्यक्तिका मूल्यवान् रत्न खो गया हो। उदास होकर महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। वे भूमिके ऊपर बैठकर अपने नाखूनोंसे भूमिपर कुछ लिखने लगे। गङ्गाकी धाराकी भाँति उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, उन्हें कुछ भी दिखलायी नहीं दे रहा था। वे विलाप करते हुए कहने लगे,—“मैंने वृन्दावन-नाथको प्राप्त करके पुनः खो दिया। मेरे कृष्णको कौन ले गया है? मैं कहाँ आ गया हूँ?”35-37॥ अर्द्धबाह्यदशाके लक्षण :- स्वप्नावेशे प्रेमे प्रभुर गर गर मन। बाह्य हैले हय—येन हाराइनु धन॥38॥ अनुवाद—स्वप्नमें रासलीलाके दर्शन करके उस आवेशमें महाप्रभुका मन प्रेममें विह्वल हो रहा था, परन्तु जैसे ही महाप्रभुकी स्वप्न टूटनेपर बाह्यदशा हुई, तो उन्हें लगा कि वे अपना समस्त धन खो बैठे हैं॥ 38॥ दिव्योन्मादग्रस्त महाप्रभुका अभ्यासवशतः नित्यकृत्य आदि करना :- उन्मत्तेर प्राय प्रभु करेन गान-नृत्य। देहेर स्वभावे करेन स्नान-भोजन-कृत्य॥39॥ अनुवाद—महाप्रभु उन्मत्त व्यक्तिकी भाँति गाने और नृत्य करने लगे। देहके स्वभावसे ही उनके स्नान-भोजन आदि कार्य होने लगे॥ 39॥ रात्रिमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके निकट विलाप :- रात्रि हैले स्वरूप-रामानन्दे लञा। आपन मनेर भाव कहे उघाड़िया ॥40॥ अनुवाद—रात्रि होनेपर महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायको अपने मनके भाव खोलकर बतलाने लगे॥40॥ गोस्वामिपादोक्त श्लोक- प्राप्तप्रणष्टाच्युतवित्त आत्मा ययौ विषादोज्झित-देहगेहः। गृहीतकापालिकधर्मको मे वृन्दावनं सेन्द्रियशिष्यवृन्दः॥41॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी आत्माने कृष्णरूपी धनको एकबार प्राप्त करके पुनः खोकर विषादके कारण देह-गृहको परित्याग करके कापालिक-योगीका धर्म ग्रहण करके अपने इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावनमें गमन किया था। इसमें 'उपमालङ्कार' द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ अनुभाष्य- प्राप्त-प्रणष्टाच्युतवित्तः (आदौ प्राप्तं नयनसरणीलब्धं, पश्चात् प्रणष्टं पुनः नष्टम् अदृष्टम् च, अच्युतवित्तम् अच्युतरूपवित्तं येन सः) विषादोज्झितदेहगेहः (विषादेन कृष्णविरहज-क्लेशेन उज्झितः त्यक्तप्रायः देह एव गेहः येन सः) गृहीत-कापालिक- धर्मकः (गृहीतः अङ्गीकृतः कापालिकस्य योगिविशेषस्य धर्मः नैसर्गिकस्वभावादिकः येन सः) मे (मम) आत्मा (शुद्धमनः) सेन्द्रियशिष्यवृन्दः (इन्द्रियाण्येव शिष्यवृन्दानि तैः सह वर्तमानः) वृन्दावनं ययौ। श्लोक-भावानुवाद-पहले नयनपथपर गोचर होनेके बाद पुनः उनके अदृष्ट होनेपर अच्युतरूप धन खोकर कृष्णविरहसे उत्पन्न क्लेशसे प्राय देह और गेहको त्यागकर कापालिकके (विशेष योगीके) धर्मको (नैसर्गिक स्वभावादिको) ग्रहण करके मेरा शुद्धमन इन्द्रियरूपी शिष्योंके साथ वृन्दावन गया था॥ 41 ॥ श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका दिव्योन्माद (चित्रजल्प) :- प्राप्तरत्न हाराञा, तार गुण सङरिया, महाप्रभु सन्तापे विह्वल। राय-स्वरूपेर कण्ठ धरि', कहे—“हाहा हरि हरि”, धैर्य गेल, हइला चपल ॥42॥
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[ 14/42-51 चौदहवाँ अध्याय 357 श्रीकृष्णमाधुर्यकी आकर्षणशक्तिके बलसे सब छाड़ि' गेला वृन्दावन ॥ 47 ॥ दशम-दशाकी प्राप्तिका वर्णन :- वृन्दावने प्रजागण, यत "शुन, बान्धव, कृष्णेर माधुरी। स्थावर-जङ्गम, यार लोभे मोर मन, छाड़िलेक वेदधर्म, वृक्ष-लता गृहस्थ-आश्रमे। योगी हञा हइल भिखारी ॥ 43 ॥ ध्रु॥ तार घरे भिक्षाटन, फल-मूल-पत्राशन, अनुवाद-श्रीकृष्णरूपी रत्नको प्राप्त करके उसे एइ वृत्ति करे शिष्यसने ॥ 48 ॥ खोकर श्रीकृष्णके गुणोंको स्मरण करते हुए महाप्रभु सन्तापसे विह्वल हो उठे। तब महाप्रभु श्रीराय रामानन्द कृष्णगुण रूप, रस, गन्ध, शब्द, परश, और श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें अपनी भुजाओंको से सुधा आस्वादे गोपीगण। डालकर 'हा हरि ! हा हरि !' कहते हुए चञ्चल हो उठे, ता-सबार ग्रास-शेषे, आनि' पञ्चेन्द्रिय शिष्ये, धैर्य खो बैठे और कहने लगे, "हे बान्धव ! श्रीकृष्णकी से भिक्षाय राखेन जीवन ॥ 49 ॥ माधुरीके विषयमें श्रवण करो, जिस माधुरीके लोभसे जागर-दशा :- मेरा मन लोकधर्म और वेदधर्मको छोड़कर योगी शून्यकुञ्जमण्डप-कोणे, योगाभ्यास कृष्णध्याने, बनकर भिखारी हो गया है ॥ 42-43 ॥ ताँहा रहे लञा शिष्यगण। कृष्णलीला-मण्डल, शुद्ध कृष्ण आत्मा निरञ्जन, साक्षात् देखिते मन, शङ्खकुण्डल, ध्याने रात्रि करे जागरण ॥ 50 ॥ गड़ियाछे शुक कारिकर। व्याधि, मोह और मृत्यु (प्रलय)-दशा; चित्रजल्प :- सेइ कुण्डल काणे परि', तृष्णा-लाउ-थाली धरि', मन कृष्णवियोगी, दुःखे मन हैल योगी, आशा-झुलि कान्धेर उपर ॥ 44 ॥ से वियोगे दश दशा हय। चिन्ता, मलिनाङ्गता और प्रलाप-दशा :- से दशाय व्याकुल हञा, मन गेल पलाञा, चिन्ता-कान्था उड़ि' गाय, धूलि-विभूति-मलिन-काय, शून्य मोर शरीर आउलय ॥" 51 ॥ 'हाहा कृष्ण' प्रलाप-उत्तर। अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 44-51 ॥ उद्वेग द्वादश हाते, लोभेर झुलि निल माथे, अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने आगे कहा, - श्रीकृष्णकी भिक्षाभावे क्षीण कलेवर ॥ 45 ॥ माधुरीके प्रति लोभ करके वेदधर्मको परित्यागकर मेरा तानव-दशा :- मन योगी होकर भिखारी हो गया है। योगी लोग जिस व्यास, शुकादि योगिगण, कृष्ण आत्मा निरञ्जन, प्रकार शङ्ख-कुण्डल धारण करते हैं, उसी प्रकार मेरे व्रजे ताँर यत लीलागण। मनरूपी योगीने कृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-मण्डलरूपमें भागवतादि शास्त्रगणे, करियाछे वर्णने, धारण किया है। सामान्य योगियोंके शङ्खकुण्डल शङ्खके सेइ तर्ज्जा पड़े अनुक्षण ॥ 46 ॥ कारीगर ही बनाते हैं, किन्तु मेरे मनरूपी योगीके उन्माद-दशा :- कृष्णलीला-मण्डलरूप भागवत-कुण्डलोंका साक्षात् बादरायण दशेन्द्रिये शिष्य करि', 'महा-बाउल' नाम धरि', श्रीशुकरूपी कारीगरने गठन किया है। सामान्य योगी शिष्य लञा करिल गमन। जो-जो चाहता है, मेरे मनरूपी योगीने उसे उसे स्वीकार मोर देह स्वसदन, विषय-भोग महाधन,
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[बायाँ स्तम्भ]
किया है। सामान्य योगीके पास कद्दूसे बने कमण्डलु और थाली (भिक्षापात्र) रहते हैं, मेरे मनरूपी योगीने कृष्णतृणारूपी लौकीकी थाली बनायी है,—'कृष्णको प्राप्त करूँगा', इस आशारूपी झोलीको कन्धेके ऊपर झुला रखा है,—और 'किस उपायसे कृष्णको प्राप्त करूँगा' इस चिन्तारूपी [पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बनाये हुए] कम्बलको शरीरपर ओढ़ा हुआ है। योगीगण राखकी विभूति धारण करते हैं, मेरा मनरूपी योगी धूलिकी विभूतिके द्वारा मलिन शरीरवाला हो गया है, प्रत्येक बातका 'हा हा कृष्ण' इस प्रकारके प्रलापमय वचनोंसे उत्तर देता है। सामान्य योगी लोग हाथमें बारह कड़े पहनते हैं, मेरे मनरूपी योगीके हाथमें अष्टसात्त्विक विकार, मनका वेग, कम्प-विकार, निश्वास, चपलता और चिन्ता, —ये बारह कड़े शोभा पा रहे हैं; [मेरे मनरूपी योगीने] कृष्णमाधुर्यकी लोभरूपी झोलीको मस्तकपर बाँध रखा है; और वह भिक्षा प्राप्त नहीं कर पानेके कारण दुबला हो गया है। व्यास-शुकादि जिन समस्त योगियोंने निर्मल आत्मारूपी कृष्णकी समस्त व्रजलीलाओंका भागवतादि शास्त्रोंमें वर्णन किया है, मेरा मनरूपी योगी उनके द्वारा रचित समस्त प्रेम-गीत और नृत्यका निरन्तर पाठ करता रहता है। बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार मेरे मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर मेरे देहरूपी अपने घरमें विषय-भोगरूपी महाधनका परित्याग करके वृन्दावन गमन किया है। शिष्यगण (दस इन्द्रियाँ) वृन्दावनमें स्थावर-जङ्गमरूपी समस्त प्रजावर्ग एवं वृक्ष-लता आदि गृहस्थ-आश्रमियोंके घरमें भिक्षा माँगकर फल-मूल-पत्रके सेवनरूपी वृत्तिका आचरण कर रहे हैं। व्रजगोपियाँ श्रीकृष्णके गुण, रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श—इन सभी सुधाका सर्वदा आस्वादन करती हैं, उनके भोजनके अवशिष्टको लाकर ज्ञानेन्द्रियरूपी पाँच शिष्य उस प्रसादको खाकर जीवनकी रक्षा करते हैं। सामान्य योगी जिस प्रकार एक कोनेमें (एकान्तमें) बैठकर ध्यान
