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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

328 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/38–41 ] द्वादश-वनोंका दर्शन करना। तुम सनातनके सङ्गको एक क्षणके लिये भी मत छोड़ना॥ 38॥ श्रीजगदानन्दको विदायी-आलिङ्गन, श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :- श्रीकृष्णसे अभिन्न गोवर्धनपर चढ़नेके लिये निषेध :- एत बलि' जगदानन्दे कैला आलिङ्गन। शीघ्र आसिह, ताँहा ना रहिह चिरकाल। जगदानन्द चलिला प्रभुर वन्दिया चरण॥ 41 ॥ गोवर्धने ना चढ़िह देखिते 'गोपाल'॥ 39॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको आलिङ्गन किया। श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके वृन्दावनकी यात्रा आरम्भ की॥ 41॥ अनुवाद-तुम वृन्दावनसे शीघ्र ही लौटकर आ जाना, वहाँ बहुत समय तक मत रहना। और श्रीगोपालका दर्शन करनेके लिये गोवर्धनके ऊपर मत चढ़ना॥ 39॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा कि तुम वृन्दावन जाओ, परन्तु शीघ्र ही लौट आना। महाप्रभु जानते थे कि वे अधिक दिन वृन्दावन रह नहीं पायेंगे। (श्रीश्रीप्रेमविवर्त तेरहवाँ-चौदहवाँ अध्याय)- अमृतप्रवाह भाष्य-अधिक दिन तक व्रजमें रहनेपर व्रजवासियोंके दोषादि देखकर श्रद्धा कम हो जाती है। अतएव जिन्हें रागमार्ग प्राप्त नहीं हुआ, उनका व्रजमें वास करना उचित नहीं है, व्रजदर्शन करके शीघ्र लौटकर आ जाना ही अच्छा है। श्रीगोपालके दर्शनके लिये गोवर्धनपर नहीं चढ़ना, क्योंकि गोवर्धन-साक्षात् भगवान्की मूर्ति हैं; उनके ऊपर चढ़ना अच्छा नहीं है। गोपाल जब-जब अन्यान्य स्थानोंपर जाते हैं, उस समय उनका दर्शन करना ही अच्छा है॥ 39॥ “गौराङ्ग तोमार, चरण छाड़िया, चलिनु श्रीवृन्दावने। पूर्व-लीला तव, देखिब बलिया, हइल आमार मने॥” श्रीजगदानन्दने विचार किया कि वृन्दावन जाकर महाप्रभुके पूर्व जीवनकी लीला स्थलियोंका दर्शन करूँगा। जहाँ राधाजीने मान किया था और कृष्णने उनके मान-भञ्जनके लिये उनकी सेवा की थी, ऐसे (सेवाकुञ्ज) आदि उन सब स्थानोंमें जाऊँगा। श्रीसनातनको महाप्रभुके आनेका संवाद बतलाकर भजनके स्थानका निर्वाचन करनेका आदेश :- आमिह आसितेछि, - कहिह सनातने। आमार तरे एकस्थान करे वृन्दावने॥ "40॥ परन्तु वे पुरीसे थोड़ी दूर जानेपर एक निर्जन वनमें एक वृक्षके नीचे बैठकर चिन्ता करने लगे,-"मैं जो कुछ भी लाता हूँ, महाप्रभु उसे स्वीकार नहीं करते। मैं तो केवल उनकी सेवाके लिये यह सब करता हूँ, इसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। परन्तु वे सब समय ऐसा ही करते हैं, इसलिये मैंने वृन्दावन जानेका निश्चय किया। उनके बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता, मैं उनको छोड़कर नहीं जा सकता। अनुवाद-तुम सनातनसे कहना कि मैं पुनः वृन्दावन आऊँगा। वह मेरे लिये वृन्दावनमें एक रहनेके स्थानकी व्यवस्था करे॥ "40॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके पुनः वृन्दावन जानेकी बात किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं मिलती; परवर्ती 70 संख्यामें सनातन-प्रभुके द्वारा महाप्रभुके वासस्थानके रूपमें निर्वाचित स्थानके संस्कारके द्वारा अनुमान होता है कि महाप्रभु बादमें पुनः वृन्दावन जा भी सकते हैं॥ 40॥ केन सेइ भाव, हइल आमार, एखन काँदिया मरि। तोमारे ना देखि', प्राण छाड़ि' याय ना जानि एबे कि करि॥

[ 13/41 ]             तेरहवाँ अध्याय             329

हाय! क्यों ऐसे भाव मेरे हृदयमें आये कि वृन्दावन जाऊँ? अब तो मैं मर रहा हूँ। क्यों मैंने महाप्रभुसे आदेश लिया कि मैं वृन्दावन जाऊँ? अब मैं जा नहीं पा रहा हूँ, मेरे पाँव नहीं चलते हैं, मन जाना नहीं चाह रहा है। मैंने उनसे यह आदेश क्यों माँगा? अब तो उन्होंने आदेश दे दिया और मैं चला आया, किन्तु उन्हें न देखनेसे मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं, मैं इन्हें रोक नहीं सकता। समझ नहीं पा रहा हूँ कि वृन्दावन जाऊँ अथवा नहीं? क्या करूँ? और यदि यहींसे लौट जाऊँ, तो महाप्रभु व्यङ्ग करेंगे कि क्या वृन्दावनके दर्शन कर आये हो? ओ राङ्गा चरण, मम प्राण-धन, समुद्रबालिते राखि'। कि देखिते आईनु, निज माथा खाइनु, उड़ु उड़ु प्राणपाखी ॥ 'ओ रक्तिम (लाल) चरण!' उनके चरण प्रेमकी पुतली हैं। वे लाल-लाल चरण मेरे प्राण-धन हैं। नीलाचलमें समुद्र तटकी बालूमें अङ्कित उन चरणोंको छोड़कर मैं यहाँ क्या देखने आया हूँ? मैं केवल अपना सिर खा रहा हूँ। अब मेरे प्राण छटपट कर रहे हैं, उनके विरहमें मैं जीवित नहीं रह सकता। यत चलि' याइ, मन नाहि चले, तबु याइ जेद करि'। प्रेमेर विवर्त, आमारे नाचाय, ना बुझिया आमि मरि ॥” मेरी जानेकी इच्छा नहीं है। मेरे पैर नहीं चलते और मन भी नहीं चलता। यद्यपि मन तो महाप्रभुके पास लौटकर जाना चाहता है, तथापि मैं हठ करके वृन्दावनकी ओर जा रहा हूँ। प्रेमका विवर्त मुझे नचा रहा है, मेरे हृदयको नचा रहा है। मन प्रबोध नहीं मानता और मैं मर रहा हूँ।” श्रीजगदानन्द वहीं नीलाचलमें पेड़के नीचे बैठकर यह सब सोच रहे हैं। वे जितना ही महाप्रभुको छोड़कर जाना चाहते हैं, उतनी ही महाप्रभुकी लीलाएँ, उनका प्रेमकलह सभी कुछ उनको स्मरण आता है और वे आगे नहीं बढ़ पाते। “गौराङ्गेर रङ्ग, बुझिते नारिनु, पड़िनु दुःख-सागरे। आमि चाइ याहा, नाहि पाइ ताहा, मन ये केमन करे।” वहीं बैठे मनमें विचार कर रहे हैं, – “महाप्रभुके आचरणको मैं समझ नहीं पाता, मैं दुःखके सागरमें पड़ा हुआ हूँ। गौरचन्द्रके प्रेमको मैं समझ नहीं पाता हूँ। उनके सिरमें दर्द होता है और उससे उन्हें बहुत कष्ट होता है। उसका निवारण करनेके लिये मैं उनके लिये तेल लेकर आया, किन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। थोड़ासा तेल लगानेमें क्या दोष है? मैंने देखा कि उनका शरीर अति क्षीण हो रहा है। वे भूमिपर केवल चटाईके ऊपर सोते हैं और उनकी हड्डियोंमें चुभन होती है। मुझसे यह सहन नहीं होता, इसलिये मैंने थोड़ी-सी रुई लाकर उनके लिये एक गद्दा बनाया, तो उन्होंने उसे भी ग्रहण नहीं किया। अपितु मुझे प्रताड़ित करते हुए कहने लगे, – 'मैं तुम्हारे रुईके गद्देपर लेट जाता हूँ और तेल लगानेके लिये एक अङ्ग-मर्दन करनेवाला भी ले आओ, बादमें स्त्रियाँ भी मेरी सेवा करेंगी। इस प्रकार मेरे संन्यासकी बहुत प्रशंसा होगी।' मैं कभी-कभी वनके शाक, इमलीके पत्तोंकी चटनी आदि बनाता हूँ, उसे वे बहुत प्रेमसे खाते हैं। यदि मैं नहीं रहूँगा, तो कौन बनायेगा? उनके कार्य-कलाप मैं नहीं समझ पाता हूँ। छोटा हरिदासने थोड़ासा चावल किसी वैष्णवीसे माँग लिया तो उसका जीवन भरके लिये त्याग कर दिया। यह उनका कैसा विचार है? इन सब विचारोंको मैं नहीं समझ पाता। मैं महाप्रभुको सुख प्रदान करनेके लिये उनकी सेवा करता हूँ, परन्तु वे उसे ग्रहण नहीं करते। मैं अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ और अच्छे-अच्छे पकवान भी बनाकर उन्हें परोसता हूँ, किन्तु वे तो बिना तेलके

330 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41 ] सूखा वनका शाक, इमलीके पत्तेकी चटनी अथवा लाफरा ही खाते हैं। “गौराङ्गेर तरे, प्राण दिते याइ, ना हय मरण तबु।” मरिब बलिया, पड़िया समुद्रे, खाइ मात्र हाबुडुबु॥” गौरचन्द्रके लिये मैं प्राण देना चाहता हूँ। कैसे उनको सुखी बनाऊँ? किन्तु हो नहीं पाता। कभी कभी सोचता हूँ कि प्राण त्याग दूँ और जाकर समुद्रमें कूद जाता हूँ। नाक और मुखमें पानी भर जाता है, परन्तु उसी समय उनके चन्द्रमुखका स्मरण हो आता है और उसे देखे बिना रहा नहीं जाता। “से चन्द्रवदन, देखिबार लोभे, शीघ्र उठि सिन्धुतटे, पुनः नाहि देखि, प्राण उड़ि' याय, चलि पुनः टोटावाटे॥” इसलिये शीघ्रतासे पानीसे निकलकर उनके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लोभसे महाप्रभुके निकट आता हूँ, किन्तु निकट जाते ही मन पुनः खिन्न हो जाता है और वहींसे लौट आता हूँ। यदि महाप्रभु कहें कि समुद्रमें डूबकर मरनेके लिये गये थे, तो मरे क्यों नहीं? मर जाते। तो मैं कैसे कहता कि आपके दर्शनके लिये नहीं मरा। प्रेममें ऐसी बात नहीं कही जाती। समुद्रसे निकलकर दर्शन करनेके लिये गम्भीराके पास पहुँचकर सोचा कि अब कैसे मिलने जाऊँ? इसलिये पुनः लौटकर अपने स्थानपर चला आया। परन्तु उनके मुखचन्द्रका दर्शन नहीं पानेसे प्राण निकलनेको तत्पर होते हैं। पुनः आइटोटामें गदाधर पण्डितजीके पासमें चला आया। गोपीनाथाङ्गाने, देखि' गोरामुख, पड़ि अचेतन हञा। पण्डित गाँसाञि, मोरे लञा राखे, देखि पुनः संज्ञा पाञा॥ वहाँ महाप्रभु गदाधर पण्डितसे बातचीत कर रहे थे। मैंने दूरसे महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा और देखते ही अचेतन हो गया। गदाधर पण्डित मुझे देखकर शीघ्रतासे उठकर मेरे पास आये। मैं तो प्रेममें अचेतन पड़ा था। समुद्रसे तो पीड़ा लेकर आया और यहाँ जब महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा तो इतना आनन्द हुआ कि उसे सह नहीं सका और प्रेममें मूर्च्छित हो गया। गदाधर पण्डितने पानीका छींटा देकर पंखा झलकर किसी प्रकारसे मुझे चेतन किया। गौर-गदाधर, बसिया दु'जने, बलेन आमार कथा। अमनि काँदिया, याइ गड़ागड़ि, ना विचारि यथा तथा। गौर और गदाधर, ये दोनों बैठकर मेरे विषयमें ही वार्तालाप कर रहे थे। गदाधर कह रहे थे,-'आप इनकी बात क्यों नहीं मान लेते? थोड़ी-सी सेवा ग्रहण कर लेंगे तो क्या दोष हो जायेगा?' महाप्रभुने कहा,- 'यह मुझे विषय भोग करवाना चाहता है। मैं कैसे इसकी बात मान लूँ? यह गद्दा, तकिया बनाकर लाता है, सुगन्धित तेल लेकर आता और मालपुआ, खीर, रबड़ी आदि अनेक प्रकारके मिष्ठान्न बनाकर लाता है। मैं संन्यासी होकर इन्हें कैसे ग्रहण करूँगा? यह तुम्हारे समान सेवा क्यों नहीं करता है? मैं जैसे कहता हूँ, तुम ठीक वैसा ही करते हो। तो यह क्यों नहीं वैसा करता है?' गदाधर कहने लगे,- 'इनकी कुछ बात मान लेनेमें क्या दोष है?' उनकी बातोंको सुनकर, अपने प्रति महाप्रभु और गदाधर पण्डितके स्नेहको जानकर मैं फफक-फफक कर रोने लगा। मैं कुछ विचार नहीं कर सका और प्रेममें रोते हुए भूमिपर लोटने लगा। क्षणके विरह, सहिते ना पारि, गौर मोर हृदे नाचे! मरिते ना देय, बाँचिले कोन्दल, किसे मोर प्राण बाँचे ॥ मेरे लिये बड़ी भारी समस्या है, मैं महाप्रभुका विरह

