भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2344

[ 13/30-38 तेरहवाँ अध्याय 327 दीजिये। वे जैसे गौड़देशमें आइके (श्रीशचीमाताके) दर्शनके लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक बार उन्हें वृन्दावन देखकर भी आने दीजिये॥”30-32॥ श्रीस्वरूपके अनुरोधपर श्रीजगदानन्दको बुलाकर वहाँपर जाकर करने योग्य कर्त्तव्यका उपदेश :— स्वरूप-गोसाञिर बोले प्रभु आज्ञा दिला। जगदानन्दे बोलाञा ताँरे शिखाइला॥ 33॥ मार्गके विषयमें उपदेश-प्रदान :— “वाराणसी पर्यन्त स्वच्छन्दे याइबा पथे। आगे सावधाने याइबा क्षत्रियादि-साथै॥ 34॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके कहनेपर श्रीजगदानन्द पण्डितको वृन्दावन जानेकी अनुमति दे दी। उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितको बुलाकर उन्हें समझाते हुए कहा,—“तुम्हें वाराणसी तकके मार्गमें कोई असुविधा नहीं होगी, किन्तु उससे आगे सावधानीपूर्वक किसी क्षत्रिय आदिके साथ ही जाना॥ 33-34॥ अनुभाष्य—‘क्षत्रियादि-साथै’,—डाकुओंसे रक्षा करनेवाले क्षत्रियोंके साथमें॥ 34॥ केवल गौड़ीया पाइले 'बाटपाड़' करि' बान्धे। सब लुटि' बाँधि' राखे, याइते विरोधे॥ 35॥ अनुवाद—गौड़ीयाको अकेले पाकर डाकू उन्हें बाँध लेते हैं। उनको लूटकर उन्हें बाँधकर रखते हैं और उन्हें कहीं जाने नहीं देते॥ 35॥ अनुभाष्य—गौड़ीया अर्थात् गौड़ अथवा बङ्गदेशके मनुष्य—स्वाभाविक रूपमें पतले और दुर्बल दिखते हैं। अकेले मिलनेपर निसहाय दुर्बल व्यक्तियोंको बाटपाड़ अर्थात् मार्गमें लूटनेवाले डाकू बाँधकर रख लेते हैं और उनका समस्त धन ले लेते हैं एवं जानेके विषयमें विरोध करते हैं अर्थात् जाने नहीं देते। किसी-किसीके मतानुसार—गौड़ीयोंको 'सुचतुर' देखकर उनसे डाकूका कार्य करवाते हैं और डाकूके कार्यमें नियुक्त करके उन्हें कभी भी छोड़ते नहीं हैं॥ 35॥ मथुरा पहुँचनेपर कर्त्तव्यका उपदेश; ऐश्वर्य-ज्ञानहीन रागमार्गके भक्तोंके साथ सङ्गके विषयमें सतर्क करना :— मथुरा गेले सनातन-सङ्गे रहिबा। मथुरार स्वामी-सबेर चरण वन्दिबा॥ 36॥ अनुवाद—तुम मथुरा पहुँचकर सनातनके सङ्गमें रहना और मथुरावासी चौबे अर्थात् चतुर्वेदी ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करना॥ 36॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मथुरार स्वामी-सबेर',—मथुरावासी चौबे लोगोंके॥ 36॥ दूरे रहिं' भक्ति करि' सङ्गे ना रहिबा। ताँ-सबार आचार-चेष्टा लइते नारिबा॥ 37॥ अनुवाद—तुम उन चतुर्वेदी ब्राह्मणोंसे दूर रहकर ही उनकी सेवा करना, उनके सङ्गमें मत रहना। तुम उनके आचरण और क्रियाओंको ग्रहण नहीं कर पाओगे॥ 37॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णके प्रति शुद्धवात्सल्यभावसे वे जो आचरण करते हैं, वह—स्मार्त्तमतके विरुद्ध है; इसे देखकर (ऐश्वर्यभावमें रत) तुम्हारे मनमें अश्रद्धा हो सकती है। किन्तु ब्रजमण्डलवासियोंके प्रति ऐसी अश्रद्धा नहीं होनी चाहिये; क्योंकि, उनकी भक्ति रागात्मिका है। अतएव (तुम्हारे जैसे ऐश्वर्यभावप्रिय भक्तको उन रागमार्गीय लोगोंके साथमें नहीं रहकर) दूर रहकर ही उनके प्रति भक्ति करना उचित है॥ 37॥ सदा श्रीसनातनके सङ्गमें रहनेका उपदेश :— सनातन-सङ्गे करिह वन दरशन। सनातनेर सङ्ग ना छाड़िबा एकक्षण॥ 38॥ अनुवाद—तुम सनातनके साथ जाकर ब्रजमण्डलके