[दायाँ स्तम्भ]
करते हैं, उसी प्रकार मेरा मनरूपी योगी भी कृष्णशून्य कुञ्जमण्डपके कोनेमें अपने शिष्योंके साथ कृष्णध्यानमें योगका अभ्यास करता है। कृष्ण—निर्मल आत्मस्वरूप हैं; मेरा मनरूपी योगी उन्हें साक्षात् देखना चाहता है, उन्हें प्राप्त नहीं कर पानेके कारण ध्यानमें रात्रि-जागरण करता है। मन कृष्ण-वियोगी बनकर अति दुःखमें इस योगीकी दशाको प्राप्त करके उस कृष्ण-विरहकी अवस्थामें दस-दशाको प्राप्त करता है, उस दशामें नितान्त व्याकुल होकर मन फिर योगी बननेको विफल हुआ देखकर भाग गया है; मेरा शरीर शून्य होकर रह गया है। इस श्लेष अलङ्कारके प्रयोगसे प्रलयावस्था तकका वर्णन हुआ है॥ 44-51 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें, — 'लोभेर झुलनी माथे' ; 'झुलनी' शब्दका अर्थ सिरको ढकने योग्य वस्त्र है॥ 45 ॥ 'तर्ज'—(अरबी भाषामें तर्जा) दो दलोंके बीच सङ्गीतमें परस्परके उत्तरका खण्डन; कवि-गान और प्रेम-गीतके साथ नृत्यके समजातीय ॥ 46 ॥ 'कापालिकगण'—विशेष योगी; वे मनुष्यके कपाल अर्थात् मस्तककी खोपड़ीको लेकर विचरण करते हैं। उनके तान्त्रिक अनुष्ठानोंके साथ सादृश्य रखकर यह अंश वर्णित हुआ है। कापालिकगण—अवैदिक और अस्पृश्य हैं, इसलिये अवैष्णव हैं; उनके व्यवहारकी ही उपमा-मात्रको ग्रहण किया गया है॥ 51 ॥
श्रीकृष्णवियोगमें प्रोषितभर्तृका गोपियोंकी दस दशाओंसे युक्त कृष्ण-विरही महाप्रभु :- कृष्णेर वियोगे गोपीर दश दशा हय। सेइ दश दशा हय प्रभुर उदय ॥ 52 ॥
अनुवाद—जैसे श्रीकृष्णके वियोगमें गोपियोंकी दस दशाएँ उपस्थित होती हैं, उसी प्रकार महाप्रभुमें दसों दशाएँ उदित होती थीं ॥ 52 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेद प्रकरणमें (167) श्लोक—
[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 359 चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं मलिनाङ्गता। प्रलापो व्याधिरुन्मादो मोहो मृत्युर्दशा दश ॥ ५३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चिन्ता, जागरण, उद्वेग, तनुक्षीणता (शरीरका दुबला होना), अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह और मृत्यु, —ये दस दशाएँ हैं॥ ५३ ॥ अनुभाष्य— [अत्र प्रवासाख्ये विप्रलम्भे दश दशाः कथिताः]—चिन्ता (अभीष्टलाभोपायध्यानं), जागरः (निद्राराहित्यः), उद्वेगः (मनःकम्पविशेषः), तानवं (कृशता), मलिनाङ्गता (अङ्गमालिन्यं), प्रलापः (असम्बद्धवचनं), व्याधिः, उन्मादः (विभ्रम-चेष्टासम्पन्नः) मोहः (चित्तविभ्रान्तिः) मृत्युः (स्पन्दनाभावः)। श्लोक-भावानुवाद—[यहाँ प्रवास कहे गये विप्रलम्भमें दस दशाएँ कही गयी हैं]—चिन्ता (अभीष्टको प्राप्त करनेके उपायका ध्यान), जागरण, उद्वेग (मनका विशेष कम्प), शरीरका दुबला होना, अङ्गोंका मलिन होना, प्रलाप (ऐसे वचन जिनका आपसमें सम्बन्ध नहीं हो), व्याधि, उन्माद (भ्रमित होकर चेष्टा), मोह (चित्तमें विभ्रान्ति) और मृत्यु (शरीरमें स्पन्दनका अभाव)। इन दस दशाओंकी उदाहरण-माला नीचे लिखी जा रही है; उनमेंसे— (1) 'चिन्ता'—जैसे हंसदूत (2) में— “यदा यातो गोपीहृदयमदनो नन्दसदना- न्मुकुन्दो गान्दिन्यास्तनयमनुरुन्धन् मधुपुरीम्। तदामाङ्गीच्चिन्तासरिति घनघूर्णापरिचयै- रगाधायां बाधामय-पयसि राधा विरहिणी ॥” अर्थात्— “अक्रूरेर अनुरोधे नन्दगृह हइते। गोपीहृदानन्द यबे गेल मधुराते॥ तबे विरहिणी राधा उद्घूर्णितमना। तीव्रपीडा-जलरूपा उत्कट भावना॥ निजेर विनाश-चिन्ता-व्याकुलता-फले। डुबिल अतलस्पर्श-चिन्तानदी-तले॥ 'आमार सन्धान लागि' प्रियतम कृष्ण। भावि काले ब्रजे आसि' हइया सतृष्ण॥ आमार मरण-कथा यबे लोकमुखे। शुनिबे, हृदये कभु ना पाइबे सुखे॥ दयितेर दुःख-भार विचार करिया। कभु मृत्यु-वाञ्छा नाहि करे मोर हिया॥” [अर्थात् जबसे गोपियोंके हृदयके आनन्दस्वरूप मुकुन्द अक्रूरके अनुरोधसे नन्दगृहको छोड़कर मथुरा चले गये, तभीसे विरहिणी श्रीराधाका चित्त उद्घूर्णा-ग्रस्त हो गया। अपने विनाशकी चिन्ताकी व्याकुलताके फलस्वरूप वे (श्रीकृष्ण विरहकी) तीव्र-पीडास्वरूप जलरूपा अगाध चिन्तानदीमें निमग्न होकर, इस प्रकार तीव्र चिन्ता करने लगीं, —“भविष्यमें मेरे प्रियतम कृष्ण सतृष्ण होकर मुझे ढूँढ़ते हुए जब व्रजमें आयेंगे, तब व्रजवासियोंके मुखसे मेरी मृत्युकी बातको सुनकर उनका हृदय कदापि प्रसन्न नहीं होगा अर्थात् अत्यन्त दुःखी होगा। अपने अत्यन्त प्रियतमके इस (भावी) दुःख रूपी भारका विचार करके ही मेरा चित्त कभी मृत्युकी कामना नहीं करता।”] (2) 'जागर:'—जैसे पद्यावली (322)में— “याः पश्यन्ति प्रियं स्वप्ने धन्यास्ताः सखि योषितः। अस्माकन्तु गते कृष्णे गता निद्रापि वैरिणी ॥” अर्थात्— “प्रिय सखी विशाखाके राधा-ठाकुराणी। निजे भाग्यहीना जानि कहिलेन वाणी॥ 'प्रियतम-दरशन स्वप्नेर काले। ये नारीर घटे, तार धन्य लिखे भाले॥ कृष्णेर गमन हले निद्रा-रूपा अरि। छाडियाछे मम सङ्ग साधितेछे वैरी॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें स्वयंको भाग्यहीन जानकर श्रीराधा-ठाकुराणी अपनी प्रियसखी श्रीविशाखासे बड़े खेदके साथ कह रही हैं, —“जो नारियाँ अपने प्रियतमका स्वप्नमें भी दर्शन प्राप्त करती हैं, वे धन्य हैं।
360 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53 ] श्रीकृष्णके मथुरा जानेपर निद्रा भी मेरी वैरिणी हो गयी है, अर्थात् मुझे त्यागकर दूर चली गयी है।”] (3) 'उद्वेगः',—जैसे हंसदूत (104) में— “मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हन्त करवै न पारं नावारं सुमुखि कलयाम्यस्य जलधेः। इयं वन्दे मूर्द्धा सपदि तमुपायं कथय मे परामृश्ये यस्माद्कृतिकणिकायापि क्षणिकया॥” अर्थात्— “ललिताके कहे राधा,—'सुमुखि ललिते। दहिछे हृदय मम, ना पारि बलिते॥ हाय कि करिबे, देखि,—जलधि अपार। नमि आमि तव पदे, करह विचार॥ उपदेश दाओ मोरे—किबा आमि करि। क्षणेकेर तरे किछु धैर्य किसे धरि॥'” [अर्थात् माथुरविरहकालमें परम-उद्विग्न श्रीराधा उनको सान्त्वना देनेवाली अपनी प्रिय सखी ललितासे दीनताके साथ कह रही हैं,—“हे सुमुखि ललिते! इस समय मेरा हृदय अति विरह ज्वालासे जल रहा है, मैं कुछ भी कह पानेमें असमर्थ हूँ। हाय! मैं क्या करूँ? मुझे इस विरह-समुद्रका ओर-छोर नहीं दिखायी दे रहा है। मैं नतमस्तक होकर तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। शीघ्र ही मुझे ऐसा कोई उपाय बतलाओ, जिससे मैं क्षणकालके लिये ही धैर्य धारण कर सकूँ।”] (4) 'तानवं', जैसे— “उदश्र्वद्वक्राम्भोरुहविकृतिरन्तःकलुषिता। सदाहाराभावग्लपितकुचकोका यदुपते। विशुष्यन्ति राधा तव विरहतापादनुदिनं निदाघे कुल्येव क्रशिमपरिपाकं प्रथयति॥” अर्थात्— “उद्धव फिरिया यबे कृष्ण-सन्निधाने। राधिका-विशाखा-वार्त्ता कृष्ण तार स्थाने॥ जिज्ञासिल, तदुत्तरे उद्धव कहिल। मथुराय कृष्णचन्द्र साग्रहे शुनिल॥ 'यदुपते, कि बलिब सेइ सब कथा। तोमार विरहे राधा पाय ये ये व्यथा॥ मलिन विवर्ण ताँर वदन-कमल। सुविषाद-दैन्ये ढाका अन्तरेर स्थल॥ आहार-अभावे वक्षश्चकोरिका द्वय। ग्लानियुक्त देखियाछि, शुन रसमय॥ निदाघे सलिल येन शुकाइया याय। तोमार विरहतापे राधा क्षीणकाय॥'” [अर्थात् उद्धव जब व्रजसे लौटकर मथुरामें श्रीकृष्णके पास पहुँचे, तब श्रीकृष्णने उनसे श्रीराधिका, श्रीविशाखा (आदि)के विषयमें जिज्ञासा की। उसके उत्तरमें उद्धव जो कहने लगे उसे श्रीकृष्ण आग्रहपूर्वक सुनने लगे,—“हे यदुपते! तुम्हारे विरहमें श्रीराधा जो-जो कष्ट अनुभव कर रही हैं, मैं उस विषयमें क्या कहूँ? उनका मुखकमल मलिन और कान्तिहीन हो रहा है। सुविषाद-दैन्यसे उनका अन्तःकरण आच्छन्न हो रहा है। आहारके अभावमें उनके दोनों कुचरूप चक्रवाक ग्लानियुक्त हो रहे हैं। हे रसमय! और भी श्रवण करो! तुम्हारे विरहतापसे वे ग्रीष्मऋतुमें शुष्क कृत्रिम क्षुद्रनदीकी भाँति सूखकर क्षीणताकी पराकाष्ठाका विस्तार कर रही हैं।”] (5) 'मलिनाङ्गता', जैसे— “हिमविसरविशीर्णाम्भोजतुल्याननश्रीः, खरमरुदपरज्यद्वन्धुजीवोपमौष्ठी। अघहर शरदर्कौत्तापितेन्दीवराक्षी तव विरहविपत्तिम्लापितासीद्विशाखा॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—शुन, अघहर मम। खरतर-वायुभरे बन्धुतरु सम॥ विशाखार ओष्ठ शुष्क विरह-कातरा। हिमपुअशीर्ण-पद्मतुल्य-बिम्बाधरा॥ विरह-विपत्तिवशे विशाखा सुदीना। शारदीय-रवितप्त-कुमुदनयना॥” [अर्थात् (विशाखाकी विरह-दशाका वर्णन करते हुए) उद्धवने कहा,—“हे दुःखनाशक! सुनो! तुम्हारे विरहमें कातर श्रीविशाखाकी मुखकान्ति हिमसे जले हुए
[ 14/53 चौदहवाँ अध्याय 361 पद्मपुष्पकी भाँति हो रही है, उनके होंठ प्रखरतर तापयुक्त वायुके संस्पर्शसे जले हुए बन्धूक-पुष्पके समान हो रहे हैं। तुम्हारी विरह-वेदनाके फलस्वरूप उनकी अवस्था अत्यन्त दयनीय हो गयी है और उनके दोनों नेत्र भी शरत्कालीन सूर्यके प्रखर तापसे जले हुए कुमुदपुष्पकी भाँति मलिन हो रहे हैं।”] (6) 'प्रलाप:'—जैसे ललितमाधव (3/25) में— “क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालंकृतिः, क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि- र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व तव हन्त हा धिग्विधिः॥” अर्थात्— “प्रोषितभर्तृका राधा विलाप-कातर। बोले,—'सखि, कोथा नन्दकुलशशधर॥ शिखिचन्द्र-अलङ्कार कोथा गेल बल। गम्भीरमुरली-रव्कारी कोथा गेल॥ इन्द्रनीलमणिद्युति पुरुष उत्तम। रासरसताण्डवी वा तव सुहृत्तम॥ मम प्राणरक्षौषधिनिधि कोथा बल। धिग् विधि, भाग्ये लिखेछिले एइ फल??'” [अर्थात् माथुरविरहमें दिव्योन्माद दशाको प्राप्त (प्रोषितभर्तृका) श्रीमती राधिका ललिताको सम्बोधन करके प्रलाप करते हुए कह रही हैं,—“हे सखि ललिते! नन्दकुलचन्द्रमा कहाँ हैं? शिखिपिच्छमौलि कहाँ हैं? जिनकी मुरलीका स्वर अत्यन्त गम्भीर है, वे कहाँ हैं? इन्द्रनीलकान्ति कहाँ हैं? अहो! वे रासमें रसताण्डवी कहाँ हैं? मेरे मृतसञ्जीवनी रसायन कहाँ हैं? हाय! मेरी अभिलषित दुस्त्यज निधि कहाँ हैं? तुम्हारे वे सुहृत्तम कहाँ हैं? हा विधि! तुमको शत-शत बार धिक्कार है॥”] (7) 'व्याधि:',—यथा ललितमाधवमें— “उत्तापी पुटपाकतोऽपि गरलग्रामादपि क्षोभणो, दम्भोलेरपि दुःसहः कटुरलं हृन्मग्नशूल्यादपि। तीव्रः प्रौढ़विषूचिकानिचयतोऽप्युच्चैर्ममायं बली, मर्मांण्यद्य भिनत्ति गोकुलपतेर्विश्लेषजन्मा ज्वरः॥” अर्थात्— “विरहिणी राधा कहे,—'शुन गो ललिते। कृष्णेर विरह-ज्वर ना पारि वर्णिते॥ मृण्मय सम्पुटे तप्त येरूप कनक। गरलादि हइतेओ क्षोभेर जनक॥ वज्र हइते सुदुःसह विद्ध शल्य। येन यन्त्रणाय तीव्रविषूचिकातुल्य॥ सजनि, आमार मर्म भेदितेछे येइ। अतिशय पराक्रमबले बली सेइ॥'” [अर्थात् दिव्योन्मादवती श्रीमती राधिका ललितासे बड़े उद्वेगके साथ कह रही हैं,—“हे सखि ! व्रजनवयुवराजके विरहसे उत्पन्न ज्वर जो पुटपाकसे (औषधि बनानेके लिये उनके पत्तोंको लपेटकर मिट्टीका लेप करके अग्निमें भूननेसे) भी अतिशय तापदायक है, विषराशिसे भी अधिक क्षोभजनक है, वज्रसे भी अत्यन्त दुःसह है, हृदयमें चुभे शूलसे भी अधिकतर कष्टप्रद है तथा अति विपुल हैजा आदि रोगसमूहसे भी अतिशय तीक्ष्ण है। अब वह अति बलवान होकर इस समय मेरे हृदयको भी बींध रहा है॥”] (8) 'उन्मादः', जैसे— “भ्रमति भवनगर्भे निर्निमित्तं हसन्ती, प्रथयति तव वार्त्तां चेतनाचेतनेषु। लुठति च भुवि राधा कम्पिताङ्गी मुरारे, विषमविरहखेदोद्वारिविभ्रान्तचित्ता॥” अर्थात्— “उद्धव कहेन,—'तव विरह-कातरा। हे मुरारे, राधा अकारणे हास्यपरा॥ गृहमध्ये भ्राम्यमाणा प्रश्न यारे तारे। सचेतन-अचेतने किछु ना विचारे॥ विषम विरह-खेदे विधुरा राधिका। विभ्रान्तेर वशे एबे लुटिछे मृत्तिका॥'” [अर्थात् उद्धव (श्रीकृष्णसे) कह रहे हैं,—“हे मुरारि ! तुम्हारी उत्कट विरहचिन्तासे श्रीमती राधिका
362 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/53-54 ] कभी घरमें इधर-उधर भ्रमण करती हैं, कभी अकारण हँसती हैं। कभी चेतन-अचेतन वस्तुमात्रसे तुम्हारी वार्त्ता पूछती हैं, कभी-कभी तो काँपती हुई भूमिपर लोटने लग जाती हैं॥”] (9) ‘मोहः’, जैसे— “निरुन्धे दैन्याब्धिं हरति गुरुचिन्तापरिभवं, विलुम्पत्युन्मादं स्थगयति बलाद्बाष्पलहरीम्। इदानीं कंसारे कुवलयदृशः केवलमिदं, विधत्ते साचिव्यं तव विरहमूर्च्छा सहचरी॥” अर्थात्— “ललिता कृष्णेर स्थाने लिखिल पत्रिका। 'तव सुविच्छेदे मूर्च्छा लभिया राधिका॥ हे कंसारे, साचिव्येरे विधाता हइया। दैन्यसिन्धु हरे, चित्त-विकार शमिया॥ बले बाष्प-तरङ्गेरे स्तम्भन करिया। राधा आछेन तव गुरुचिन्ता लइया॥ नारीवधरूप महानिधि आशा करि। श्रीराधा-विषये तुमि चिन्ता परिहरि'॥ आजि वा आगामी कल्य लभिबे सन्देश। सुखे अवस्थान कर, आनन्दे विशेष॥'” [अर्थात् मथुरामें निवास करनेवाले श्रीकृष्णको ललिता पत्रके द्वारा संवाद दे रही हैं,–“हे कंसारि! इस समय केवल तुम्हारी विरहमूर्च्छा ही तुम्हारी प्राणेश्वरीकी सहायता कर रही है। वह दैन्यसमुद्रको रोक रही है। गुरुतर चिन्ताजनित दुरावस्थाको हरण कर रही है, उन्मादको दूर रख रही है और बलपूर्वक वाष्पलहरीको भी स्थगित कर रही है अर्थात् रोदनको भी स्थगित कर रही है। श्रीराधा तुम्हारी अत्यधिक गम्भीर चिन्तामें नारीवधरूपी महानिधिकी आशा कर रही हैं। अब तुम श्रीराधाके विषयमें अपनी समस्त चिन्ताओंका त्याग कर सकते हो। आज अथवा आगामी कलमें ही तुम्हें (उनकी मृत्युका) सन्देश प्राप्त हो जायेगा। तुम मथुरामें विशेष आनन्दपूर्वक सुखसे अवस्थान करो।”] (10) 'मृत्युः',–जैसे हंसदूत (96)में– “अये रासक्रीड़ारसिक मम सख्यं नवनवा, पुरा बद्धा येन प्रणयलहरी हन्त गहना। स चेन्मुक्तापेक्षस्त्वमसि धिगिमां तूलसकलं, यदेतस्या नासानिहितमिदमद्यापि चलति॥” अर्थात्— “मथुरा-प्रवासी कृष्णे तिरस्कार करि'। हंसद्वारे कहे देवी ललिता-सुन्दरी॥ 'रासक्रीड़ा-रसमय, रसेरे कारणे। बेंधेछिले राधिकारे प्रणयबन्धने॥ मम प्रिय सखी-प्रति निरपेक्ष केन। राधिका एसब कथा सदा स्मरे येन॥ नासारन्ध्रे तुलाखण्ड परीक्षा करिब। श्वास बहिलेइ धिक् ताहाके जानिब॥'” [अर्थात् (ब्रजसे) मथुरा जाकर वास करनेवाले श्रीकृष्णका तिरस्कार करते हुए श्रीललिता-सुन्दरी हंसके द्वारा उन्हें सन्देश भेज रही हैं,–“हे रासक्रीड़ा रसिक! उस समयके विशेष सौभाग्यका क्या तुम्हें स्मरण है? पूर्वकालमें व्रजवासके समय तुमने मेरी सखीको नित्य नवनवायमान दुर्बोध प्रेम-परम्परामें आबद्ध कर लिया था। अहो! इस समय वही तुम यदि उनके प्रति निष्ठुर और निरपेक्ष व्यवहार करोगे, तो मैं इस हतभागिनी राधाको ही धिक्कार प्रदान कर रही हूँ, क्योंकि इसकी चरम दशा मृत्युके निकट होनेके कारण नाड़ीकी अत्यन्त क्षीणतावशतः श्वासोंका सञ्चार बोध करनेके लिये उसकी नासिकाके सामने रखा रुईका खण्ड अभी भी धीरे-धीरे हिल रहा है। इसका अभिप्राय यह है कि तुम्हारे आगमनकी आशासे इसके शरीरमें प्राण किसी प्रकारसे बचे हुए हैं। तुम निश्चित ही नहीं आओगे, यदि यह बात वह जान लेगी तो महा-अनर्थ हो जायेगा। इसलिये अनुरोध करती हूँ कि अविलम्ब ब्रजमें आगमनकर प्रियसखियोंसे परिवेष्टित प्रियसखीको सञ्जीवित करो॥”] ॥ 53 ॥ एइ दश-दशाय प्रभु व्याकुल रात्रि-दिने। कभु कोन दशा उठे, स्थिर नहे मने॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभु इन दस दशाओंमें रात-दिन व्याकुल रहते थे। कभी किसी भी दशाके उठनेसे
[ 14/43–54 चौदहवाँ अध्याय 363
उनका मन स्थिर नहीं रह पाता था॥ 54॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णकी रूपमाधुरी, वेणुमाधुरी, लीलामाधुरी और गुणमाधुरी—इनको वैष्णवों अथवा गुरुसे श्रवण करके जो लोभ उत्पन्न होता है, वह लोभ ही पात्र है। महाप्रभुके मनरूपी योगीको श्रीकृष्णके रूप, लीलादिकी माधुरीके आस्वादन करनेके लिये प्रगाढ़ अवस्था तक लोभ हो गया है। जिसे ऐसा लोभ हो जाता है, तो वह रागानुगा भक्तिका अधिकारी हो जाता है और वह लौकिक, वैदिकादि जितने भी धर्म हैं, उन सबका परित्याग कर देता है। जैसे एक बैलको भूख लगी है, तो वह सुगम मार्गकी अपेक्षा न करके सीधा काँटोंवाली मेढ़ आदि बाधाओंको भी पार करके खेतमें चरने चला जाता है। इसी प्रकार जिस व्यक्तिको इसका लोभ हो जाता है, वह वेद-धर्मका परित्याग कर देता है। वेदके दो भाग हैं—एक रहस्यपूर्ण भाग है और दूसरा बाहरी भाग है। वह वेद-वेदान्त-उपनिषदादिके प्रतिपाद्य भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी भक्तिके रहस्यपूर्ण भागको ग्रहण करता है, किन्तु शरीर और मन सम्बन्धित वेदके बाहरी धर्मका त्याग कर देता है। साधारण योगी लोग कारीगरके द्वारा बनाये गये मोटे-मोटे कुण्डल अपने दोनों कानोंमें धारण करते हैं, किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने भागवतमें शुकदेव गोस्वामीके द्वारा वर्णित श्रीकृष्णलीला-मण्डलको शुद्ध शङ्ख-कुण्डलके रूपमें धारण किया है। सामान्य योगीके समस्त क्रियाकलापोंको महाप्रभुके मनरूपी योगीने भी स्वीकार किया है, किन्तु अन्य रूपमें। सामान्य योगी लोग सूखी हुई लौकीका पात्र बनाकर उसे साथ लेकर चलते हैं। उसीमें खाने-पीनेकी वस्तुएँ भर लेते हैं और बादमें निकालकर खा लेते हैं। महाप्रभुके मनरूपी योगीका तृणारूपी कृष्ण-माधुरीका लोभ उसके लिये कमण्डलु है। यही उसका भोजनका पात्र है। तृष्णा अर्थात् लोभ और 'कृष्णको मैं पाऊँगा' यह आशारूपी झोली है। तृष्णा और आशा—इसके द्वारा ही वह जीवित रहता है। 'किस प्रकार कृष्ण मिलेंगे'—उसकी एकमात्र यही चिन्ता है। यही उसके लिये गुदड़ी है। उसे अन्य कोई चिन्ता नहीं है। सांसारिक लोगोंकी सैकड़ों चिन्ताएँ हैं और मकड़ीके जालकी भाँति स्वयं ही वे उसे अपने चारों ओर बना लेते हैं। किन्तु महाप्रभुके मनरूपी योगीने तृष्णा या आशाकी झोली ली है कि कैसे कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे? बाउल योगी लोग जिस प्रकार दस-दस शिष्य बनाते हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके मनरूपी योगीने 'महाबाउल' नाम धारण करके दस इन्द्रियोंको शिष्य बना लिया है। उनकी कोई इन्द्रिय किसी वेगके अधीन नहीं है। महाप्रभु अपने आचरणके द्वारा शिक्षा दे रहे हैं कैसे दस इन्द्रियोंको शिष्य बनाकर भोग-ग्रामसे निकालकर वृन्दावनमें ले जाना चाहिये। कृष्णविमुख मायाबद्ध जीवकी एक भी इन्द्रिय उसकी शिष्या नहीं है, अपितु वे उसकी स्वामिनी हैं। वह उनका शिष्य है। जैसा उसका मन कहता है, उसकी आँख कहती है, उसकी जिह्वा कहती है, वह वैसे ही करता है। विशेषकर जिह्वा उसकी स्वामिनी है, वह उसे वृन्दावनसे ठीक विपरीत दिशामें भोग-ग्राममें ले जाती है। वह सांसारिक विषय भोगोंको ही अपनी प्रचण्ड सम्पत्ति, महाधन समझता हैं। वह उसे ऐसे जकड़कर रखता है कि कभी कोई भिखारी, अतिथि अथवा वैष्णव भी आयें, तो उसमेंसे थोड़ा-सा भी धन नहीं देता। संसारमें कुछ दानी लोगोंका उदाहरण मिलता है। जैसे महाराज हरीशचन्द्रने अपने राज्यका, दधीचि ऋषिने वज्र बनानेके लिये अपने प्राणोंका और महाराज शिविने अपने शरीरके मांसका दान कर दिया। परन्तु उनका यह त्याग श्रीकृष्णकी प्रसन्नता अथवा प्रेमसेवाके लिये नहीं है। यह सात्त्विक त्याग है और उसके फलस्वरूप वे केवल इस जगत्में नश्वर उच्च लोकोंमें जानेके अधिकारी बने। परन्तु हम देखते हैं कि श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्तिके लिये श्रीरघुनाथदास गोस्वामी इन्द्रके समान ऐश्वर्य और अप्सराके समान पत्नीका त्याग
364 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/43-54 ] करके महाप्रभुके पास जगन्नाथ पुरी चले गये। इसी प्रकार श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामीने भी उच्च पद और विपुल धनका त्याग किया। महाप्रभुने भी युवावस्थामें अपनी वृद्धा माता और युवा पत्नीको निःसहाय छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया। महाप्रभुकी धारामें जितने भी आचार्य हुए हैं, उन्होंने भी अपना सर्वस्व त्याग किया है। उन्माद दशामें महाप्रभु कह रहे हैं कि मेरा मनरूपी योगी सबकुछ त्यागकर वृन्दावनमें चला गया है। ‘अन्येर हृदय-मन, मोर मन-वृन्दावन।' दूसरे लोगोंका जो हृदय है वह मन है, किन्तु मेरा मन वृन्दावन है। वृन्दावनमें जितने वृक्षादि स्थावर और पशु-पक्षी-मनुष्य आदि जङ्गम प्राणी हैं, वे सब गृहस्थ हैं। भूख-प्यास लगनेपर मेरा मनरूपी योगी अपने शिष्योंके सहित इन गृहस्थोंके आश्रममें भिक्षा करता है। यमुना व्रजेन्द्रनन्दनकी गृहिणी हैं। 