[ 13/41 तेरहवाँ अध्याय 331 तनिक भी नहीं सह सकता, उनके बिना नहीं रह सकता। सब समय वे मेरे हृदयमें नाच रहे हैं, सब समय उनकी लीलाओंका स्मरण हो रहा है, उनके प्रेमका स्मरण हो रहा है। मैं मर भी नहीं सकता और जीवित रहनेपर प्रेम कलह, कैसे मैं अपने प्राण धारण करूँ? हेन अवस्थाय, गौरपद छाड़ि, मोर वृन्दावने आसा, ए बुद्धि हइल, केन नाहि जानि, इह-परलोक-नाशा॥ यह मेरी बुद्धि कैसे हुई कि महाप्रभुके प्रेममय चरणोंको छोड़कर मैं वृन्दावन जाऊँ? इससे तो मेरे इहलोक और परलोक, दोनों ही नष्ट हो जायेंगे। आज्ञा लइनु याइते, आज्ञा ना पालिले, ता'ते हय अपराध। गोराचाँदमुख, ना देखिया मरि, सब दिके मोर बाध॥ अब आज्ञा तो ले ली और यदि ना जाऊँ तो अपराध होगा। यह बड़ी भीषण समस्या हो गयी, अब मैं क्या करूँ? यदि महाप्रभुके आदेशका पालन नहीं करूँ तो अपराध होता है। और उनके आदेशका पालन करनेके लिये जाऊँ, तो मैं प्राण नहीं धारण कर पाऊँगा। अब मैं क्या करूँ? सभी ओर अब केवल विपत्ति ही विपत्ति है। गोराप्रेम या'र, सङ्कट ताहार, प्राण लञा टानाटानि। गदाधरगणे, एइ त' दुर्दशा, सबे करे काणाकाणि॥ जिसको श्रीकृष्ण या महाप्रभुसे ऐसा प्रेम हो गया है, उसके लिये सब समय सङ्कट ही सङ्कट है। प्राण लेकर ही खींचातानी है। सीताजीका रामचन्द्रजीसे प्रेम देखो। कैसा प्रेम है? जीवनमें जिसको हम सुख कहते हैं, वह सुख उन्हें कभी नहीं मिला। विवाहके बादसे ही केवल दुःख ही दुःख—वनवास, रावणके द्वारा हरण। कुछ समयके लिये अल्प सुख मिला, किन्तु पुनः रामचन्द्रने सदाके लिये उनको छोड़ दिया। राधाजीने कृष्णसे प्रेम किया, किन्तु अब विरहमें मर रही हैं। मिलनमें भी क्षणिक आनन्द होता है, किन्तु भावी विरहकी सम्भावनासे दुःखी हो जाती हैं और फिर जहाँ विरह अनुभव हुआ तो वे सब कुछ भूल जाती हैं। वे अनुभव करने लगती हैं कि आज तक कभी कृष्ण मुझसे नहीं मिले, मैंने कभी उनको देखा ही नहीं और विरहमें तड़पने लगती हैं। गोपियाँ कृष्णके विरहमें इतनी दुःखी हैं। उनकी विरह दशा देखकर उद्धवजी भी अत्यन्त विचलित हो गये और वृन्दावनमें रहनेकी अभिलाषा लेकर भी नहीं रह सके, पुनः मथुरा लौट गये। साधारण लोग इस विरह दशाको नहीं समझ पाते। जो गदाधरके गण हैं, वे ही समझ सकते हैं। जो गदाधरके गण नहीं हैं, वे आपसमें कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि गदाधरके गणोंकी ऐसी ही दुर्दशा होती है। भाइरे वृन्दावने याओया आर ह'लो ना! गोरामुख ना देखिया, गोरारूप धेयाइया, पथ भूलि' याइ अन्य देश। येखान हइते फिरि' पुनः याइ धीरे धीरे, पुनः आसि देखि से प्रदेश॥ वृन्दावन जा रहा था, गौरचन्द्रका दर्शन नहीं करके इतना तीव्र विरह हुआ कि उनका ही चिन्तन करने लगा और इसी चिन्तनमें मार्ग भूल गया। वृन्दावन जानेका सङ्कल्प किया था, किन्तु पैर किधर जा रहे हैं, यह पता नहीं। महाप्रभुका चिन्तन करते-करते अपनेमें खो गया। बहुत दूर आनेपर किसीसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछा, तो पता चला कि वह तो बहुत पीछे छूट गया। मैं वहाँसे लौटा, किन्तु पुनः महाप्रभुकी लीलाके स्मरणमें खो गया। एइरूपे कतदिने, याब आमि वृन्दावने, ना जानि कि हबे दशा मोर। वृक्षतले बसि' बसि' काटि आमि अहर्निशि, कभु मोर निद्रा आसे घोर॥'

332 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41-42 ] इस प्रकार कुछ दिन चलते-चलते सोचता रहता कि मैं वृन्दावनमें जा रहा हूँ और सदा महाप्रभुके चिन्तनमें विभोर रहता। जब रात हो जाती तो किसी वृक्षके नीचे सो जाता। एक बार मुझे घोर निद्रा आ गयी। और जिसका सदा चिन्तन कर रहा था उसीका स्वप्नमें दर्शन करने लगा और उसीमें विभोर हो गया। स्वप्ने बहु दूरे गिया, सिन्धुतटे प्रवेशिया, देखि गोरार अपूर्व नर्तन। गदाधर नाचे सङ्गे, भक्तगण नाचे रङ्गे, गाय गीत अमृतवर्षण॥ स्वप्नमें देखा कि अब मैं समुद्रके तटपर आ गया हूँ। वहाँ गौरचन्द्र नृत्य कर रहे हैं। भक्तलोग भी नाच रहे हैं और गदाधर पण्डित भी। स्वरूप दामोदर, रायरामानन्द आदि अपूर्व रसकी वर्षा करते हुए कीर्तन कर रहे हैं। नृत्यगीत-अवसाने, गोरा मोर हात टाने, बले, “तुमि क्रोधे छाड़ि गेले। आमार कि दोष बल, तव चित्त सुचञ्चल, व्रजे गेले आमा हेथा फेले॥' जब नृत्यगीत समाप्त हुआ, तब महाप्रभु मेरे निकट आये और मेरे हाथको पकड़कर बोले,- 'तुम क्रोध करके मुझे अकेला छोड़कर चले गये। मेरा क्या दोष था कि मुझे छोड़कर चले गये? तुम्हारा चित्त बहुत चञ्चल है। मुझे यहाँपर छोड़कर तुम अकेले वृन्दावन चले गये।' आइस आलिङ्गन करि, तब वक्षे वक्ष धरि', छाँड़ो मुञि चित्तेर विकार। मध्याह्ने करिया पाक, देह मोरे अन्न शाक, क्षुन्निवृत्ति हउक् आमार ॥ गौरचन्द्र मेरा आलिङ्गन करके कहने लगे,-'तुम अपने चित्तमें मेरे प्रति क्रोधको छोड़ दो। तुम भी दुःख पा रहे हो और मैं भी दुःख पा रहा हूँ। दोपहर हो गयी है और मुझे भूख लग रही है। तुम्हारे चले जानेपर कौन भोजन बनायेगा और कौन मुझे खिलायेगा ? जैसा शचीमाता बनाती है, वैसा ही चावल-शाक बनाकर खिलाओ जिससे मेरी तृप्ति हो। छाड़िया जगदानन्दे, मोर मन निरानन्दे, भोजनादि लइल कत दिन। कि बुझिया गेले तुमि, दुःखेते पड़िनु आमि, जगा मोरे सदा दयाहीन॥ मुझे भोजन किये हुए कितने दिन हो गये। हे जगदानन्द! तुम्हें छोड़कर मैं आनन्द रहित हो गया हूँ। क्या समझकर तुम मुझे छोड़कर चले गये? तुम जानते नहीं कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता और तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते। ओ जगा! तुम बड़े निष्ठुर हो। तुम क्या नहीं जानते कि तुम्हारे भोजन नहीं बनानेसे मैं नहीं खा सकता? शीघ्र व्रज निरखिया, आइस तुमि सुखी हञा, मोरे देह शाकान्न व्यञ्जन। तबे त' बाँचिव आमि, ता'ते सुखी हबे तुमि, क्रोधे मोरे ना छाड़ कखन॥ तुम व्रजके दर्शन करके शीघ्र ही लौटकर आ जाओ। तुम्हारे आनेसे ही मैं सुखी होऊँगा। मुझे शाक, चावल, तरकारी आदि दो। क्रोध करके मुझे कभी छोड़कर मत जाना।' इसके बाद मेरी निद्रा भङ्ग हो गयी और देखा कि अभी व्रजभूमि बहुत दूर है।” यह वास्तविक प्रेम है। ऐसा ही प्रेम यदि शिष्यका गुरुसे होगा तो यह बढ़ते-बढ़ते श्रीकृष्ण तक जायेगा। जब शिष्यकी ऐसी दशा हो कि वह अनुभव करे कि मैं गुरु और श्रीकृष्णकी सेवा नहीं कर पा रहा हूँ तो मैं क्यों प्राण धारण कर रहा हूँ, तब यह समझना चाहिये कि शिष्यके अन्दर कृष्णप्रेम उदित हुआ है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 41 ॥ भक्तोंसे विदायी लेकर काशी-आगमन :- सब भक्तगण-ठाञि आज्ञा मागिला। वनपथे चलि' चलि' वाराणसी आइला ॥ 42 ॥

[ 13/42-50 तेरहवाँ अध्याय 333

तपनमिश्र और वैद्य चन्द्रशेखरके साथ साक्षात्कार और संलाप :- तपनमिश्र, चन्द्रशेखर, —दोंहारे मिलिला। ताँर ठाञि प्रभुर कथा सकल शुनिला ॥ 43 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने सभी भक्तोंसे भी वृन्दावन जानेकी अनुमति ली और वनके पथसे चलते-चलते वाराणसी पहुँचे। वहाँ वे श्रीतपन मिश्र और श्रीचन्द्रशेखर वैद्यसे मिले तथा उन्होंने उन दोनोंसे महाप्रभुके द्वारा वाराणसीमें की गयी समस्त लीलाओंका श्रवण किया ॥ 42-43 ॥

