भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2343

326 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/23-32 ] महाप्रभुके द्वारा मधुर वचनोंसे सान्त्वना :- प्रभु कहे,–‘मथुरा याइबा आमाय क्रोध करि’। आमाय दोष लागाञा हइबा भिखारी ॥”23 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, –“तुम मेरे प्रति क्रोध करके मथुरा जाओगे, तो मुझपर दोष मढ़कर तुम भिखारी बनोगे ॥”23 ॥ वाम्यस्वभाव होनेपर भी महाप्रभुके चरणोंमें श्रीजगदानन्दके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक कातर-निवेदन :- जगदानन्द कहे प्रभुर धरिया चरण। “पूर्व हइते इच्छा मोर याइते वृन्दावन ॥ 24॥ प्रभु-आज्ञा नाहि, ताते ना पारि याइते। एबे आज्ञा देह', अवश्य याइमु निश्चिते ॥”25॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर कहने लगे, – “मेरी पहलेसे ही वृन्दावन जानेकी इच्छा थी। हे प्रभो! मुझे आपकी अनुमति नहीं मिली, इसलिये मैं नहीं जा पाया। किन्तु अब आप मुझे अनुमति प्रदान कीजिये, मैं अवश्य ही वहाँ जाऊँगा ॥”24-25॥ भक्तवत्सल महाप्रभुके द्वारा निषेध, श्रीजगदानन्दका हठ :- प्रभु प्रीते ताँर गमन ना करेन अङ्गीकार। तेँहो प्रभुर ठाञि आज्ञा मागे बार बार॥ 26 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रति प्रीति होनेके कारण उनकी वृन्दावन जानेकी बातको स्वीकार नहीं किया, तथापि श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुसे बारम्बार जानेकी अनुमति माँगते रहे ॥ 26 ॥ श्रीस्वरूपसे श्रीजगदानन्दका निवेदन, महाप्रभुकी श्रीजगदानन्दके जानेके विषयमें असहमति :- स्वरूप-गोसाञिरे पण्डित कैला निवेदन। “पूर्व हैते वृन्दावन याइते मोर मन ॥ 27 ॥ प्रभु-आज्ञा बिना ताँहा याइते ना पारि। एबे आज्ञा ना देन मोरे, ‘क्रोधे याह’ बलि’॥ 28॥ अपने जानेके विषयमें महाप्रभुकी सम्मति लेनेके लिये श्रीस्वरूपसे अनुरोध :- सहजेइ मोर ताँहा याइते मन हय। प्रभु-आज्ञा लञा देह', करिये विनय ॥”29 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे निवेदन किया, –“मेरी बहुत पहलेसे ही वृन्दावन जानेकी इच्छा थी, किन्तु मैं महाप्रभुकी अनुमतिके बिना वृन्दावन नहीं जा सकता। अब महाप्रभु मुझे यह कहकर अनुमति नहीं दे रहे कि ‘तुम क्रोध करके जा रहे हो।’ मेरी वृन्दावन जानेकी स्वाभाविक इच्छा है, इसलिये आप महाप्रभुसे विनती करके मुझे जानेकी अनुमति दिलवाइये ॥”27-29॥ अनुभाष्य— ‘ ‘क्रोधे याह’ बलि’,—‘क्रोधित होकर जा रहे हों’—ऐसा कहा ॥ 28 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उसके लिये महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन और आज्ञाकी याचना :- तबे स्वरूप गोसाञि कहे प्रभुर चरणे। “जगदानन्देर इच्छा बड़ याइते वृन्दावने ॥ 30॥ तोमार ठाञि आज्ञा तेँहो मागे बार बार। आज्ञा देह',—मथुरा देखि' आइसे एकबार ॥ 31 ॥ आइरे देखिते यैछे गौड़देशे याय। तैछे एकबार वृन्दावन देखि' आय ॥”32 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंमें निवेदन करते हुए कहा, –“जगदानन्दकी वृन्दावन जानेकी बहुत इच्छा है। उन्होंने आपसे बार बार वृन्दावन जानेकी अनुमति माँगी है, कृपया आप उन्हें एकबार मथुराको देखकर आनेकी अनुमति दे