श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें328 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/38–41 ] द्वादश-वनोंका दर्शन करना। तुम सनातनके सङ्गको एक क्षणके लिये भी मत छोड़ना॥ 38॥ श्रीजगदानन्दको विदायी-आलिङ्गन, श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :- श्रीकृष्णसे अभिन्न गोवर्धनपर चढ़नेके लिये निषेध :- एत बलि' जगदानन्दे कैला आलिङ्गन। शीघ्र आसिह, ताँहा ना रहिह चिरकाल। जगदानन्द चलिला प्रभुर वन्दिया चरण॥ 41 ॥ गोवर्धने ना चढ़िह देखिते 'गोपाल'॥ 39॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको आलिङ्गन किया। श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके वृन्दावनकी यात्रा आरम्भ की॥ 41॥ अनुवाद-तुम वृन्दावनसे शीघ्र ही लौटकर आ जाना, वहाँ बहुत समय तक मत रहना। और श्रीगोपालका दर्शन करनेके लिये गोवर्धनके ऊपर मत चढ़ना॥ 39॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा कि तुम वृन्दावन जाओ, परन्तु शीघ्र ही लौट आना। महाप्रभु जानते थे कि वे अधिक दिन वृन्दावन रह नहीं पायेंगे। (श्रीश्रीप्रेमविवर्त तेरहवाँ-चौदहवाँ अध्याय)- अमृतप्रवाह भाष्य-अधिक दिन तक व्रजमें रहनेपर व्रजवासियोंके दोषादि देखकर श्रद्धा कम हो जाती है। अतएव जिन्हें रागमार्ग प्राप्त नहीं हुआ, उनका व्रजमें वास करना उचित नहीं है, व्रजदर्शन करके शीघ्र लौटकर आ जाना ही अच्छा है। श्रीगोपालके दर्शनके लिये गोवर्धनपर नहीं चढ़ना, क्योंकि गोवर्धन-साक्षात् भगवान्की मूर्ति हैं; उनके ऊपर चढ़ना अच्छा नहीं है। गोपाल जब-जब अन्यान्य स्थानोंपर जाते हैं, उस समय उनका दर्शन करना ही अच्छा है॥ 39॥ “गौराङ्ग तोमार, चरण छाड़िया, चलिनु श्रीवृन्दावने। पूर्व-लीला तव, देखिब बलिया, हइल आमार मने॥” श्रीजगदानन्दने विचार किया कि वृन्दावन जाकर महाप्रभुके पूर्व जीवनकी लीला स्थलियोंका दर्शन करूँगा। जहाँ राधाजीने मान किया था और कृष्णने उनके मान-भञ्जनके लिये उनकी सेवा की थी, ऐसे (सेवाकुञ्ज) आदि उन सब स्थानोंमें जाऊँगा। श्रीसनातनको महाप्रभुके आनेका संवाद बतलाकर भजनके स्थानका निर्वाचन करनेका आदेश :- आमिह आसितेछि, - कहिह सनातने। आमार तरे एकस्थान करे वृन्दावने॥ "40॥ परन्तु वे पुरीसे थोड़ी दूर जानेपर एक निर्जन वनमें एक वृक्षके नीचे बैठकर चिन्ता करने लगे,-"मैं जो कुछ भी लाता हूँ, महाप्रभु उसे स्वीकार नहीं करते। मैं तो केवल उनकी सेवाके लिये यह सब करता हूँ, इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। परन्तु वे सब समय ऐसा ही करते हैं, इसलिये मैंने वृन्दावन जानेका निश्चय किया। उनके बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, मैं उनको छोड़कर नहीं जा सकता। अनुवाद-तुम सनातनसे कहना कि मैं पुनः वृन्दावन आऊँगा। वह मेरे लिये वृन्दावनमें एक रहनेके स्थानकी व्यवस्था करे॥ "40॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके पुनः वृन्दावन जानेकी बात किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं मिलती; परवर्ती 70 संख्यामें सनातन-प्रभुके द्वारा महाप्रभुके वासस्थानके रूपमें निर्वाचित स्थानके संस्कारके द्वारा अनुमान होता है कि महाप्रभु बादमें पुनः वृन्दावन जा भी सकते हैं॥ 40॥ केन सेइ भाव, हइल आमार, एखन काँदिया मरि। तोमारे ना देखि', प्राण छाड़ि' याय ना जानि एबे कि करि॥