मथुरामें श्रीसनातनके साथ मिलन और दोनोंका आनन्द :- मथुराते आसि' मिलिला सनातने। दुइजनेर सङ्गे दुँहे आनन्दित मने ॥ 44 ॥

अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित मथुरा पहुँचकर श्रीसनातन गोस्वामीसे मिले। परस्पर मिलनसे दोनोंका ही मन आनन्दित हो गया ॥ 44 ॥

श्रीसनातनके आनुगत्यमें श्रीजगदानन्दका द्वादशवन-दर्शन :- सनातन कराइला ताँरे द्वादशवन-दरशन। गोकुले रहिला दुँहे देखि' महावन ॥ 45 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीजगदानन्द पण्डितको द्वादश वनोंके दर्शन कराये। महावनके दर्शन करनेके पश्चात् दोनों गोकुलमें ही रह गये ॥ 45 ॥

दोनोंका एक ही साथमें रहना, किन्तु पृथक् अभ्यास होनेके कारण पृथक् खाद्य-ग्रहण :- सनातनेर गोफाते दुँहे रहे एकठाञि। पण्डित पाक करेन देवालये याइ' ॥ 46 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीकी गुफामें वे दोनों एक साथ रहने लगे। श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर रसोई बनाते थे ॥ 46 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—सनातनने तब माधुकरी-भिक्षामें प्राप्त रोटियोंके टुकड़ोंको खाकर जीवन निर्वाह करनेका अभ्यास किया था। प्रतिदिन चावल नहीं खानेसे मेरी तृप्ति नहीं होगी, यह कहकर श्रीजगदानन्द पण्डित मन्दिरमें जाकर भोजन बनाते थे। व्रजके मन्दिरोंमें चावल-दालका प्रसाद नहीं मिलता था ॥ 46 ॥

सनातन भिक्षा करेन याइ' महावने। कभु देवालये, कभु ब्राह्मण-सदने ॥ 47 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी महावनमें जाकर भिक्षा करते थे, वे कभी किसी मन्दिर और कभी किसी ब्राह्मणके घरपर प्रसाद पाते थे ॥ 47 ॥

मानद श्रीसनातनके द्वारा श्रीजगदानन्दकी सेवा :- सनातन पण्डितेर करे समाधान। महावने देन आनि' मागि' अन्न-पान ॥ 48 ॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी श्रीजगदानन्द पण्डितकी समस्त आवश्यकताओंको पूर्ण कर देते थे। वे महावनसे श्रीजगदानन्द पण्डितके खाने-पीनेके लिये चावल-छाछ आदि भिक्षा करके ले आते थे ॥ 48 ॥

अनुभाष्य— 'समाधान', — सभी कार्योंका सम्पादन अथवा सेवा ॥ 48 ॥

एकदिन श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनको निमन्त्रण और रसोई बनाना :- एकदिन सनातने पण्डित निमन्त्रिला। नित्यकृत्य करि' तँह पाक चड़ाइला ॥ 49 ॥

अनुवाद—एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ प्रसाद पानेका निमन्त्रण दिया। श्रीजगदानन्द पण्डित अपने नित्यकृत्य करके भोजन बनाने लगे ॥ 49 ॥

मस्तकपर संन्यासीके द्वारा दिये वस्त्रको पहनकर श्रीसनातनका श्रीजगदानन्दके घरमें आगमन :- 'मुकुन्द सरस्वती' नाम संन्यासी महाजने। एक बहिर्वासे तँहो दिल सनातने ॥ 50 ॥

334 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/50-61 ] सनातन सेइ वस्त्र मस्तके बान्धिया। जगदानन्देर वासा-द्वारे बसिला आसिया॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीको मुकुन्द सरस्वती नामक एक संन्यासी महाजनने अपना एक बहिर्वास दिया। श्रीसनातन गोस्वामी उस वस्त्रको सिरपर बाँधकर श्रीजगदानन्द पण्डितके द्वारपर आकर बैठ गये॥ 50-51 ॥ श्रीसनातनके वस्त्रको महाप्रभुके द्वारा दिया गया वस्त्र मानकर पण्डितका प्रेम :- रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला। 'महाप्रभुर प्रसाद' जानि' ताँहारे पुछिला॥ 52 ॥ श्रीसनातनकी वस्त्रप्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :- “काँहा पाइला तुमि एइ रातुल वसन?” “मुकुन्द-सरस्वती दिल”,—कहेन सनातन॥ 53 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके सिरपर बँधे गेरुए वस्त्रको देखकर श्रीजगदानन्द पण्डित प्रेमाविष्ट हो गये और उन्होंने उस वस्त्रको महाप्रभुका प्रसादी-वस्त्र समझकर श्रीसनातन गोस्वामीसे पूछा,—“तुम्हें यह गेरुआ वस्त्र कहाँसे मिला?” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मुझे यह वस्त्र मुकुन्द सरस्वतीने दिया है॥” 52-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘रातुल’,—गेरुआ॥ 52 ॥ महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य संन्यासियोंके दानको ग्रहण करनेसे श्रीजगदानन्दको क्रोध :- शुनि' पण्डितेर मने क्रोध उपजिल। भातेर हाण्डि हाते लञा मारिते आइल॥ 54 ॥ अनुवाद—यह सुनते ही श्रीजगदानन्द पण्डित बड़े क्रोधित हो गये और वे चावलकी हाण्डीको हाथमें लेकर श्रीसनातन गोस्वामीको मारनेके लिये आये॥ 54 ॥ श्रीसनातनको लज्जा :- सनातन ताँरे जानि' लज्जित हइला। बलिते लागिला पण्डित, हाण्डि चुलाते धरिला॥ 55 ॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा श्रीसनातनकी भर्त्सना :- “तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥ 56 ॥ अन्य संन्यासीर वस्त्र तुमि धर शिरे। कोन् ऐछे हय,—इहा पारे सहिवारे??” 57 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके महाप्रभुके प्रति प्रेमको श्रीसनातन गोस्वामी भली-भाँति जानते थे, इसलिये वे अपने इस आचरणसे लज्जित हो गये। श्रीजगदानन्द पण्डित भी हाण्डीको चूल्हेपर रखकर श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने लगे,—“तुम महाप्रभुके प्रधान पार्षद हो। महाप्रभुको तुम्हारे समान अन्य कोई प्रिय नहीं है। तुमने अन्य किसी संन्यासीके वस्त्रको अपने सिरपर धारण किया है, तो महाप्रभुके भक्तोंमें कौन ऐसा होगा जो तुम्हारे इस आचरणको सहन कर पायेगा?” 55-57 ॥ अनुभाष्य—‘जानि’’,—बतलाकर अथवा गौरप्रेममय जानकर॥ 55 ॥ अमानी मानद महाधीर श्रीसनातन-गोस्वामीका आत्मदैन्य और श्रीजगदानन्दकी गौरप्रेममें निष्ठाकी प्रशंसा :- सनातन कहे,—“साधु पण्डित-महाशय। तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय॥ 58 ॥ ऐछे चैतन्यनिष्ठा योग्य तोमाते। तुमि ना देखाइले इहा शिखिमु केमते?? 59 ॥ श्रीजगदानन्दके प्रेमकी परीक्षा और उसका प्रत्यक्ष दर्शन :- याहा देखिबारे वस्त्र मस्तके बान्धिलुँ। सेइ अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिलुँ॥ 60 ॥ रागमार्गीय परमहंसके लिये गेरुआ वस्त्र पहननेके विषयमें निषेध :- रक्तवस्त्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय। कोन प्रवासीरे दिमु, कि काय उहाय??” 61 ॥

[ 13/58–61 तेरहवाँ अध्याय 335 अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—‘हे श्रीजगदानन्द पण्डित महाशय, आपने जो हाण्डी उठा ली उसके लिये मैं आपको साधुवाद देता हूँ अर्थात् उसका अभिनन्दन करता हूँ। वास्तवमें आपके समान श्रीचैतन्य महाप्रभुको अन्य कोई प्रिय नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके प्रति आपकी ऐसी निष्ठा उपयुक्त ही है। यदि आप ऐसी निष्ठा नहीं दिखलायेंगे, तब फिर मैं कैसे सीखूँगा? मैंने जिसे देखनेके लिये इस गेरुए वस्त्रको मस्तकपर बाँधा था, मैंने उस अपूर्व प्रेमको प्रत्यक्ष देख लिया। वास्तवमें वैष्णवको गेरुआ वस्त्र पहनना शोभा नहीं देता। मैं यह वस्त्र किसी भ्रमणशील व्यक्तिको दे दूँगा, यह वस्त्र मेरे किस कामका है?”58–61 ॥ अनुभाष्य—वैष्णवगण—परमहंस और अकिञ्चन होते हैं। इसलिये वैधीभक्तिका पालन करनेवाले संन्यासियोंके द्वारा पहने जानेवाले गेरुए वस्त्रोंको पहनकर उन्हें (वैष्णवोंको) अपने परमहंस आश्रमका निर्देश अथवा प्रदर्शन नहीं करना पड़ता। विशेषतः अद्वितीय परमेश्वर श्रीगौरहरिके द्वारा एकदण्डीके वेशको स्वीकार करनेके कारण, उनके चरणाश्रित किङ्कर उनके दासाभिमानके कारण अप्राकृत चिद्विलास-भेद बुद्धिसे वेशग्रहणके विषयमें उनके जैसे व्यवहारको करनेके योग्य अथवा वैसे करनेकी विधि है, ऐसा नहीं मानते। संन्यास ग्रहण करके परमहंस वैष्णव-गुरूके आश्रयमें रहकर वैष्णवदासगण स्वयंको वर्णाश्रमातीत परमहंस-वैष्णवके आसनपर अधिष्ठित होनेके अयोग्य समझकर बहुत बार दैन्यज्ञापित करनेके उद्देश्यसे गुरु-वैष्णवोंके लिये अनुचित तुर्याश्रमोचित गेरुए वस्त्रोंको पहनते भी हैं॥ 61 ॥ अमृतानुकणा—श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा मस्तकपर बाँधा हुआ गेरूआ-वस्त्र श्रीमुकुन्द सरस्वती नामक किसी एकदण्डी संन्यासीके द्वारा दिया गया है, यह जानकर श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातनकी जो भर्त्सना की थी और उसके बाद श्रीसनातन गोस्वामीने उसके उत्तरमें जो “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय” कहा था, इससे कोई कोई वैष्णवसे शास्त्र अध्ययन ना करके विवर्त्तग्रस्त होकर विचार करते हैं कि ‘गेरूए वस्त्रका व्यवहार वैष्णवके लिये उचित नहीं है।’ ‘रातुल-वस्त्र’ या ‘रक्त-वस्त्र’ कहनेसे मुख्यतः कषाय वस्त्र या गैरिक-वस्त्र ही उद्दिष्ट होता है, इसमें सन्देह नहीं है। श्रीजगदानन्द-पण्डितकी कभी भी ‘गेरूए वस्त्र’के प्रति उदासीनता नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने गेरूए वस्त्रको देखकर क्षुब्ध होकर श्रीसनातन गोस्वामीकी भर्त्सना की थी। उन्होंने स्वयं महाप्रभुके लिये गद्दे और तकियेको प्रस्तुत करके कपड़ेको गेरूए रङ्गमें रङ्गा था,—“सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥” (अन्त्यलीला 13/7)। श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकके ऊपर धारण किये गेरूए-वस्त्रको देखकर पहले उसे महाप्रभुका प्रसादी वस्त्र जानकर प्रेमाविष्ट हुए थे,—“रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट हइला।” किन्तु जिनकी वे महाप्रभुके प्रधान पार्षदगणोंमें गणना करते थे, (“तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान। तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥”) उन श्रीसनातनप्रभुका मस्तक एकमात्र महाप्रभुके उच्छिष्ट वस्त्रके ही द्वारा भूषित होने योग्य है,—उस स्थानपर किसी एकदण्डी संन्यासीके वस्त्रको धारण करनेसे महाप्रभुके ‘निज-धन’–रूप श्रीसनातनके द्वारा अवज्ञा ही हुई है और वह श्रीजगदानन्दके लिये अत्यन्त असहनीय होनेके कारण उन्होंने श्रीसनातनकी इस प्रकारसे प्रणय भर्त्सना की थी। इसके द्वारा उनका गेरूए-वस्त्रके प्रति विरोध किस प्रकार प्रकाशित होता है? वास्तवमें इसके द्वारा श्रीजगदानन्दका श्रीमहाप्रभु और उनके प्रधान सेवक श्रीसनातन—इन दोनोंके प्रति ही अतिशय प्रणय प्रकाशित हुआ है। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस वाक्यसे गेरूए-वस्त्र और संन्यासवेश-धारण अर्थात् पक्षान्तरमें संन्यास ग्रहण वैष्णवोंका कभी भी कर्तव्य नहीं है, यही यदि श्रीसनातन गोस्वामीका अभिप्राय हो, तब उसके