'यामुन-जीवन केलि-परायण' प्यास लगनेपर यमुनाके निकट भिक्षा करता है, परन्तु भिक्षामें क्या माँगता है यामुन-जीवन। यमुनाके तटपर होनेवाली श्रीकृष्णकी केलि-लीलाएँ यमुनाका जीवन है, उन्हीं लीलाओंको यमुनाजीसे भिक्षाके रूपमें माँगता है। यमुना तटपर शृङ्गारवट जाकर भिक्षा माँगता है कि कब मेरा ऐसा दिन होगा जब श्रीकृष्ण अपनी प्रियतमाका शृङ्गार करते समय मुझसे कहेंगे, —'कंघी, सिन्दूर, आलता आदि ले आओ।' और मैं कितनी सौभाग्यवती होकर इन सबको लाकर उन्हें समर्पित करूँगी। सेवाकुञ्जमें श्रीकृष्ण ललिताजीसे अनुरोध कर रहे हैं, —'देखो! तुम्हारी आराध्या देवी मान नहीं रही है, मेरी सहायता करो।' तो ललिताजी राधाजीको समझाने लगीं, —'अरी दुर्भागी! क्या कर रही हो? यह नहीं जानती कि यदि ये अभी चले जायेंगे, तो फिर तुम क्या करोगी? मान उतना ही करना चाहिये जितना उचित है।' सेवाकुञ्जसे यह भिक्षा माँगता है कि जब ललिताजी इस प्रकारके वचन राधाजीसे कहेंगी, मैं उस समय वहाँ अपने कानोंके दोनेमें कब इसका पान करूँगी। ब्रजमें जहाँ-जहाँपर जैसी लीला होती है, उसी प्रकारसे यह भिक्षाकी झोली फैलाकर उनसे प्रार्थना करता है। ये लीलाएँ ही लीलास्थलियोंकी सम्पत्ति हैं और वे उन्हें भिक्षामें दान कर सकती हैं। उनसे यह भिक्षा माँगता है कि आपके यहाँ जो कृष्ण-लीलाएँ हुईं, मेरे हृदयमें वे सदा स्फुरित होती रहें और मैं इस प्रकारसे श्रीराधाकृष्णकी सेवा कर सकूँ। विशेषकर ब्रजमें कुछ गृहस्थ हैं जो सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, जैसे राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, यमुना, गोवर्धन, तुलसी, वृन्दा, योगमाया, पूर्णिमा, निधिवन, सेवाकुञ्ज, वंशीवट, इमलीतट आदि। ब्रजकी धूलि भी साधारण नहीं है, यह राधा-कृष्णकी चरण-धूलि है, यह सबकुछ देनेमें समर्थ है। गोपियाँ कृष्णके नाम, रूप, गुण, रस, गन्ध, स्पर्शका आस्वादन करती हैं। जब उनका पूरा भोजन हो जायेगा और उसमें-से थोड़ा-सा अवशेष रह जायेगा, उसको यह योगी लेकर अपने शिष्योंको (केवल पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको, क्योंकि कर्मेन्द्रियाँ उसका आस्वादन नहीं कर सकतीं) देता है। गोपियोंके उस उच्छिष्टको प्राप्त करके ये शिष्य आनन्दसे उसकी सेवा करेंगे। सामान्य योगियोंका इष्टदेव अलख-निरञ्जन होता है। अलख अर्थात् जिसको देखा नहीं जाता, जिसका कोई रूप, नाम, गुण, लीला आदि नहीं है। उसके लिये वे कहते हैं कि मनमें ही उन अलख-निरञ्जनका दर्शन हो गया। किन्तु मेरे अभीष्ट कृष्णकी नाम, रूप, गुण, लीला आदि अनेक प्रकारकी मधुरियाँ हैं और मेरा मन उनका साक्षात् दर्शन चाहता है। उनकी लीला माधुरियोंका मैं आस्वादन करूँगा। सामान्य योगी ध्यान लगाते हैं और मेरा मनरूपी योगी ध्यान हटाकर जागरण करता है अर्थात् उन सब लीलाओंका ध्यान करता है। कब कृष्ण मिलेंगे, कब कृष्ण मिलेंगे, कब मेरा जीवन सफल होगा? इसी प्रकारसे महाबाउल होकर वृन्दावनमें यह विचरण करता है। कृष्ण जब ध्यानमें नहीं आते हैं, तब कृष्णके वियोगमें योगी
[ 14/43-61 चौदहवाँ अध्याय 365 अत्यन्त दुःखी हो जाता है और कृष्णविरहमें उसकी चिन्ता, जागरण, प्रलाप, उन्माद, मृत्यु आदि दस दशाएँ होती हैं। भक्तिमें मृत्यु नहीं होती। श्रीमती राधिका और महाप्रभुकी यह दस दशाएँ होती थीं जो अन्य किसीमें नहीं देखी जाती। कृष्णके मथुरा चले जानेपर उनके विरहमें उन्मत्त होकर श्रीमती राधिकाने कहा,–‘मेरी यह कामना है कि मेरे मर जानेपर मेरी भुजाओंके द्वारा तमाल वृक्षका आलिङ्गन करवा देना। और शरीर जलानेके बाद जब उसके पञ्चतत्त्व अलग हो जायेंगे, तब मेरे अन्दरकी अग्निको नन्दबाबाके आँगनमें सूर्यके प्रकाशमें मिला देना। मेरे शरीरकी जो मिट्टी है वह राख बन जायेगी, उसे नन्दबाबाके भवनकी भूमिके साथ मिला देना जिससे मुझे कृष्णके चरणोंका स्पर्श प्राप्त हो सके। शरीरके जलको पावन सरोवरमें मिला देना जिससे मैं कृष्णको स्नान करा सकूँ। शरीरकी वायुको चामरमें मिला देना जिससे मेरे शरीरकी वायु कृष्णके अङ्गोंसे मिले और आकाशको नन्दबाबाके आकाशमें मिला देना।’ किन्तु राधाजी पुनः विचार करती हैं कि जब मेरे प्रियतम कृष्ण मेरे मरनेके बाद व्रजमें आयेंगे और पूछेंगे कि राधा और अन्य गोपियाँ कहाँ हैं और लोगोंके मुखसे सुनेंगे कि राधा मर गयी, गोपियाँ भी मर गयीं, तो यह सुनकर वे भी मरनेको तत्पर होंगे। उन्हें अत्यन्त दुःख होगा। इस विचारसे गोपियाँ ‘मैं मर जाऊँ’ ऐसा नहीं सोचतीं। ‘कृष्ण व्रजमें आयेंगे’ वे एक यही आशा लेकर जीवित रहती हैं। महाप्रभुकी कब-कब कैसी-कैसी दशा होती है, कोई नहीं कह सकता। उनका चित्त स्थिर नहीं रहता, वे कभी विलाप करते हैं, कभी उनके अङ्गोंमें पुलक हो जाते हैं, कभी आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा होती है और कभी रोमाञ्च हो उठता है।–“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी” ॥ 43-54 ॥ श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके विप्रलम्भ-भावके उपयोगी-कालोचित श्लोकका पाठ :— एत कहि’ महाप्रभु मौन करिला। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥ 55 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उनके भावके अनुसार गानके द्वारा महाप्रभुकी चेतनताका सम्पादन :— स्वरूप-गोसाञि करे कृष्णलीला-गान। दुइ जने किछु कैला प्रभुर बाह्य-ज्ञान ॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभु दिव्योन्मादकी दशामें अपने भावोंको कहकर मौन हो गये। श्रीरामानन्द राय विप्रलम्भ-भावोपयोगी श्लोक पढ़ने लगे और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी कृष्णलीलाका गान करने लगे। इन दोनोंके इस प्रकार कुछ कहनेपर महाप्रभुको बाह्य-ज्ञान हुआ ॥ 55-56 ॥ घरमें महाप्रभुका शयन :— एइमत अर्द्धरात्रि कैला निर्यापण। भितर-प्रकोष्ठे प्रभुरे कराइला शयन ॥ 57 ॥ सभीका निर्दिष्ट स्थानपर शयन :— रामानन्द-राय तबे गेला निज घरे। स्वरूप-गोविन्द दुँहे शुइलेन द्वारे ॥ 58 ॥ अनुवाद—इस प्रकार अर्द्धरात्रि बीत जानेपर श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको भीतरके प्रकोष्ठमें लिटा दिया। तब श्रीरामानन्द राय अपने घर चले गये और श्रीस्वरूप दामोदर एवं श्रीगोविन्द महाप्रभुके कमरेके द्वारपर ही सो गये ॥ 57-58 ॥ महाप्रभुका सम्पूर्ण रात्रि जागकर कृष्णनामका कीर्तन :— सब रात्रि महाप्रभु करे जागरण। उच्च करि’ कहे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 59 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सारी रात जागते रहे और उच्च स्वरसे कृष्णनाम-सङ्कीर्तन करते रहे ॥ 59 ॥ कीर्तन और शब्दके अभावमें महाप्रभुको सभीके द्वारा ढूँढ़ना और उनका नहीं मिलना :— शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट कैला दूरे। तिनद्वार देओया आछे, प्रभु नाहि घरे ! ! 60 ॥ अनुवाद—कुछ समयके बादमें महाप्रभुका कीर्तन नहीं सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके कमरेका द्वार
366 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/61-70 ] खोला। उन्होंने देखा कि तीनों द्वार तो बन्द थे, किन्तु महाप्रभु कमरेके भीतर नहीं थे !60॥ चिन्तित हइल सबे प्रभुरे ना देखिया। प्रभु चाहिं बुले सबे व्याकुल हञा ॥ 61 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको उनके कमरेमें नहीं देखकर सभी भक्त चिन्तित हो गये। सभी व्याकुल होकर महाप्रभुको इधर-उधर ढूँढ़ने लगे ॥ 61 ॥ महाप्रभुकी अचेतन अवस्थामें प्राप्ति :- सिंहद्वारेर उत्तर-दिशाय आछे एक ठाञि। तार मध्ये पड़ि' आछेन चैतन्य-गोसाञि ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारकी उत्तर-दिशामें स्थित एक कोनेमें श्रीचैतन्य गोसाईं अचेतन अवस्थामें पड़े हुए थे॥ 62 ॥ श्रीस्वरूपादि भक्तोंका हर्ष और विषाद :- देखि' स्वरूप-गोसाञि आदि आनन्दित हैला। प्रभुर दशा देखि' पुनः चिन्तिते लागिला ॥ 63 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको वहाँ देखकर श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्त पहले तो आनन्दित हुए, किन्तु महाप्रभुकी अचेतन दशाको देखकर वे बहुत चिन्तित हुए॥ 63 ॥ वैसी अवस्थावाले महाप्रभुका वर्णन :- प्रभु पड़ि' आछेन दीर्घ हात पाँच-छय। अचेतन देह, नासाय श्वास नाहि बय ॥ 64 ॥ एक एक हस्त-पाद—दीर्घ तिन हात। अस्थिग्रन्थि भिन्न, चर्म्मे आछे मात्र तात ॥ 