भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2347

330 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41 ] सूखा वनका शाक, इमलीके पत्तेकी चटनी अथवा लाफरा ही खाते हैं। “गौराङ्गेर तरे, प्राण दिते याइ, ना हय मरण तबु।” मरिब बलिया, पड़िया समुद्रे, खाइ मात्र हाबुडुबु॥” गौरचन्द्रके लिये मैं प्राण देना चाहता हूँ। कैसे उनको सुखी बनाऊँ? किन्तु हो नहीं पाता। कभी कभी सोचता हूँ कि प्राण त्याग दूँ और जाकर समुद्रमें कूद जाता हूँ। नाक और मुखमें पानी भर जाता है, परन्तु उसी समय उनके चन्द्रमुखका स्मरण हो आता है और उसे देखे बिना रहा नहीं जाता। “से चन्द्रवदन, देखिबार लोभे, शीघ्र उठि सिन्धुतटे, पुनः नाहि देखि, प्राण उड़ि' याय, चलि पुनः टोटावाटे॥” इसलिये शीघ्रतासे पानीसे निकलकर उनके मुखचन्द्रका दर्शन करनेके लोभसे महाप्रभुके निकट आता हूँ, किन्तु निकट जाते ही मन पुनः खिन्न हो जाता है और वहींसे लौट आता हूँ। यदि महाप्रभु कहें कि समुद्रमें डूबकर मरनेके लिये गये थे, तो मरे क्यों नहीं? मर जाते। तो मैं कैसे कहता कि आपके दर्शनके लिये नहीं मरा। प्रेममें ऐसी बात नहीं कही जाती। समुद्रसे निकलकर दर्शन करनेके लिये गम्भीराके पास पहुँचकर सोचा कि अब कैसे मिलने जाऊँ? इसलिये पुनः लौटकर अपने स्थानपर चला आया। परन्तु उनके मुखचन्द्रका दर्शन नहीं पानेसे प्राण निकलनेको तत्पर होते हैं। पुनः आइटोटामें गदाधर पण्डितजीके पासमें चला आया। गोपीनाथाङ्गाने, देखि' गोरामुख, पड़ि अचेतन हञा। पण्डित गाँसाञि, मोरे लञा राखे, देखि पुनः संज्ञा पाञा॥ वहाँ महाप्रभु गदाधर पण्डितसे बातचीत कर रहे थे। मैंने दूरसे महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा और देखते ही अचेतन हो गया। गदाधर पण्डित मुझे देखकर शीघ्रतासे उठकर मेरे पास आये। मैं तो प्रेममें अचेतन पड़ा था। समुद्रसे तो पीड़ा लेकर आया और यहाँ जब महाप्रभुका मुखचन्द्र देखा तो इतना आनन्द हुआ कि उसे सह नहीं सका और प्रेममें मूर्च्छित हो गया। गदाधर पण्डितने पानीका छींटा देकर पंखा झलकर किसी प्रकारसे मुझे चेतन किया। गौर-गदाधर, बसिया दु'जने, बलेन आमार कथा। अमनि काँदिया, याइ गड़ागड़ि, ना विचारि यथा तथा। गौर और गदाधर, ये दोनों बैठकर मेरे विषयमें ही वार्तालाप कर रहे थे। गदाधर कह रहे थे,-'आप इनकी बात क्यों नहीं मान लेते? थोड़ी-सी सेवा ग्रहण कर लेंगे तो क्या दोष हो जायेगा?' महाप्रभुने कहा,- 'यह मुझे विषय भोग करवाना चाहता है। मैं कैसे इसकी बात मान लूँ? यह गद्दा, तकिया बनाकर लाता है, सुगन्धित तेल लेकर आता और मालपुआ, खीर, रबड़ी आदि अनेक प्रकारके मिष्ठान्न बनाकर लाता है। मैं संन्यासी होकर इन्हें कैसे ग्रहण करूँगा? यह तुम्हारे समान सेवा क्यों नहीं करता है? मैं जैसे कहता हूँ, तुम ठीक वैसा ही करते हो। तो यह क्यों नहीं वैसा करता है?' गदाधर कहने लगे,- 'इनकी कुछ बात मान लेनेमें क्या दोष है?' उनकी बातोंको सुनकर, अपने प्रति महाप्रभु और गदाधर पण्डितके स्नेहको जानकर मैं फफक-फफक कर रोने लगा। मैं कुछ विचार नहीं कर सका और प्रेममें रोते हुए भूमिपर लोटने लगा। क्षणके विरह, सहिते ना पारि, गौर मोर हृदे नाचे! मरिते ना देय, बाँचिले कोन्दल, किसे मोर प्राण बाँचे ॥ मेरे लिये बड़ी भारी समस्या है, मैं महाप्रभुका विरह