अनुसार श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके संन्यासी सङ्गिगणोंका संन्यासवेशका भी अवैधरूपमें विचार किया जायेगा। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण 'स्वयं भगवान्'का संन्यास ग्रहण करना और उसके योग्य वेश धारण करना अवैध है! इस प्रकारका अशास्त्रीय विचार समस्त शास्त्रोंको जाननेवाले श्रीसनातन गोस्वामीके लिये कभी भी सम्भव नहीं है। समस्त वेद, उपनिषत्, पुराण, संहिता, यहाँ तक कि सर्वशास्त्रशिरोमणि श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्य महाप्रभुने जिनको भागवतके यथार्थ व्याख्याकार कहकर घोषणा की है, उन श्रील श्रीधरस्वामीकी भावार्थदीपिकामें (10/86/3) “पूज्यतम-त्रिदण्ड-वेषम्”-सर्वत्र जिस स्थानपर त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण करनेकी विधि और महिमा व्यक्त हुई है, उस स्थानपर सर्वपण्डितकुल- चूड़ामणि श्रीसनातन गोस्वामीके इस प्रकार वाक्यके अर्थका अनुसरण करनेपर यह किसी शास्त्र अनभिज्ञ ‘मोटी-बुद्धि’का कार्य नहीं है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीबृहद्भागवतामृत (2/7/14)की दिग्दर्शनी-टीकामें श्रीसनातन गोस्वामीने कहा है, — “ये श्रीभगवच्चरणार- विन्दाश्रयास्ते यतय एव नोच्यन्ते, किन्तु परमभक्ता एव, सर्वपरित्यागेन तच्चरणारविन्दाश्रयणात्, केवलं गृहादिपरित्यागनिष्ठाधर्मेव सन्न्यासग्रहणात् वेशमात्रेण यतिसादृश्यं तेषाम्।” अर्थात् “जिन्होंने भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय किया है, उनको (वेश-चिह्नके द्वारा) केवल ‘संन्यासी’ नहीं कहा जा सकता—सब कुछ परित्याग करके भगवान्के चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके कारण वे वास्तविक रूपमें भक्त ही हैं। केवल गृहादि-परित्यागमें निष्ठाके लिये ही संन्यास-ग्रहणके लिये वेशमात्रके द्वारा उनका (भक्तगणोंका) ‘संन्यास’-सादृश्य है।” श्रीचैतन्य महाप्रभुने भी यही कहा है,— ‘परात्मनिष्ठा-मात्र वेष-धारण। मुकुन्द-सेवाय हय संसार-तारण॥' (मध्यलीला 3/8)—संन्यास ग्रहणसे जो गेरुआ वेशादि धारण किया जाता है, वह केवल गृहत्यागादि-निष्ठा और परात्म- श्रीभगवान्के प्रति निष्ठाके लिये है। वेशधारण करनेसे ‘संसारसे उद्धार’ होता है, ऐसा नहीं है, वह केवल मुकुन्दसेवाके द्वारा ही होता है—यही गौड़ीयवैष्णव-सिद्धान्त है। इसलिये गैरिकवेश-धारण वैष्णवगणरे सङ्गत नहीं—इस प्रकारका विचार जो लोग करते हैं, वे तत्त्वदर्शी नहीं हैं, वे मात्सर्यसे कुपित होकर तत्त्वके विषयमें अन्धे हैं। “रक्तवस्त्र वैष्णवेर परिते ना युयाय”—इस सनातन-उक्तिको पहले उक्त प्रसङ्गके अनुसार ही समझना होगा। वैष्णव—कषाय-वस्त्रधारी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘मैं ही नारायण’, इस प्रकार माननेवाले एकदण्डी संन्यासीकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। इसलिये उनके द्वारा कषायवस्त्र धारण करनेसे वैष्णवका उच्च आसन निम्न हो जाता है। दूसरा, रागमार्गीय परमहंस वैष्णव—कषाय-वस्त्र धारण करनेवाले वैधमार्गीय वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यासीकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, उस क्षेत्रमें उनका गैरिकवस्त्र धारणकी विधिके ऊपर होनेके कारण उनके लिये उक्त वस्त्र ‘परिते ना युयाय’ (धारण करना उचित नहीं है)। “ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः। सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥” (भाः 11/18/28)—“जो बाहरी विषयोंसे विरक्त होकर मोक्षकी कामनासे ज्ञाननिष्ठ होते हैं अथवा मोक्ष विषयमें अपेक्षाशून्य होकर मेरे (श्रीकृष्णके) भक्त होते हैं, वे ‘सलिङ्ग-आश्रम’ अर्थात् संन्यासादि आश्रमके चिह्नस्वरूप गैरिकवस्त्र, त्रिदण्डादिका त्याग करके विधि-निषेधके अधीन ना होकर विचरण करेंगे।” यहाँपर इसको लक्ष्य करने योग्य यह है कि केवल वैष्णवके ही नहीं, ज्ञानीके भी उस प्रकार संन्यासोचित रक्तवस्त्र ‘परिते ना युयाय’। तब वे कौनसे अधिकारमें हैं?—इसका सदुत्तर उक्त श्लोककी श्रीविश्वनाथ-चक्रवर्त्तीपाद-कृत टीकामें स्पष्ट देखा जाता है, “परिपक्व-ज्ञानिनो निष्काम-स्वभक्तस्य च वर्णाश्रमनियमाभावमाह,—ज्ञाननिष्ठः परिपक्वज्ञानवान् ×× अत्र सर्वथा नैरपेक्षम्-जातप्रेम्णो भक्तस्य न सम्भवेदत उत्पन्नप्रेमैव भक्तः सलिङ्गानाश्रमांस्त्यजेत्, अनुत्पन्नप्रेमा तु निर्लिङ्गाश्रमधर्मांस्त्यजेदित्यर्थो लभ्यते।” अर्थात् “परिपक्व ज्ञानीके और निष्काम अपने भक्तोंके (श्रीकृष्णभक्तोंके)

[ 13/61 ] तेरहवाँ अध्याय 337


वर्णाश्रम-नियमका कोई प्रयोजन नहीं है, यही यहाँपर बतलाया गया है। ज्ञाननिष्ठ-जो परिपक्व-ज्ञानवान् हैं। सभी विषयोंमें निरपेक्षता अजातप्रेम-भक्तोंमें सम्भव नहीं है, इसलिये उत्पन्नप्रेम-भक्त ही केवल चिह्नसमूहके साथ 'आश्रम' त्याग करेंगे, (इसके द्वारा) अजातप्रेम-भक्त किन्तु 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' त्याग करेंगे—यही अर्थ प्राप्त हुआ है।”

इसलिये देखा जा रहा है, जो ज्ञानमार्गके अवलम्बी होकर (गीता 18/54) 'ब्रह्मभूत प्रसन्नात्मा' हुए हैं और जो आत्मधर्मके उचित शुद्धभक्तिके योगसे प्रेमावस्थाको प्राप्त किये हैं, वैसे पारमहंस्य-धर्ममें आरूढ़ व्यक्तिके लिये मात्र गैरिकवस्त्र-दण्डादि चिह्नोंके साथ संन्यासादि आश्रम परित्यागकी बात कही गई है, सर्व अधिकार-निर्विरशेषमें नहीं। अजातप्रेम-भक्त 'निर्लिङ्ग-आश्रमधर्म' अर्थात् पारमहंस्य-आश्रम, जिस आश्रमका निर्दिष्ट कोई चिह्न नहीं है, उसको त्याग करके अपने अधिकारके अनुसार वर्णाश्रम-नियमानुसार आश्रमोचित चिह्न आदि ग्रहण करेंगे—इस इङ्गितसे भी जो उक्त श्लोकसे एक साथ प्रदत्त हुआ है, वह रसिकभक्त-शेखर श्रीचक्रवर्तीपादने उनकी टीकामें अँगूलीके निर्देशके द्वारा दिखला दिया है।

वास्तवमें रागमार्गीय परमहंस-वैष्णवोंकी मर्यादा मार्गके उचित कषाय वस्त्र पहनने या उसका वर्जन करनेकी बाधकता नहीं है-वे गुणोंसे अतीत है। (गीता 14/22)— “न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति।” इसलिये देखा जाता है,—भक्तिकल्पवृक्षके अङ्कुर स्वरूप श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरी एवं उक्त वृक्षके नौ मूलस्वरूप (आदिलीला 9/10-16 संख्या)—श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीकेशवभारती, श्रीब्रह्मानन्दपुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीविष्णुपूरी, श्रीकेशवपुरी, श्रीकृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ तथा श्रीसुखानन्दपुरी आदि कृष्णप्रेमसिन्धुमें नित्य निमग्न भगवत्-पार्षदगण—उन्होंने बाहरी दृष्टिसे 'रक्तवस्त्र' परित्यागका कोई भी दृष्टान्त स्थापित नहीं किया। इसलिये कषाय-वस्त्रादिके द्वारा सभी स्थानोंपर ही 'अजातप्रेमत्व' या वर्णाश्रमके अधीन होना सूचित नहीं होता है, यही लक्ष्य करने योग्य है। विशेषतः रक्तवस्त्रके माध्यमसे एक ओर जिस प्रकार वे दैन्यवशतः अपने आपको लोगोंके समक्ष वर्णाश्रमके अन्तर्गत रूपमें चिह्नित करवाकर अपने हृदयमें स्थित सहज अनुरागको गोपन रखनेमें प्रयास करते हैं, दूसरी ओर उक्त रक्तवस्त्र उनके लिये एक विशेष उद्दीपन स्वरूप होकर परम भजनके अनुकूल विचारसे उसका अपरित्यज्य होना कुछ भी असम्भव नहीं है। “कनकनिवह-शोभानिन्दि-पीतं नितम्बे, तदुपरि नव-रक्तवस्त्र-मित्थं दधानः। प्रियमिव किल वर्णं रागयुक्तं प्रियायां, प्रणयतु मम नेत्राभीष्टपूर्ति मुकुन्दः॥” (श्रीरूपगोस्वामि-कृत 'श्रीमुकुन्दाष्टकम्')—'जो नितम्बदेशपर स्वर्णकान्तिको भी निन्दित करनेवाले पीतवस्त्र और उसके ऊपर 'रक्तवस्त्र' इस प्रकारसे धारण किये हैं, जिसके द्वारा प्रियतमा श्रीराधाके प्रिय रागयुक्त वर्णका निश्चय ही बोध होता है, वे मुकन्द मेरे नेत्रोंके अभीष्टको पूर्ण करें।” इसलिये विद्वद्-रूढ़ि विचारसे 'रक्तवस्त्र'में जो महिमा ग्रथित होती है, वह केवल भजन-चतुर व्यक्तियोंको ही अनुभव हो सकती है। और जिस कारणसे श्रीगौरसुन्दरके सेवकवर्गने कषाय-वस्त्रधारी एकदण्डीके वेशमें अवस्थित भगवान्के जैसे वेशग्रहण-प्रथाका आदर ना करके दीनजनोचित पुराने मैले वस्त्रादि ग्रहण किये थे, उसी शुद्धविचारका अवलम्बन करके श्रीगोपाल-भट्टादि रूपानुगगणोंने स्वाभाविक दैन्यवशतः श्रीरूपादि गुरुदेवके जैसा परमहंस-वेश ग्रहण ना करके भागवत-विधिके अनुसार एकान्त श्रीगौरसेवक श्रीप्रबोधानन्द त्रिदण्डिपादके आनुगत्य-प्रभावसे कषाय वस्त्र और शिखासूत्र धारणादि किया था। श्रीगोपालभट्ट बचपनसे ही बृहद्-व्रती (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) थे, इसलिये कषाय-वस्त्र परित्याग करके उनको वापस नहीं लौटना है। उस समयमें गौड़ीय समाजमें उक्त श्रीचैतन्यशिक्षाका आदर चलता आ रहा था। अनेक लोग (अपनी स्थूलबुद्धिके द्वारा प्रमाण करके) कहते हैं कि श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वयं कषाय