65 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अचेतन होकर पड़े थे और उनकी देह पाँच-छह हाथ लम्बी हो गयी थी। नाकमें श्वास नहीं चल रही थी। महाप्रभुका एक-एक हाथ और पैर तीन-तीन हाथ लम्बे हो गये थे। उनकी अस्थियोंके जोड़ खुल गये, केवलमात्र त्वचासे ही अस्थियाँ टिकी हुई थीं। उनकी देहमें जीवनके अस्तित्वको दिखलानेवाली उष्णता भी थी॥ 64-65 ॥ अनुभाष्य— 'तात',—जीवनके अस्तित्वका ज्ञापक उष्ण-भाव (देहकी गर्मी) ॥ 65 ॥ हस्त, पाद, ग्रीवा, कटि, अस्थि, सन्धि यत। एक एक वितस्ति भिन्न हञाछे तत ॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके हाथ, पैर, गर्दन, कमर आदिकी अस्थियोंके जितने जोड़ थे, वे सभी एक-एक वितस्ति (हथेली फैलाकर अँगूठे और कनिष्ठ अँगुलीके छोरके बीचकी दूरी) जितने दूर हो गये॥ 66 ॥ चर्ममात्र उपरे, सन्धि आछे दीर्घ हञा। दुःखित हइला सबे प्रभुरे देखिया ॥ 67 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके अङ्गोंके जोड़ खुलकर लम्बे हो गये, त्वचामात्र उन जोड़ोंके ऊपर दिखलायी दे रही थी। महाप्रभुकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्त बहुत दुःखी हुए॥ 67 ॥ मुखे लाला-फेन प्रभुर उत्तान-नयन। देखिया सकल भक्तेर देह छाड़े प्राण ॥ 68 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे फेनयुक्त लार निकल रही थी और उनके नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये थे। उनकी ऐसी अवस्थाको देखकर सभी भक्तोंकी देहसे प्राण निकलनेवाले ही थे॥ 68 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'उत्तान-नयन',—नेत्र ऊपरकी ओर उठ गये॥ 68 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उच्चस्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका उच्चारण :- स्वरूप-गोसाञि तबे उच्च करिया। प्रभुर काणे कृष्णनाम कहे भक्तगण लञा ॥ 69 ॥ अनुवाद—ऐसा देखकर श्रीस्वरूप दामोदर भक्तोंके साथ महाप्रभुके कानोंके निकट उच्चस्वरसे कृष्णनाम
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करने लगे ॥ ६९ ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- बहुक्षणे कृष्णनाम हृदये पशिला। 'हरिबोल' बलि' प्रभु गर्जिया उठिला ॥ ७० ॥ अनुवाद-उनके द्वारा बहुत देर तक कृष्णनाम करनेके पश्चात् वह महाप्रभुके हृदयमें प्रविष्ट हो गया, तब महाप्रभु 'हरिबोल' बोलकर गर्जन करते हुए उठे॥ ७० ॥ चेतन पाइते अस्थि-सन्धि लागिल। पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल ॥ ७१ ॥ अनुवाद-महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनकी अस्थियोंके जोड़ जुड़ गये और उनकी देह पहले जैसी हो गयी ॥ ७१ ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा अपने ग्रन्थमें इस वृत्तान्तका वर्णन :- एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथदास। 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछे प्रकाश ॥ ७२ ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी ऐसी लीलाको श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥ ७२ ॥ काशीमिश्रके घरमें कृष्णविरहग्रस्त महाप्रभुकी दशा :- स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका चतुर्थ श्लोक- क्वचिन्मिश्रावासे व्रजपतिसुतस्योरुविरहात् श्लथच्छ्रीसन्धित्वादधदधिकदैर्घ्यं भुजपदोः। लुठन् भूमौ काक्वा विकलविकलं गद्गदवचा रुदन् श्रीगौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥ ७३ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकाशीमिश्रके घरमें श्रीकृष्णविरहमें महाप्रभुके समस्त जोड़ खुल गये, जिससे उनके हाथ और पैर बहुत लम्बे हो गये। भूमिपर काकुस्वरमें व्याकुल होकर गद्गद वचन बोलते हुए लोट-पोट खाते-खाते रोनेवाले वे गौराङ्ग मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं ॥ ७३ ॥ अनुभाष्य- क्वचित् मिश्रावासे (काशीमिश्रगृहे) व्रजपतिसुतस्य (नन्दनन्दनस्य) उरुविरहात् (अत्यन्तविच्छेदात्) श्लथच्छ्रीसन्धित्वात् (श्लथन् निजनिजाश्रयं त्यजन् श्रीः शोभा सन्धिश्च ययोः) भुजपदोः (बाहुचरणयोः) अधिकदैर्घ्यं दधत् (धारयन्) भूमौ लुठन् काक्वा (कातरया वाण्या) गद्गदवचा विकल-विकलम् (अतिशयेन विकलं) रुदन् सः गौराङ्गः मम हृदये उदयन् (प्रकटयन्) सन् मां मदयति (हर्षयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ७३ ॥ अर्द्धबाह्यदशामें महाप्रभुके द्वारा लोगोंके एकत्रित होनेके कारणकी जिज्ञासा :- सिंहद्वारे देखि' प्रभुर विस्मय हइला। “क्या कर, किवा”-एइ स्वरूपे पुछिला ॥ ७४ ॥ अनुवाद-स्वयंको सिंहद्वारपर देखकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,-“तुम लोग क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे हो?" ७४ ॥ अनुभाष्य-'क्या कर, किवा', -क्या कर रहे हो, क्यों ॥ ७४ ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको घरमें लाना और सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- स्वरूप कहे,-“उठ, प्रभु, चल निज-घरे। तथाइ तोमारे सब करिमु गोचरे ॥ "७५ ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“हे महाप्रभु ! उठिये, अपने वासस्थानपर चलिये। वहींपर मैं आपको यह सब बतलाऊँगा ॥ "७५ ॥ एत बलि' प्रभुरे धरि' घरे लञा गेला। ताँहार अवस्था सब कहिते लागिला ॥ ७६ ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुको
368 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/77–86 ] पकड़कर उनके वासस्थानपर ले गये। वहाँ उन्होंने महाप्रभुको उनकी सिंहद्वारपर जो अवस्था थी, उसके विषयमें सबकुछ बतलाया ॥ 76 ॥ बाह्यदशामें आकर महाप्रभुका विस्मय और अपनी अवस्थाका वर्णन :- शुनि' महाप्रभु बड़ हैला चमत्कार। प्रभु कहे,—“किछु स्मृति नाहिक आमार ! ! 77 ॥ सबे देखि—हय मोर कृष्ण विद्यमान। विद्युत्प्राय देखा दिया हय अन्तर्धान ॥”78 ॥ अनुवाद—अपनी उस अवस्थाके विषयमें सुनकर महाप्रभुको बहुत आश्चर्य हुआ। महाप्रभुने कहा,—“मुझे अपनी उस अवस्थाका कुछ भी स्मरण नहीं है। मुझे तो यही स्मरण है कि मैंने अपने कृष्णको देखा और वे विद्युतकी (बादलोंमें चमकनेवाली बिजलीकी) भाँति झलक दिखलाकर अन्तर्धान हो गये ॥” 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- हेनकाले जगन्नाथेर पाणि-शङ्ख बाजिला। स्नान करि' महाप्रभु दरशने गेला ॥ 79 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें पाणि-शङ्ख बजा। महाप्रभु स्नान करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करनेके लिये चले गये ॥ 79 ॥ अनुभाष्य—'पाणि-शङ्ख',—हाथमें पकड़कर मुखसे बजानेवाला शङ्ख; अथवा द्वारको खोलनेके समय हाथ-तालीका शब्द; पाठान्तरमें—'पानी-शङ्ख',—(आचमन करनेवाला) शङ्ख ॥ 79 ॥ महाप्रभुका महाभाव-विकार विस्मयजनक :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर अद्भुत विकार। याहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनदेखा-अनसुना महाभाव :- लोके नाहि देखे ऐछे, शास्त्रे नाहि शुनि। हेन भाव व्यक्त करे न्यासि-चूड़ामणि ॥ 81 ॥ अप्राकृत अधोक्षज-भावमुद्रा अक्षज ज्ञानीकी समझसे परे :- शास्त्रलोकातीत येइ येइ भाव हय। इतर-लोकेर ताते ना हय निश्चय ॥ 82 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुमें प्रकाशित होने वाले अद्भुत विकारोंका वर्णन किया, जिन्हें सुनकर लोगोंको बहुत आश्चर्य होता है। क्योंकि लोगोंने न तो पहले किसीमें ऐसे विकार कभी देखे हैं और न ही शास्त्रोंमें सुने हैं, जिन्हें संन्यासी-चूड़ामणि महाप्रभुने प्रकाशित किया। शास्त्र और लोकातीत जो-जो भाव होते हैं, भगवद्-विमुख और साधारण लोगोंका उनमें विश्वास नहीं होता ॥ 