भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2342, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2342

[ 13/14-22 तेरहवाँ अध्याय 325 स्वयंको विरक्त संन्यासीके अभिमानसे महाप्रभुके द्वारा कृत्रिम क्रोध करते हुए अभियोग :- प्रभु कहेन, - “खाट एक आनह पाड़िते। जगदानन्द चाहे आमाय विषय भुञाइते ॥ 14 ॥ संन्यासी मानुष आमार भूमिते शयन। आमारे खाट-तुलि-बालिश-मस्तक मुण्डन!!” 15 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “अब एक खाट भी और ले आओ। जगदानन्द तो मुझे विषयोंका भोग कराना चाहता है। मैं संन्यासी हूँ और मुझे भूमिपर ही शयन करना चाहिये। मेरे लिये खाट-गद्दा-तकिया प्रयोग करना लज्जाकी बात है!” 14-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मस्तक-मुण्डन', - लज्जित करवानेकी बात ॥ 15 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दको महाप्रभुके वचन बतलाना, श्रीजगदानन्दको कष्ट :- स्वरूप-गोसाञि आसि' पण्डिते कहिला। शुनि' जगदानन्द मने महादुःख पाइला ॥ 16 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने आकर यह बात श्रीजगदानन्द पण्डितको बतलायी। इसे सुनकर श्रीजगदानन्द पण्डितके मनमें बहुत दुःख हुआ ॥ 16 ॥ सेवामें चतुर श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुकी सेवाके लिये शय्या-द्रव्यका निर्माण :- स्वरूप-गोसाञि तबे सृजिला प्रकार। कदलीर शुष्कपत्र आनिला अपार ॥ 17 ॥ नखे चिरि' चिरि' ताहा अति सूक्ष्म कैला। प्रभुर बहिर्वासेते से-सब भरिला ॥ 18 ॥ बहुत कठिनाईसे महाप्रभुके द्वारा उसे ग्रहण करनेके लिये सम्मति-प्रदान :- एइमत दुइ कैला ओड़न-पाड़ने। अङ्गीकार कैला प्रभु अनेक यतने ॥ 19 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने एक अन्य उपाय किया। वे केलेके बहुतसे सूखे पत्ते ले आये। उन्होंने उन सूखे पत्तोंको अपने नाखूनोंसे चीर-चीर कर बहुत सूक्ष्म कर दिया और फिर उन्हें महाप्रभुके दो बहिर्वासमें भर लिया। इस प्रकार उन्होंने दोनों बहिर्वासमें भरे हुए केलेके पत्तोंको हिला-डुलाकर ऐसा कर दिया कि उनका एक तकिये और एक गद्देका आकार बन गया। भक्तोंके द्वारा बहुत आग्रह करनेपर ही महाप्रभुने उसे स्वीकार किया ॥ 17-19 ॥ अनुभाष्य- 'ओड़न-पाड़न', - ओत-प्रोत; किसी-किसीके मतानुसार, - तकिया और गद्दा ॥ 19 ॥ महाप्रभुके शयनसे सभी सुखी, केवलमात्र श्रीजगदानन्दको दुःख :- ताते शयन करेन प्रभु, - देखि' सबे सुखी। जगदानन्द-भितर-बाहिरे महादुःखी ॥ 20 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको उस गद्देपर शयन करते देख सब भक्त आनन्दित हुए। एकमात्र श्रीजगदानन्द पण्डित ही भीतर-बाहरसे बहुत दुःखी थे ॥ 20 ॥ श्रीजगदानन्दकी वृन्दावन जानेकी इच्छा; पहलेसे ही यह इच्छा रहनेपर भी महाप्रभुके आदेशके बिना जानेमें असमर्थता :- पूर्वे जगदानन्देर इच्छा वृन्दावन याइते। प्रभु आज्ञा ना देन ताँरे, ना पारे चलिते ॥ 21 ॥ अब महाप्रभुके शयन-कार्यमें दुःखी होकर मथुरा जानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञाकी याचना :- भितरेर दुःख बाह्ये प्रकाश ना कैला। मथुरा याइते प्रभु-स्थाने आज्ञा मागिला ॥ 22 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितकी पहले भी वृन्दावन जानेकी इच्छा थी, किन्तु महाप्रभुने उन्हें जानेकी अनुमति नहीं दी, इसलिये वे वृन्दावनके लिये नहीं जा पाये। अब उन्होंने अपने भीतरके दुःखको बाहर प्रकाशित नहीं किया और महाप्रभुसे मथुरा जानेके लिये अनुमति माँगी ॥ 21-22 ॥

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