338 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/61-66 ]

वस्त्रधारी होनेपर भी उन्होंने किसीको भी उक्त वस्त्र विधानमें ही व्रती हैं॥61॥ धारण करनेका उपदेश नहीं दिया। महाप्रभु “आपनि महाप्रभुको भोग समर्पण और दोनोंके द्वारा आचरि' भक्ति शिखामु सबारे। आपने ना कैले धर्म एक साथ बैठकर प्रसादका सम्मान :- शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते पाक करि' जगदानन्द चैतन्ये समर्पिला। गाय॥” (आदिलीला 3/20-21)के इस विचारका अवलम्बन दुइजन बसि' तबे प्रसाद पाइला॥62॥ करके भक्तभावको अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। महाप्रभुके विरहमें दोनोंका क्रन्दन :- उन्होंने “मर्यादा-पालन हय साधुर भूषण”, “मर्यादा प्रसाद पाइ दुइजने कैला आलिङ्गन। राखिले तुष्ट हय मोर मन”, “मर्यादा लङ्घन आमि ना चैतन्यविरहे दुँहे करिला क्रन्दन॥63॥ पाँरो सहिते” (अन्त्यलीला चौथा अध्याय) आदि रूपमें श्रीसनातनप्रभुके माध्यमसे साधकभक्तोंको मर्यादा-मार्गके अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने भोजन बनानेके अवलम्बनका उपदेश किया है। इस प्रकारसे उनके पश्चात् श्रीचैतन्य महाप्रभुको भोग निवेदन किया और साक्षात् आचरण और वाणीसे यदि कोई उस प्रकारकी फिर श्रीजगदानन्द पण्डित एवं श्रीसनातन गोस्वामीने शिक्षा प्राप्त ना करे, तब उसे दुर्भागा ही कहा जायेगा। बैठकर प्रसाद पाया। प्रसाद पानेके बाद दोनोंने परस्पर साधकगणों और सिद्धगणोंका कषाय वस्त्र-धारणका आलिङ्गन किया और दोनों श्रीचैतन्य महाप्रभुके विरहमें इतिहास सत्ययुगसे ही दिखलायी देता है। बड़े-बड़े क्रन्दन करने लगे॥62-63॥ त्रिकालदर्शी महानुभाव ऋषि-महर्षिगण उक्त वस्त्रको दोनोंको श्रीगौर-विरहकी अनुभूति :- धारण करते थे। श्रीकृष्णलीलामें भगवती पौर्णमासी देवी एइमत मास दुइ रहिला वृन्दावने। सदा ही कषाय वस्त्र धारण करती थीं—'पौर्णमासीभगवती चैतन्यविरह-दुःख ना याय सहने॥64॥ सर्वसिद्धि-विधायनी। काषाय-वसना गौरी काशकेशीदरायता॥” (श्रीराधाकृष्णगणोद्देश-दीपिका) आदि। कलियुगमें भी अनुवाद—इस प्रकार श्रीजगदानन्द पण्डित दो मास श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, श्रीविष्णुस्वामी, श्रील श्रीधरस्वामी, तक वृन्दावनमें रहे। उनसे श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विरहका श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, स्वयंभगवान् श्रीचैतन्य दुःख सहन नहीं हो रहा था॥64॥ महाप्रभु, श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती, श्रीवल्लभाचार्य आदि महाप्रभुके भावी आगमनका संवाद बतलाना, साम्प्रदायिक-वैष्णवगणोंने संन्यास ग्रहण करके कषायवस्त्र- उसके लिये स्थानका निर्वाचन करनेकी आज्ञा :- धारणकी शाश्वत धाराको निरन्तर प्रवाहित रखा है। महाप्रभुर सन्देश कहिला सनातने। इसलिये वह धारा [श्रीरूप-सनातनादिके] परमहंस-आचरणकी 'आमिह आसितेछि, रहिते करिह एकस्थाने॥'65॥ अनुकरण प्रवृत्तियुक्त और अनुरागके आवरणमें कुछ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीको वेदविरोधी अपसम्प्रदायके उपद्रवसे लुप्त नहीं हो सकती। रागानुगा-अभिमानी होकर जो वास्तवमें बाहर महाप्रभुका सन्देश बतलाया,—'मैं वृन्दावन आ रहा हूँ, और भीतरमें श्रीरूपानुग नहीं हो पाते और बाहरी मेरे रहनेके लिये एक स्थानकी व्यवस्था कर देना॥'65॥ वेशसे ही मात्र रूपानुगत्यको प्रतिष्ठित करना चाहते हैं, श्रीजगदानन्दके द्वारा विदायी ग्रहण और महाप्रभुके लिये उनकी उस प्रकारकी चेष्टाकी शुद्ध वैष्णवगण सभी श्रीसनातनके द्वारा दिये गये द्रव्योंको लेना :- प्रकारसे निन्दा करके शास्त्रसम्मत विचारोंके अनुसारसे जगदानन्द-पण्डित तबे आज्ञा मागिला। मर्यादाके संरक्षणके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी सन्तुष्टिके सनातन प्रभुरे किछु भेटवस्तु दिला॥66॥

[ 13/66-75 तेरहवाँ अध्याय 339 रासस्थलीर बालु, आर गोवर्धनेर शिला। शुष्क पक्व पीलुफल आर गुञ्जामाला ॥ 67 ॥ श्रीजगदानन्दकी पुरी-यात्रा; श्रीजगदानन्दको श्रीसनातनके द्वारा कष्टपूर्वक विदायी देना :- जगदानन्द-पण्डित चलिला सब लञा। व्याकुल हैला सनातन ताँरे विदाय दिया ॥ 68 ॥ अनुवाद-तब श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीसनातन गोस्वामीसे श्रीजगन्नाथ पुरी लौट जानेके लिये अनुमति माँगी। श्रीसनातन गोस्वामीने उन्हें अनुमति प्रदान करके महाप्रभुको भेंट देनेके लिये रासस्थलीकी बालू, गोवर्धनकी शिला, सूखे हुए पके पीलूके फल और गुञ्जामाला दी। श्रीजगदानन्द पण्डित उन भेंटकी वस्तुओंको लेकर चलने लगे तो श्रीसनातन गोस्वामीने व्याकुल होकर उन्हें विदायी दी॥ 66-68 ॥ महाप्रभुके रहनेके लिये द्वादशादित्य-टीलामें मठका चयन और संस्कार-करवाना :- प्रभुर निमित्त एकस्थान मने विचारिला। द्वादशादित्य-टिलाय एक 'मठ' पाइला ॥ 69 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने मनमें विचार करके द्वादश-आदित्य-टीलापर बने एक देवालयको महाप्रभुके रहने योग्य स्थानके रूपमें स्थिर किया॥ 69 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'द्वादशादित्य-टिला',- श्रीमदनमोहनका पुरातन टूटा हुआ मन्दिर, जो ऊँचे टीलेके ऊपर स्थित है, उसीको ही 'द्वादशादित्य-टीला' कहते हैं। कृष्णलीलाके समय उसी स्थानपर द्वादश-आदित्य (सूर्य अपनी बारह कलाओंके साथ) उदित हुए थे॥ 69 ॥ अनुभाष्य- 'मठ',-देवालय (मन्दिर) ॥ 69 ॥ सेइ स्थान राखिला गोसाञि संस्कार करिया। मठेर आगे राखिला एक चालि बान्धिया ॥ 70 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने उस स्थानका पुनः उद्धार करके उसे साफ रखा और उस मठके सामने एक छोटी कुटिया भी बना दी॥ 70 ॥ श्रीजगदानन्दका पुरी जाना और भक्तों सहित महाप्रभुके साथ साक्षात्कार :- शीघ्र चलि' नीलाचले गेला जगदानन्द। भक्तसह गोसाञि हैला परम आनन्द ॥ 71 ॥ अनुवाद-उधर श्रीजगदानन्द पण्डितके शीघ्रतासे चलते हुए श्रीजगन्नाथ पुरी पहुँचनेपर महाप्रभु और उनके भक्तोंको परम आनन्दकी प्राप्ति हुई॥ 71 ॥ प्रभुर चरण वन्दि' सबारे मिलिला। महाप्रभु ताँरे दृढ़ आलिङ्गन कैला ॥ 72 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके सभी भक्तोंसे मिले। तब महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितको गाढ़ आलिङ्गन किया॥ 72 ॥ महाप्रभुको श्रीसनातनकी ओरसे दण्डवत् ज्ञापन और उनके द्वारा प्रदान की गयी वस्तुएँ देना :- सनातनरे नामे पण्डित दण्डवत् कैला। रासस्थलीर धूलि आदि सब भेट दिला ॥ 73 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने महाप्रभुको श्रीसनातन गोस्वामीकी ओरसे दण्डवत् प्रणाम किया और उनके द्वारा भेजी गयी रासस्थलीकी रज आदि भेंटको दिया ॥ 73 ॥ भक्तोंके द्वारा पीलूफलको खानेकी लीला :- सब द्रव्य राखिलेन, पीलु दिलेन बाँटिया। 'वृन्दावनेर फल' बलि' खाइला हृष्ट हञा ॥ 74 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने अन्य सब वस्तुएँ अपने पास रखकर पीलूफलोंको भक्तोंमें बाँट दिया। सभी उस फलको 'वृन्दावनका फल' कहकर प्रसन्नतापूर्वक खाने लगे॥ 74 ॥ ये केह जाने, आँटि चुषिते लागिल। ये ना जाने गौड़ीया, पीलु चाबाञा खाइल ॥ 75 ॥