80-82 ॥ अप्राकृत अनुभूतिसे श्रौत-पन्थामें ग्रन्थकारके द्वारा वर्णन :- रघुनाथ-दासेर सदा प्रभुसङ्गे स्थिति। ताँर मुखे शुनि' लिखि करिया प्रतीति ॥ 83 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी सदा महाप्रभुके पास रहते थे। महाप्रभुकी इन सब लीलाओंको उन्हींके मुखसे श्रवण करके उनके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखते हुए सब लिख रहा हूँ॥ 83 ॥ महाप्रभुके द्वारा चटक-पर्वतको गोवर्धन मानकर महाभावके आवेशमें उसकी ओर द्रुतगतिसे दौड़ना :- एकदिन महाप्रभु समुद्रे याइते। 'चटक'-पर्वत देखिलेन आचम्बिते ॥ 84 ॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभु समुद्रकी ओर जा रहे थे कि उन्हें अचानक 'चटक'-पर्वत दिखलायी दिया ॥ 84 ॥ अनुभाष्य—''चटक'-पर्वत',—बालूका पर्वत जैसा ऊँचा स्तूप; बालूका टीला ॥ 84 ॥ गोवर्धन-शैल-ज्ञाने आविष्ट हइला। पर्वत-दिशाते प्रभु धाञा चलिला ॥ 85 ॥
[ 14/86-97 चौदहवाँ अध्याय 369 अनुवाद—चटक-पर्वतको गिरिराज गोवर्धन मानकर उसमें आविष्ट होकर महाप्रभु पर्वतकी दिशामें दौड़ पड़े॥ 85॥ श्रीमद्भागवत (10/21/18) में— हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो यद्रामकृष्णचरण-स्पर्श-प्रमोदः। मानं तनोति सह-गोगणयोस्तयोर्यत् पानीय-सूयवस-कन्दर-कन्दमूलैः ॥ 86॥ अनुवाद—ये गोवर्धन पर्वत—वैष्णवप्रधान हैं, क्योंकि ये श्रीबलराम-कृष्णके चरणोंके स्पर्शके आनन्दसे प्रफुल्लित होकर गौओं और गोपोंके साथ श्रीराम-कृष्णको पीनेका जल और खानेकी वस्तुएँ—घास-कन्द-मूलादि प्रदान करके उनकी पूजा कर रहे हैं॥ 86॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 18/34 संख्या देखें॥ 86॥ साथी श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :— एइ श्लोक पड़ि' प्रभु चलेन वायुवेगे। गोविन्द धाइल पाछे, नाहि पाय लागे॥ 87॥ शोर मचाते हुए लोगोंका पीछे दौड़ना :— फुकार पड़िल, महा-कोलाहल हइल। येइ याँहा छिल, सेइ उठिया धाइल॥ 88॥ सभी भक्तोंका वहाँपर आगमन :— स्वरूप, जगदानन्द, पण्डित-गदाधर। रामाइ, नन्दाइ आर पण्डित-शङ्कर॥ 89॥ पुरी-भारती-गोसाञि आइला सिन्धुतीरे। भगवान्-आचार्य-खञ्ज, चलिला धीरे धीरे॥ 90॥ अनुवाद—इस श्लोकको पढ़ते हुए महाप्रभु वायुके वेगसे दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्द भी महाप्रभुके पीछे दौड़े, किन्तु वे उनके निकट नहीं पहुँच पाये। कोई भक्त यह देखकर चिल्लाया और उसे सुनकर सभी कोलाहल करने लगे। जो जहाँपर भी था, वह उठकर महाप्रभुके पीछे दौड़ पड़ा। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती गोस्वामी समुद्रतटपर आ गये। श्रीभगवान् आचार्य लँगड़ाकर चलते थे, इसलिये वे धीरे-धीरे चलने लगे॥ 87-90॥ मार्गमें स्तम्भ आदि विकारका वर्णन :— प्रथमे चलिला प्रभु,—येन वायुगति। स्तम्भभाव पथे हैल, चलिते नाहि शक्ति॥ 91॥ अनुवाद—पहले तो महाप्रभु वायुकी गतिसे दौड़े चले जा रहे थे, किन्तु मार्गमें उनमें स्तम्भ-भाव उदित हो आया, जिसके कारण उनमें चलनेकी शक्ति तक चली गयी॥ 91॥ प्रति रोमकूपे मांस-व्रणेर आकार। तार उपरे रोमोद्गम-कदम्बप्रकार॥ 92॥ प्रति-रोमे प्रस्वेद पड़े रुधिरेर धार। कण्ठे घर्घर, नाहि वर्णेर उच्चार॥ 93॥ दुइ नेत्रे भरि' अश्रु बहये अपार। समुद्रे मिलिला येन गङ्गा-यमुना-धार॥ 94॥ वैवर्ण्य शङ्खप्राय, श्वेत हैल अङ्ग। तबे कम्प उठे,—येन समुद्रे तरङ्ग॥ 95॥ महाप्रभुका गिरना :— काँपिते काँपिते प्रभु भूमेते पड़िला। तबे त' गोविन्द प्रभुर निकटे आइला॥ 96॥ अनुवाद—महाप्रभुका प्रत्येक रोमकूप मुँहासेकी भाँति हो गया और उसके ऊपर रोमाञ्चका होना ऐसा प्रतीत हुआ मानो कदम्बका पुष्प खिल रहा हो। उनके प्रत्येक रोमकूपसे पसीनेके साथ रक्तकी भी धारा प्रवाहित हो रही थी। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, केवल उनके कण्ठसे घर-घरका शब्द निकल रहा था। उनके दोनों नेत्रोंसे अपार अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो गङ्गा और यमुनाकी धाराएँ समुद्रमें मिलने जा रही हों। उनकी अङ्गकान्ति शङ्खकी भाँति
370 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/97-107 ] श्वेत हो गयी, उनके दिव्य कलेवरमें समुद्रकी तरङ्गोंकी भाँति कम्पन होने लगा। वे काँपते-काँपते भूमिपर गिर पड़े। तब श्रीगोविन्द महाप्रभुके निकट आये ॥ 92-96 ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा जल छिड़कना और पंखा झलकर महाप्रभुको चेतन करनेका प्रयास :- करङ्गेर जले करे सर्वाङ्ग सिञ्चन। बहिर्वास लञा करे अङ्ग संबीजन ॥ 97 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर कमण्डलुके जलको छिड़का और बहिर्वाससे उन्हें पंखा झलने लगे ॥ 97 ॥ महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर सभीके द्वारा रोना :- स्वरूपादिगण ताँहा आसिया मिलिला। प्रभुर अवस्था देखि' कान्दिते लागिला ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भी वहाँ आ पहुँचे और वे महाप्रभुकी अवस्थाको देखकर क्रन्दन करने लगे ॥ 98 ॥ महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकारोंको देखकर सभीका विस्मय :- प्रभुर अङ्गे देखे अष्टसात्त्विक विकार। आश्चर्य सात्त्विक देखि' हैला चमत्कार ॥ 99 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने महाप्रभुके अङ्गोंमें अष्ट-सात्त्विक विकार देखे। वे इन सात्त्विक विकारोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये ॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'अष्टसात्त्विक विकार',—स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय ॥ 99 ॥ सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन और श्रीगोविन्दादिके द्वारा जल छिड़कना :- उच्च सङ्कीर्त्तन करे प्रभुर श्रवणे। सुशीतल जले करे प्रभुर अङ्ग सम्मार्जने ॥ 100 ॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानोंके निकट उच्च स्वरसे सङ्कीर्तन करने लगे और सुशीतल जलसे महाप्रभुके दिव्य अङ्गोंका सम्मार्जन (स्वच्छ) करने लगे ॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'श्रवणे',—कानके निकट ॥ 100 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें आना :- एइमत बहुबार कीर्त्तन करिते। 'हरिबोल' बलि' प्रभु उठे आचम्बिते ॥ 101 ॥ अनुवाद—इस प्रकार बहुत देर तक कीर्तन करनेपर महाप्रभु अचानक 'हरिबोल' बोलते हुए उठ खड़े हुए ॥ 101 ॥ प्रसन्नतासे भरकर सभीके द्वारा हरिध्वनि :- सानन्दे सकल वैष्णव बोले 'हरि' 'हरि'। उठिल मङ्गलध्वनि चतुर्दिक भरि' ॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके खड़े होनेपर सभी वैष्णव आनन्दसे 'हरि', 'हरि' बोलने लगे। उस मङ्गलमयी 'हरि' ध्वनिसे चारों दिशाएँ गूँज उठीं ॥ 102 ॥ महाप्रभुकी अर्द्धबाह्यदशा :- उठि' महाप्रभु विस्मित, इति उति चाय। ये देखिते चाय, ताहा देखिते ना पाय ॥ 103 ॥ अनुवाद—महाप्रभु उठकर आश्चर्यचकित होकर इधर-उधर देखने लगे, वे जो देखना चाहते थे, वे उसे नहीं देख पा रहे थे ॥ 103 ॥ 'वैष्णव' देखिया प्रभुर अर्द्धबाह्य हइल। स्वरूप-गोसाञिरे किछु कहिते लागिल ॥ 104 ॥ अनुवाद—वैष्णवोंको 'हरि' 'हरि' बोलते देखकर महाप्रभु अर्द्धबाह्यदशामें आ गये। वे श्रीस्वरूप दामोदरको कुछ कहने लगे— ॥ 104 ॥ अनुभाष्य—'अर्द्धबाह्य',—सम्पूर्ण बाह्य संज्ञा (चेतनता) प्राप्त नहीं करके ॥ 104 ॥