340 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/75-84 ] मुखे तार झाल गेल, जिह्वा करे ज्वाला। वृन्दावनेर ‘पीलु’ खाइते एइ एक लीला ॥ ७६ ॥ अनुवाद—जो भक्त पीलूफलको खाना जानते थे, वे तो गुठलीको चूसने लगे। जो गौड़देशके भक्त इस फलको खाना नहीं जानते थे, वे पीलूको चबाकर खाने लगे। तीखी मिर्चके समान स्वादसे उनकी जिह्वा जलने लगी। वृन्दावनके पीलूको खानेकी यह भी महाप्रभुकी एक लीला है ॥ ७५-७६ ॥ वृन्दावनसे श्रीजगदानन्दके आनेसे सभीको प्रसन्नता :- जगदानन्देर आगमने सबार उल्लास। एइमते नीलाचले प्रभुर विलास ॥ ७७ ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके लौट आनेसे सभी भक्तोंको उल्लास हुआ। इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें अपना लीला-विलास कर रहे थे ॥ ७७ ॥ महाप्रभु और गुर्जरी-रागिनीमें गायिका देवदासीके वृत्तान्तका वर्णन; श्रीकृष्णसे सम्बन्धित पदको श्रवण करके महाप्रभुके द्वारा अर्द्धबाह्य दशामें प्रेमावेशमें अप्राकृत श्रीकृष्णसेवा- बुद्धिसे उनके साथ मिलनेके लिये दौड़ना :- एकदिन प्रभु यमेश्वर-टोटा याइते। सेइकाले देवदासी लागिला गाइते ॥ ७८ ॥ गुर्जरीरागिनी लञा सुमधुर-स्वरे। ‘गीतगोविन्द’-पद गाय जगमोहनेरे ॥ ७९ ॥ अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु गदाधर पण्डितको प्रदत्त स्थान यमेश्वर-उद्यानकी ओर जा रहे थे, उस समय कोई एक देवदासी समस्त जगत्वासियोंके मनको हरनेवाले ‘गीत-गोविन्द’के पदका गुर्जरी रागिनीमें अत्यन्त मधुर स्वरसे गान करने लगी ॥ ७८-७९ ॥ दूरे गान शुनि’ प्रभुर हइल आवेश। स्त्री, पुरुष, के गाय, —ना जानि’ विशेष ॥ ८० ॥ अनुवाद—दूरसे ही गानको सुनकर महाप्रभुमें आवेश आ गया। उस आवेशमें वे यह भी नहीं जान पाये कि गान कोई स्त्री कर रही है अथवा कोई पुरुष ॥ ८० ॥ तारे मिलिवारे प्रभु आवेशे धाइला। पथे ‘सिजेर बाड़ी’ हय, फुटिया चलिला ॥ ८१ ॥ अनुवाद—महाप्रभु गान करनेवालेसे मिलनेके आवेशमें दौड़ने लगे। मार्गमें काँटोंकी एक मेड़ थी, महाप्रभु उसीके बीचसे दौड़े चले गये ॥ ८१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘सिजेर बाड़ी’,—उड़ीसामें पुष्पोंके उद्यानको ‘फुलबाड़ी’ कहते हैं। वहाँपर काँटेकी झाड़ी अर्थात् मनसा-काँटा और काँटे-ही-काँटे वाली झाड़ियाँ रहती हैं, उसीको ‘सिजेर बाड़ी’ (काँटेवाली मेड़) कहते हैं। ‘बाड़ी’का अर्थ—मेड़ है ॥ ८१ ॥ आत्म-विभोर महाप्रभुकी रक्षाके लिये श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :- अङ्गे काँटा लागिल, किछु ना जानिला ! आस्ते-व्यस्ते गोविन्द ताँर पाछेते धाइला ॥ ८२ ॥ अनुवाद—आवेशके कारण महाप्रभुको यह भी नहीं अनुभव हुआ कि उनके अङ्गोंमें काँटे चुभे हैं। श्रीगोविन्द भी तुरन्त द्रुतगतिसे उनके पीछे दौड़ने लगे ॥ ८२ ॥ श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको सावधान करके बाह्यदशामें लाना :- धाञा यायेन प्रभु, स्त्री आछे अल्पदूरे। “स्त्री-गान” बलि’ गोविन्द प्रभुरे कैला कोले ॥ ८३ ॥ अनुवाद—महाप्रभु दौड़े जा रहे थे और वह स्त्री बस थोड़ी दूरीपर ही थी कि श्रीगोविन्दने—“स्त्री गान कर रही है”—कहकर महाप्रभुको अपनी भुजाओंमें भर लिया ॥ ८३ ॥ आश्रयजातीय-भावसे युक्त महाप्रभुका जगद्गुरुत्व आचार्यत्व; ‘गौरनागरी’-वादका खण्डन; महाप्रभुका लौटना :- स्त्री-नाम शुनि’ प्रभुर बाह्य हइला। पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि’ चलिला ॥ ८४ ॥

[ 13/84-92 तेरहवाँ अध्याय 341 अनुवाद—'स्त्री'-शब्दको सुनते ही महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये और वे उसी पथसे पुनः लौटने लगे॥ 84 ॥ स्त्रीका स्पर्श अथवा सङ्ग—आचार्य अथवा प्रचारककी मृत्युका कारण, इसलिये सब प्रकारसे परित्यज्य होनेके कारण श्रीगोविन्दके पास कृतज्ञता प्रकाशित करनेके छलसे शिक्षा-प्रदान :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, आजि राखिला जीवन। स्त्री-परश हैले आमार हइत मरण॥ 85 ॥ श्रीगोविन्दका नहीं चुकाया जा सकनेवाला ऋण, शरणागत श्रीगोविन्दका श्रीजगन्नाथको ही रक्षक-मानना :- ए-ऋण शोधिते आमि नारिमु तोमार।” गोविन्द कहे,—“जगन्नाथ राखेन, मुइ कोन् छार?” 86॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे गोविन्द, आज तुमने मेरा जीवन बचा लिया। यदि मैं स्त्रीको स्पर्श कर लेता, तो निश्चित ही मेरी मृत्यु होती। मैं तुम्हारे इस ऋणको कभी भी चुका नहीं पाऊँगा।” श्रीगोविन्दने कहा,—“भगवान् श्रीजगन्नाथने आपकी रक्षा की है, मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति कैसे आपकी रक्षा कर सकता है?” 85-86॥ महाप्रभुका श्रीगोविन्दको सब समय साथमें रहनेके लिये अनुरोध :- प्रभु कहे,—“गोविन्द, मोर सङ्गे रहिबा। याँहा ताँहा मोर रक्षाय सावधान हइबा॥” 87॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—'हे गोविन्द! तुम निरन्तर मेरे साथ ही रहना। इधर-उधर कहीं भी कुछ अनिष्ट होनेका भय है, इसलिये तुम सदा सावधानीसे मेरी रक्षा करना॥” 87॥ संवाद श्रवण करके और महाप्रभुकी अवस्थाका स्मरण करके श्रीस्वरूप आदिको आशङ्का :- एत बलि' लेउण्टि' प्रभु गेला निज-स्थाने। शुनि' महा-भय पाइला स्वरूपादि मने॥ 88 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु लौटकर अपने वासस्थानपर आ गये। इस घटनाको सुनकर श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके मनमें बहुत भय हुआ॥ 88 ॥ श्रीरघुनाथ भट्टगोस्वामीका वृत्तान्त; उनकी आकुमार नैष्ठिक ब्रह्मचारी अथवा बृहद्व्रती-लीला :- एथा तपनमिश्र-पुत्र रघुनाथ-भट्टाचार्य। प्रभुरे देखिते चलिला छाड़ि' सर्व कार्य॥ 89 ॥ अनुवाद—इधर श्रीतपन मिश्रके पुत्र श्रीरघुनाथ-भट्टाचार्य अपने समस्त कार्योंको छोड़कर महाप्रभुके दर्शनके लिये चल पड़े॥ 89 ॥ सेवकके साथ श्रीरघुनाथकी गौड़से होते हुए पुरीकी यात्रा :- काशी हैते चलिला तँहो गौड़-पथ दिया। सङ्गे सेवक चले ताँर झालि साजाञा॥ 90॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्ट काशीसे जगन्नाथपुरीके लिये गौड़देशसे होकर जानेवाले मार्गसे चल पड़े। उनके साथ एक सेवक उनके सामानकी झोलीको उठाकर चल रहा था॥ 90 ॥ मार्गमें पुरी जा रहे रामदास-विश्वाससे मिलन :- पथे तारे मिलिला विश्वास-रामदास। विश्वासखानार कायस्थ तेंहो राजार विश्वास॥ 91 ॥ अनुवाद—उनको मार्गमें रामदास विश्वास मिले। कायस्थ जातिके रामदास विश्वास गौड़देशके राजाके हिसाब-कार्यालयमें कार्य करते थे॥ 91 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वासखानार कायस्थ,'—गौड़ेश्वरके हिसाब (आय-व्ययका विवरण रखनेवाले) कार्यालयको 'विश्वासखाना' कहा जाता था; कायस्थ लोग ही वहाँ कार्य करते थे, क्योंकि वे राजाके विश्वासपात्र थे॥ 91 ॥ रामदास-रामानन्दी-सम्प्रदायके अन्तर्गत दीक्षित (रामायेत्) :- सर्वशास्त्रे प्रवीण, काव्यप्रकाश-अध्यापक। परमवैष्णव, रघुनाथ-उपासक॥ 92 ॥ अनुवाद—वे समस्त शास्त्रोंमें प्रवीण, काव्यप्रकाशके

342 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/92–101 ] अध्यापक, परम-वैष्णव और भगवान् श्रीरघुनाथके उपासक थे॥92॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परमवैष्णव',—जो हृदयमें 'मुमुक्षु' अर्थात् मोक्षकी कामना रखते हैं, उनकी गणना शुद्धवैष्णवोंमें नहीं होती। वास्तवमें रामके उपासक होनेपर रामदासको 'वैष्णवप्राय' कहा जा सकता है। किन्तु उन दिनों शुद्ध-वैष्णवोंकी श्रेणीमें भेद करनेमें अधिकांश लोग ही अयोग्य थे, इसलिये कायस्थकुलमें उत्पन्न रामदास भी जगत्में 'परमवैष्णव'के रूपमें विख्यात थे॥92॥ अनुभाष्य—'काव्यप्रकाश',—मन्मथभट्टके द्वारा विरचित अपने नामसे विख्यात एक विशेष अलङ्कार-ग्रन्थ॥92॥ अष्टप्रहर रामनाम जपेन रात्रिदिने। सर्व त्यजि' चलिला जगन्नाथ-दरशने॥93॥ अनुवाद—रामदास विश्वास रात-दिन आठों प्रहर रामनामका जप करते थे। वे अपना सब कुछ त्यागकर भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शनोंके लिये चल पड़े॥93॥ रामदासके द्वारा श्रीरघुनाथभट्ट प्रभुकी सेवा :- रघुनाथ-भट्टेरे सने पथेते मिलिला। भट्टेर झालि माथे करि' बहिया चलिला॥94॥ नानासेवा करि' करे पादसम्वाहन। ताते रघुनाथेर हय सङ्कुचित मन॥95॥ उन पण्डितके द्वारा की जानेवाली सेवाको ग्रहण करनेमें श्रीरघुनाथको आपत्ति :- “तुमि बड़ लोक, पण्डित, महाभागवत। सेवा ना करिह, सुखे चल मोर साथ॥” 96॥ अनुवाद—वे जब मार्गमें श्रीरघुनाथ भट्टसे मिले, तब वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोलीको अपने सिरपर ढोकर चलने लगे। वे उनकी अनेक प्रकारकी सेवाएँ करते, यहाँ तक कि वे उनके श्रीचरण भी दबाते थे। उनके द्वारा ऐसा करनेपर श्रीरघुनाथ भट्टके मनमें सङ्कोच होता था। इसलिये उन्होंने रामदास विश्वाससे कहा,—“आप बड़े व्यक्ति, विद्वान और महाभागवत हैं। आप मेरी सेवा मत कीजिये, मेरे साथ केवल सुखसे चलिये॥”94-96॥ रामदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति और वैष्णव-ब्राह्मणके दास्यमें आनन्द :- रामदास कहे,—“आमि शूद्र अधम! 'ब्राह्मणेर सेवा',—एइ मोर निज-धर्म॥97॥ सङ्कोच ना कर तुमि, आमि—तोमार 'दास'। तोमार सेवा करिले हय हृदय उल्लास॥”98॥ अनुवाद—रामदास विश्वासने कहा,—“मैं अधम शूद्र हूँ! 'ब्राह्मणोंकी सेवा'—यही मेरा निज-धर्म है। मैं आपका दास हूँ, इसलिये आप किसी प्रकारसे सङ्कोच मत कीजिये। आपकी सेवा करनेसे मेरे हृदयमें उल्लास होता है॥”97-98॥ रामदासके द्वारा निरन्तर रामनाम-जप :- एत बलि' झालि वहेन, करेन सेवने। रघुनाथेर तारकमन्त्र जपेन रात्रिदिने॥99॥ अनुवाद—यह कहकर वे श्रीरघुनाथ भट्टकी झोली वहन करके चलने लगे और उनकी अन्य सेवाएँ भी करने लगे। वे रात-दिन भगवान् श्रीरघुनाथके तारकमन्त्रका जप करते रहते॥99॥ श्रीरघुनाथका पुरीमें आगमन और महाप्रभुको प्रणाम, महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- एमते रघुनाथ आइला नीलाचले। प्रभुर चरणे याञा मिलिला कुतूहले॥100॥ दण्ड-प्रणाम करि' भट्ट पड़िला चरणे। प्रभु 'रघुनाथ' बलि' कैला आलिङ्गने॥101॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीजगन्नाथ पुरीमें आ पहुँचे। वे महाप्रभुके श्रीचरणोंमें उपस्थित होकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और उनके चरणोंमें

[ 13/100-110 तेरहवाँ अध्याय 343 दण्डवत् प्रणाम करते हुए लेट गये। महाप्रभुने—'ओह ! रघुनाथ'—कहकर उनका आलिङ्गन किया॥ 100-101 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी प्रणति-ज्ञापन, भगवान्‌के द्वारा अपने भक्तोंकी कुशलताकी जिज्ञासा :— मिश्र आर शेखरेर दण्डवत् जानाइला। महाप्रभु ताँ-सबार वार्त्ता पुछिला ॥ 102 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेकी आज्ञा और अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण :— “भाल हइल आइला, देख 'कमललोचन'। आजि आमार एथा करिबा प्रसाद भोजन॥” 103 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरकी ओरसे महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुने उनका समाचार पूछा और कहा,—“अच्छा हुआ कि तुम यहाँपर आये। अब तुम कमलनयन भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करो। आज तुम मेरे यहाँपर ही प्रसादका सेवन करना॥” 102-103 ॥ अनुभाष्य—'मिश्र आर शेखरेर',—तपनमिश्र और चन्द्रशेखरका ॥ 102 ॥ वासस्थान-प्रदान और श्रीस्वरूपादि भक्तोंके साथ मिलन :— गोविन्देरे कहि' एक वासा देओयाइला। स्वरूपादि भक्तगण-सने मिलाइला ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दको कहकर श्रीरघुनाथ भट्टके रहनेकी व्यवस्था करवा दी और उनको श्रीस्वरूप दामोदर आदि भक्तोंसे भी मिलवाया॥ 104 ॥ आठ मास तक महाप्रभुके साथमें रहना और महाप्रभुकी स्नेहरूपी कृपाकी प्राप्ति :— एइमत प्रभु-सङ्गे रहिला अष्टमास। दिने दिने प्रभुर कृपा बाड़ये उल्लास ॥ 105 ॥ श्रीरघुनाथका अपने वासस्थानपर महाप्रभुको निमन्त्रण :— मध्ये मध्ये महाप्रभुर करेन निमन्त्रण। घर-भात करेन, आर विविध व्यञ्जन ॥ 106 ॥ अमृतको भी निन्दित करनेवाले नैवेद्य बनानेकी विद्यामें पारदर्शी श्रीरघुनाथ :— रघुनाथ भट्ट—पाके अति सुनिपुण। येइ रान्धे, सेइ हय अमृतेर सम ॥ 107 ॥ भट्ट गोस्वामीको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :— परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन। प्रभुर अवशिष्ट पात्र भट्टेर भक्षण ॥ 108 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीरघुनाथ भट्ट आठ मास तक महाप्रभुके सङ्गमें रहे। दिन-प्रतिदिन महाप्रभुकी कृपाको प्राप्त करनेके कारण उनका उल्लास वर्धित होता गया। वे बीच-बीचमें महाप्रभुको निमन्त्रण करते और वे स्वयं ही घरपर चावल तथा विविध व्यञ्जन बनाते। वे पाककलामें अति सुनिपुण थे। वे जो कुछ भी पकाते थे, वही अमृतके समान बनता था। महाप्रभु उनके द्वारा बनाये गये भोजनको बहुत सन्तुष्ट होकर ग्रहण करते थे। महाप्रभुका उच्छिष्ट ही उनका भोजन होता था॥ 105-108 ॥ रामदासके साथ साक्षात्कार होनेपर भी अन्तर्यामी महाप्रभुकी उसके प्रति उदासीनता :— रामदास यदि प्रथम प्रभुरे मिलिला। महाप्रभु अधिक ताँरे कृपा ना करिला ॥ 109 ॥ अनुवाद—जब रामदास विश्वास महाप्रभुसे पहली बार मिले, तब महाप्रभुने उनपर अधिक कृपा नहीं की॥ 109 ॥ उदासीनताका कारण :— अन्तरे मुमुक्षु तैं हो, विद्या-गर्ववान्। सर्वचित्त-ज्ञाता प्रभु—सर्वज्ञ भगवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद—रामदास विश्वासके हृदयमें मुक्तिकी कामना

थी और उन्हें अपनी विद्याका अभिमान भी था। सर्वज्ञ भगवान् महाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जानते थे॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्ति-वाञ्छा और विद्या-गर्व-इन दो दोषोंने रामदासको 'शुद्धवैष्णव' बनने नहीं दिया॥110॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य समाप्त। रामदासके द्वारा काव्य-शास्त्र-अध्यापन :- रामदास कैला तबे नीलाचले वास। पट्टनायक-गोष्ठीके पड़ाय 'काव्यप्रकाश' ॥111॥ अनुवाद-तब रामदास विश्वास जगन्नाथ पुरीमें ही वास करने लगे। वे वहाँ पट्टनायक-परिवारको (श्रीभवानन्द रायकी सन्तानोंको) 'काव्य-प्रकाश' पढ़ाते थे॥111॥ अनुभाष्य- 'पट्टनायक-गोष्ठीके', -भवानन्दकी सन्तानोंको ॥ 111॥ श्रीरघुनाथको उपलक्ष्य करके महाप्रभुके द्वारा संसारमें प्रवेश करनेमें अनिच्छुक और अप्रविष्ट साधकोंको उनके अपने स्थानपर रहकर स्त्रीसङ्गके द्वारा इन्द्रियसुखकी स्पृहापर आधारित अत्याहार, प्रयास अथवा लौल्यादिका निषेध :- अष्टमास रहि' प्रभु भट्टे विदाय दिला। “विवाह ना करिह” बलि' निषेध करिला ॥ 112 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ पुरीमें आठ मास रहनेके बाद श्रीरघुनाथ भट्टको महाप्रभुने विदायी दी और “विवाह मत करना”-उन्हें ऐसा कहकर निषेध किया॥112॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुने रघुनाथभट्टको संसारमें प्रवेश करनेसे पूर्व ही कृष्ण-परायण होते देखकर उन्हें 'अत्याहार'रूप विवाह करके भोगोंके स्थान मायामय संसारमें प्रवेश करनेसे निषेध किया। विषयी पत्नी-परायण सांसारिक लोग गृहव्रत-धर्मको अपनाकर भोक्ता पुरुषाभिमान और भोगबुद्धिके वशीभूत होकर अधिकांश कृष्णसेवाविमुख हो जाते हैं, इसलिये उनकी हरिभक्तिकी सम्भावना बहुत कम होती है॥ 112 ॥ काशीमें जाकर वैष्णवोंकी सेवा करनेका आदेश एवं अनर्थमुक्त श्रीकृष्णसुखतत्पर भागवतसे ही श्रीकृष्णकी सेवाके लिये चिन्मय-भागवत अध्ययन करनेका आदेश :- “वृद्ध माता-पितार याइ' करह सेवन। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन ॥ 113 ॥ पुरीमें एकबार आनेका आदेश; कण्ठमाला-प्रसाद देना :- पुनरपि एकबार आसिह नीलाचले।” एत बलि' कण्ठमाला दिला ताँर गले ॥ 114 ॥ अनुवाद- “तुम काशी जाकर अपने वृद्ध [वैष्णव] माता-पिताकी सेवा करना और किसी वैष्णवसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन करना तथा तुम एकबार पुनः नीलाचलमें आना।” ऐसा कहकर महाप्रभुने अपने गलेकी माला उतारकर उनके गलेमें डाल दी॥113-114॥ अनुभाष्य-इस स्थानपर जगद्गुरु लोकशिक्षक आचार्य श्रीरघुनाथ भट्टको उपलक्ष्य करके साधकको एकान्तिक परमगौरभक्त वैष्णव पिता-माताको अपनी हरिसेवाके अनुकूलरूपमें सेवा करनेके लिये ही आदेश दिया है; कृष्णभजनके इच्छुक साधकमात्रको ही हरि-गुरु-वैष्णव- विमुख पिता-माताकी सेवा करनेका आदेश नहीं दिया। इस प्रसङ्गमें निम्नलिखित दो श्लोक विचारणीय हैं, (भाः 5/5/18)- “गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। दैवं न तत् स्यात् न पतिश्च स स्यात् न मोचयेद् यः समुपेतमृत्युम्॥” [अर्थात् “भगवद्-सम्बन्धज्ञानके उपदेशके द्वारा जो सामने उपस्थित मृत्युरूपी संसारसे उद्धार नहीं करवा पाते, वे-‘गुरु’ नहीं हैं, वे-‘स्वजन’ नहीं हैं, वे-‘पिता’ नहीं हैं, वे-‘माता’ नहीं हैं, वे-‘देवता’ नहीं हैं, वे-‘पति’ नहीं हैं।”] और (भःरःसिः पूःविः 2/200)- “लौकिकी वैदिकी वापि या क्रिया क्रियते मुने। हरिसेवानुकूलैव सा कार्या भक्तिमिच्छता॥”