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[ 14/105–116 चौदहवाँ अध्याय 371 श्रीराधाकी दासीके अभिमानमें महाप्रभुके द्वारा अपनी अवस्थाका वर्णन :- “गोवर्धन हैते मोरे के इँहा आनिल? पाञा कृष्णेर लीला देखिते ना पाइल॥ 105 ॥ इँहा हैते आजि मुइ गेनु गोवर्धने। देखों,–यदि कृष्ण करेन गोधन-चारणे॥ 106 ॥ गोवर्धने चड़ि’ कृष्ण बाजाइला वेणु। गोवर्धनेर चौदिके चरे सब धेनु॥ 107 ॥ वेणुनाद शुनि’ आइला राधाठाकुराणी। सब सखीगण-सङ्गे करिया साजनि॥ 108 ॥ अनुवाद—“मुझे गोवर्धनसे यहाँपर कौन लाया ? मैं श्रीकृष्णकी लीलाको देख रहा था, परन्तु अब उसे देख नहीं पा रहा हूँ। आज मैं यहाँसे गोवर्धन यह देखने गया था कि क्या वहाँ श्रीकृष्ण गौओंको चरा रहे हैं? मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोवर्धनपर चढ़कर वेणु बजा रहे हैं और गोवर्धनके चारों ओर गायें चर रही हैं। वेणुकी ध्वनिको सुनकर श्रीराधा ठाकुराणी और उनके साथ सब सखियाँ सजकर वहाँ आ गयीं॥ 105-108 ॥ अनुभाष्य—‘करिया साजनि’,–सजकर ॥ 108 ॥ राधा लञा कृष्ण प्रवेशिला कन्दराते। सखीगण चाहे কেহ फुल उठाइते॥ 109 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण श्रीराधाको साथ लेकर एक गुफामें प्रवेश कर गये। उन सखियोंने पुष्प चयन करते समय उन्हें गुफामें प्रवेश करते देखा ॥ 109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘कन्दराते’,–गुफामें ॥ 109 ॥ हेनकाले तुमि-सब कोलाहल कैला। ताँहा हैते धरि’ मोरे इँहा लञा आइला॥ 110 ॥ श्रीकृष्णसङ्गसे वञ्चित महाप्रभुका क्रन्दन, भक्तोंका भी क्रन्दन :- केने वा आनिला मोरे वृथा दुःख दिते। पाञा कृष्णेर लीला, ना पाइनु देखिते!!” 111 ॥ अनुवाद—तभी तुम सबने कोलाहल मचा दिया और वहाँसे पकड़कर मुझे यहाँ ले आये। आप लोग मुझे वृथा दुःख देनेके लिये यहाँ क्यों ले आये? श्रीकृष्णकी लीलाको देखनेका अवसर प्राप्त करके भी मैं उसे देख नहीं पाया ॥” 110-111 ॥ एत बलि’ महाप्रभु करेन क्रन्दन। ताँर दशा देखि’ वैष्णव करेन रोदन ॥ 112 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु क्रन्दन करने लगे। उनकी ऐसी दशाको देखकर सभी वैष्णव भी रोने लगे॥ 112 ॥ महाप्रभुका बाह्यदशामें मर्यादा-प्रदर्शन :- हेनकाले आइला पुरी, भारती,–दुइजन। दुँहे देखि’ महाप्रभु हइल सम्भ्रम ॥ 113 ॥ अनुवाद—उसी समय वहाँपर श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती आ गये। उन दोनोंको देखकर महाप्रभुमें सम्भ्रम भाव आ गया ॥ 113 ॥ निपट्ट-बाह्य हइले प्रभु दुँहारे वन्दिला। महाप्रभुरे दुइजन प्रेमालिङ्गन कैला ॥ 114 ॥ अनुवाद—सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर महाप्रभुने उन दोनोंकी वन्दना की। तब उन दोनोंने महाप्रभुको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया ॥ 114 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘निपट्ट-बाह्य हइले’,–अनाच्छादित बाह्य अर्थात् सम्पूर्ण बाह्यदशामें आनेपर ॥ 114 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा और पुरीका उत्तर :- प्रभु कहे,—“दुँहे केने आइला एत दूरे?” पुरीगोसाञि कहे,—“तोमार नृत्य देखिबारे॥” 115 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप दोनों इतनी दूर किसलिये आये हैं?” श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीने कहा,—“हम
372 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/117-120 ] आपका नृत्य देखनेके लिये आये हैं॥" 115॥ महाप्रभुका लज्जित होना और भक्तोंके साथ समुद्र स्नानके पश्चात् प्रसादका सम्मान :- लज्जित हइला प्रभु पुरीर वचने। समुद्रघाट आइला सब वैष्णव-सने ॥116॥ अनुवाद-श्रीपरमानन्द पुरीके वचनको सुनकर महाप्रभु लज्जित हो गये और वे सभी वैष्णवोंके साथ समुद्रके तटपर आ गये॥116॥ स्नान करि' महाप्रभु घरेते आइला। सबा लञा महाप्रसाद भोजन करिला ॥117॥ अनुवाद-महाप्रभु स्नान करके सभी भक्तोंके साथ अपने वासस्थानपर आ गये और सभीने साथमें श्रीजगन्नाथके महाप्रसादका भोजन किया॥117॥ महाप्रभुका अप्राकृत दिव्योन्माद-ब्रह्माके भी अगोचर :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर दिव्योन्माद-भाव। ब्रह्माओ कहिते नारे याहार प्रभाव ॥118॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके दिव्योन्माद-भावका वर्णन किया। ब्रह्मा भी उसके प्रभावका वर्णन नहीं कर सकते॥118॥ श्रीरघुनाथदासके द्वारा अपने ग्रन्थमें महाप्रभुकी यह लीला वर्णित :- 'चटक'-गिरि-गमन-लीला रघुनाथदास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥119॥ अनुवाद-महाप्रभुकी चटक-पर्वतकी ओर जानेकी लीलाको श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित 'चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष'में प्रकाशित किया है॥119॥ स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष-स्तवका आठवाँ श्लोक :- समीपे नीलाद्रेश्चटकगिरिराजस्य कलना- दये गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुमितः। व्रजन्नस्मीत्युक्तवा प्रमद इव धावन्नवधृतो गणैः स्वैर्गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥120॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाचलके निकट समुद्रकी बालूके द्वारा बने पर्वतरूपी चटकपर्वतको देखकर
[ 14/120–123 चौदहवाँ अध्याय 373 'व्रजमें गोवर्धन गिरिराजका दर्शन करूँगा' ऐसा कहकर महाप्रभु द्रुतगतिसे चलने लगे। वैष्णवोंसे घिरे वे गौराङ्गदेव मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त कर रहे हैं॥ 120 ॥ चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— नीलाद्रेः (नीलाचलस्य) समीपे (निकटे) चटक-गिरिराजस्य (सैकतस्तूपरूप-पर्वतस्य) कलनात् (ईक्षणात्) अये इतः (क्षेत्रात्) गोष्ठे गोवर्धनगिरिपतिं लोकितुं (द्रष्टुं) व्रजन् अस्मि (व्रजामि) इति उक्त्वा प्रमदः (प्रमत्तः) इव धावन् स्वैः गणैः (स्वरूपादिभिः) अवधृतः (पश्चादनुसृतः), स गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 120 ॥ चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुकी अलौकिक लीला :— एबे प्रभु यत कैला अलौकिक-लीला। के बुझिते पारे सेइ महाप्रभुर खेला ?? 121 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जिन समस्त अलौकिक लीलाओंको प्रकाशित किया, महाप्रभुकी उन लीलाओंको कौन समझ सकता है ? 121 ॥ महाप्रभुके श्रीकृष्णविरहके अनुसरणमें ही जीवको श्रीकृष्णचरणोंकी प्राप्ति :— संक्षेपे कहिया करि दिक् दरशन। येइ इहा शुने, पाय कृष्णेर चरण॥ 122 ॥ अनुवाद—मैं महाप्रभुकी लीलाओंको संक्षेपमें वर्णन करके केवल दिग्दर्शन ही करवा रहा हूँ। जो कोई भी महाप्रभुकी इन लीलाओंका श्रवण करता है, उसे श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 122 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 123 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे चटकगिरि-गमनरूप-दिव्योन्मादवर्णनं नाम चतुर्दशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 123 ॥ त्यखण्डमें चटकगिरि-गमनरूप- दिव्योन्माद-वर्णन नामक चौदहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।