[ 13/113-123 तेरहवाँ अध्याय 345 [अर्थात् “हे मुने! जगत्में लौकिकी अथवा वैदिकी जो समस्त क्रियाएँ की जाती हैं, भक्तिको प्राप्त करनेके इच्छुक व्यक्ति उन समस्त क्रियाओंका हरिसेवाके अनुकूलरूपमें ही अनुष्ठान करेंगे।”] व्याकरणके ज्ञाता अवैष्णवसे भागवतको पढ़नेपर जड़ीय काव्यग्रन्थका ही पाठ-श्रवण होता है; क्योंकि ऐसे समस्त पाठक स्वयं ही भागवतके तात्पर्यको समझनेमें समर्थ नहीं होनेके कारण संसार भोग करते हैं, तो वे अन्योंको किस प्रकार अनर्थोंसे मुक्त करानेमें समर्थ होंगे? महाभागवत वैष्णवगण-गृह-बन्धनसे मुक्त होते हैं, इसलिये वे स्वयं ही 'भागवत' होनेके कारण भागवतके वास्तविक अर्थको जाननेवाले और भक्तिके प्रभावसे संसारसे मुक्त हैं॥ 113 ॥ श्रीभट्टको विदायी देना, महाप्रभुके विरहमें श्रीभट्टका क्रन्दन :- आलिङ्गन करि' प्रभु विदाय ताँरे दिला। प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला॥ 115 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन करके उन्हें विदायी दी। श्रीरघुनाथ भट्ट भावी विरहके कारण प्रेमके अभिभूत होकर रोने लगे॥ 115 ॥ भक्तोंसे आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथका काशीमें आगमन :- स्वरूप-आदि भक्त-ठाञि आज्ञा मागिया। वाराणसी आइला भट्ट प्रभुर आज्ञा पाञा॥ 116॥ काशीमें वैष्णव पण्डितसे भागवतका अध्ययन :- चारिवत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैला। वैष्णव-पण्डित-ठाञि भागवत पड़िला॥ 117॥ पिता-माताकी धाम-प्राप्तिके बाद विरक्त होकर पुनः महाप्रभुके निकट पुरीमें आगमन :- पिता-माता काशी पाइले उदासीन हञा। पुनः प्रभुर ठाञि आइला गृहादि छाड़िया॥ 118॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्टने श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंसे भी वाराणसी (काशी) जानेकी अनुमति माँगी। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीरघुनाथ भट्ट वाराणसी आ गये। उन्होंने चार वर्षोँ तक अपने घरमें रहकर माता-पिताकी सेवा की और एक वैष्णव पण्डितसे श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया। अपने माता-पिताके काशीमें देह-त्यागनेके पश्चात् वे विरक्त होकर पुनः अपना घर त्यागकर महाप्रभुके पास श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये॥ 116-118॥ पहलेकी भाँति श्रीरघुनाथका आठ मास तक रहनेके बाद महाप्रभुके द्वारा व्रजमें श्रीरूप-सनातनका सङ्गी बननेका आदेश :- पूर्ववत् अष्टमास प्रभु-पाश छिला। अष्टमास रहि' पुनः प्रभु आज्ञा दिला॥ 119॥ “आमार आज्ञाय, रघुनाथ, याह वृन्दावने। ताँहा याञा रह रूप-सनातन-स्थाने॥ 120॥ वृन्दावनमें नित्यकृत्य कर्त्तव्यका उपदेश :- भागवत पड़, सदा लह कृष्णनाम। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण-भगवान्॥”121॥ अनुवाद-वे पहलेकी भाँति महाप्रभुके पास आठ मास तक रहे। आठ मास रहनेके पश्चात् महाप्रभुने पुनः श्रीरघुनाथ भट्टको आज्ञा दी,-“हे रघुनाथ! तुम वृन्दावन जाओ। वहाँ जाकर तुम रूप-सनातनके सान्निध्यमें रहना। तुम भागवत पढ़ना और सदैव कृष्णनामका जप-कीर्तन करना, भगवान् श्रीकृष्ण शीघ्र ही तुमपर कृपा करेंगे॥”119-121॥ महाप्रभुका कृपालिङ्गन; श्रीरघुनाथकी कृष्णप्रेम-मत्तता :- एत बलि' प्रभु ताँरे आलिङ्गन कैला। प्रभुर कृपाते कृष्णप्रेमे मत्त हैला॥ 122॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको आलिङ्गन किया। महाप्रभुकी कृपासे वे कृष्णप्रेममें मत्त हो गये॥ 122॥ जपके लिये तुलसी-माला आदि प्रदान :- चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर माला। छुटा-पान-बिड़ा महोत्सवे पाञाछिला॥ 123॥

346 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/123-131 ] अनुवाद-महाप्रभुको भगवान् श्रीजगन्नाथकी चौदह हाथ लम्बी तुलसीकी माला और मसाला-रहित विशेष पानका बीड़ा महोत्सवमें मिला था॥123॥ अनुभाष्य-‘छुटा-पान-बिड़ा,’-मसाला आदि सामग्रीसे रहित अन्य प्रकारका ताम्बुल (पान)॥123॥ श्रीरघुनाथके द्वारा प्रतिदिन मालाकी सेवा :- सेइ माला, छुटा-पान प्रभु ताँरे दिला। 'इष्टदेव' करि' माला धरिया राखिला॥ 124 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीरघुनाथ भट्टको वह माला और पानका बीड़ा प्रदान किया और श्रीरघुनाथ भट्टने उस तुलसी-मालाको अपना 'इष्टदेव' मानकर रख लिया॥ 124 ॥ वृन्दावनमें आकर श्रीरूप-सनातनके साथमें रहना :- प्रभुर ठाञि आज्ञा लञा गेला वृन्दावने। आश्रय करिला आसि' रूप-सनातने ॥ 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुसे अनुमति लेकर श्रीरघुनाथ भट्ट वृन्दावन चले गये। उन्होंने वृन्दावन पहुँचकर श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामीका आश्रय ग्रहण किया॥ 125 ॥ श्रीरूपप्रभुके निकट रूपानुगवर श्रीरघुनाथके द्वारा भागवत-पाठ :- रूप-गोसाञिर सभाय करेन भागवत-पठन। भागवत पड़िते प्रेमे आउलाय ताँर मन ॥ 126 ॥ श्रीरघुनाथमें अष्टसात्त्विक भाव :- अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते। नेत्र रोध करे वाष्प, ना पारेन पड़िते ॥ 127 ॥ अनुवाद-श्रीरघुनाथ भट्ट श्रीरूप गोस्वामीके सान्निध्यमें श्रीमद्भागवतका पाठ करने लगे। श्रीमद्भागवतको पढ़ते समय उनका मन प्रेममें व्याकुल हो जाता। भागवतका पाठ करते समय महाप्रभुकी कृपासे उनके नेत्रोंसे अश्रुओँकी धारा, शरीरमें कम्पन और कण्ठ गद्गद हो जाता। नेत्रोंमें अश्रु भर जानेके कारण दिखना बन्द होनेपर वे श्रीमद्भागवतको पढ़ नहीं पाते थे॥ 126-127 ॥ अनुभाष्य- 'आउलाय,'-अलग्न, शिथिल, आकुल, अस्थिर, उन्मत्त होना ॥ 126 ॥ अतीव मधुर कण्ठवाले श्रीभट्टगोस्वामी :- पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागेर विभाग। एकश्लोक पड़िते फिराय तिन-चारि राग ॥ 128 ॥ श्रीकृष्ण-स्मरणमें आत्मविस्मृत श्रीरघुनाथ :- कृष्णेर सौन्दर्य-माधुर्य यबे पड़े, शुने। प्रेमेते विह्वल तबे, किछुइ ना जाने ॥ 129 ॥ अनुवाद-कोयलके स्वरकी भाँति उनका मधुर कण्ठ था, उसपर भी वे अनेक प्रकारके रागोंमें अलाप करते थे। वे श्रीमद्भागवतके एक-एक श्लोकको तीन-चार प्रकारके रागोंमें पढ़ते थे। वे जब भी श्रीकृष्णके सौन्दर्य और माधुर्यके विषयमें पढ़ते अथवा सुनते, वे प्रेममें भाव-विभोर हो जाते, उन्हें अन्य किसी वस्तुका ज्ञान ही नहीं रहता ॥ 128-129 ॥ एकमात्र श्रीगोविन्दमें समर्पित प्राण श्रीरघुनाथ :- गोविन्द-चरणे कैला आत्मसमर्पण। गोविन्द-चरणारविन्द-याँर प्राणधन ॥ 130 ॥ अपने शिष्यके द्वारा श्रीगोविन्द-मन्दिर और विग्रहके आभूषणादिका निर्माण :- निज शिष्ये कहि' गोविन्देर मन्दिर कराइला। वंशी, मकर, कुण्डलादि 'भूषण' करि' दिला ॥ 131 ॥ अनुवाद-उन्होंने भगवान् श्रीगोविन्ददेवके श्रीचरणकमलोंमें आत्मसमर्पण कर दिया था। भगवान् श्रीगोविन्ददेवके चरणकमल ही उनके प्राणधन थे। उन्होंने अपने शिष्यसे कहकर भगवान् श्रीगोविन्ददेवका मन्दिर बनवाया। उन्होंने श्रीगोविन्ददेवके लिये वंशी,

[ 13/130-137 तेरहवाँ अध्याय 347

मकरके आकारके कुण्डलादि आभूषण बनवाकर दिये॥ 130-131॥

महाभागवत श्रेष्ठ विरक्तकुलचुड़ामणि श्रीरघुनाथभट्ट गोस्वामी :- ग्राम्यवार्त्ता ना शुने, ना कहे जिह्वाय। कृष्णकथा-पूजादिते अष्टप्रहर याय॥ 132॥

श्रीरघुनाथकी अन्योंकी निन्दादि-शून्यता, सर्वत्र कृष्णभक्त दर्शन और अनुभूति :- वैष्णवेर निन्द्य-कर्म नाहि पाड़े काणे। सबे कृष्ण भजन करे, - एइमात्र जाने॥ 133॥

अनुवाद-वे सांसारिक बातोंको न तो सुनते थे और न ही अपनी जिह्वासे वैसी बात कहते थे। भगवान् श्रीकृष्णकी कथा-पूजा आदिमें ही उनके आठों प्रहर व्यतीत हो जाते। वे कभी भी अपने कानोंसे किसी वैष्णवकी निन्दाको नहीं सुनते थे। वे केवल इतना जानते थे कि सभी श्रीकृष्णका भजन कर रहे हैं॥ 132-133॥

अनुभाष्य- 'वैष्णवेर निन्द्य-कर्म', -जिस अनुष्ठानके द्वारा वैष्णवताकी हानि होती है अर्थात् कृष्णभजनविमुखता और स्त्री-सङ्ग-ये वैष्णवोंके लिये दो प्रकारके दूषणीय विषय हैं। ये दो विषय वैष्णवताके विरुद्ध हैं। वैष्णव-आचार्योंका कर्त्तव्य है कि वे उपदेश देकर अपने आश्रित हरिभजनके उन्मुख वैष्णवों अथवा कृपापात्रोंकी रक्षाका प्रयास करें जिससे ये दो दुराचार उन्हें भजनसे विमुख नहीं करवा सकें। रघुनाथ भट्टका मध्यमाधिकारी भागवतकी भाँति किसी भी अश्रद्धालुके निन्दनीय चरित्रको शोधित करनेका प्रयास नहीं था। वे जानते थे कि सभी कृष्णभजन करते हैं अर्थात्- “केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास। ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश॥” (आदिलीला 6/83) [“कोई माने अथवा ना माने, सब उनके दास हैं। जो यह नहीं मानता है, इस पापके (अपराधके) कारण उसका नाश हो जाता है।”]॥ 133 ॥

श्रीरघुनाथकी कृष्णस्मरणकी प्रक्रिया :- महाप्रभुर दत्त माला मननेर काले। प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि' लेन गले॥ 134॥

अनुवाद-वे श्रीकृष्णके स्मरणके समय महाप्रभुके द्वारा दी गयी मालाको श्रीजगन्नाथजीके प्रसादी चन्दन आदिके साथ बाँधकर गलेमें धारण कर लेते थे॥ 134॥

अनुभाष्य- 'मननेर काले',-स्मरणके समयमें॥ 134॥

तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।

श्रीरघुनाथका निरन्तर कृष्णप्रेम :- महाप्रभुर कृपाय कृष्णप्रेम अनर्गल। एइ त' कहिलुँ ताते चैतन्य-कृपाफल॥ 135॥

अनुवाद-इस प्रकार मैंने श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीके प्रति श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपाके फलके विषयमें वर्णन किया है जिसके द्वारा श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीमें निरन्तर कृष्णप्रेम उमड़ता था॥ 135 ॥

इस अध्यायमें वर्णित विषयोंकी संक्षेपमें पुनरुक्ति :- जगदानन्देर कहिलुँ वृन्दावन-गमन। तार मध्ये देवदासीर गान-श्रवण॥ 136 ॥

महाप्रभुर रघुनाथे कृपा-महाफल। एक परिच्छेदे तिन कथा कहिलुँ सकल॥ 137॥

अनुवाद-मैंने इस अध्यायमें श्रीजगदानन्द पण्डितके वृन्दावन जानेके विषयमें, बीचमें महाप्रभुके द्वारा एक देवदासीके गानको श्रवण करनेके प्रसङ्ग और श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीपर महाप्रभुकी कृपाके महाफलका वर्णन किया। इस प्रकार मैंने इस एक अध्यायमें तीन प्रसङ्गोंका वर्णन किया है॥ 136-137॥