श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 13/41 ] तेरहवाँ अध्याय 329
हाय! क्यों ऐसे भाव मेरे हृदयमें आये कि वृन्दावन जाऊँ? अब तो मैं मर रहा हूँ। क्यों मैंने महाप्रभुसे आदेश लिया कि मैं वृन्दावन जाऊँ? अब मैं जा नहीं पा रहा हूँ, मेरे पाँव नहीं चलते हैं, मन जाना नहीं चाह रहा है। मैंने उनसे यह आदेश क्यों माँगा? अब तो उन्होंने आदेश दे दिया और मैं चला आया, किन्तु उन्हें न देखनेसे मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं, मैं इन्हें रोक नहीं सकता। समझ नहीं पा रहा हूँ कि वृन्दावन जाऊँ अथवा नहीं? क्या करूँ? और यदि यहींसे लौट जाऊँ, तो महाप्रभु व्यङ्ग करेंगे कि क्या वृन्दावनके दर्शन कर आये हो? ओ राङ्गा चरण, मम प्राण-धन, समुद्रबालिते राखि'। कि देखिते आईनु, निज माथा खाइनु, उड़ु उड़ु प्राणपाखी ॥ 'ओ रक्तिम (लाल) चरण!' उनके चरण प्रेमकी पुतली हैं। वे लाल-लाल चरण मेरे प्राण-धन हैं। नीलाचलमें समुद्र तटकी बालूमें अङ्कित उन चरणोंको छोड़कर मैं यहाँ क्या देखने आया हूँ? मैं केवल अपना सिर खा रहा हूँ। अब मेरे प्राण छटपट कर रहे हैं, उनके विरहमें मैं जीवित नहीं रह सकता। यत चलि' याइ, मन नाहि चले, तबु याइ जेद करि'। प्रेमेर विवर्त, आमारे नाचाय, ना बुझिया आमि मरि ॥” मेरी जानेकी इच्छा नहीं है। मेरे पैर नहीं चलते और मन भी नहीं चलता। यद्यपि मन तो महाप्रभुके पास लौटकर जाना चाहता है, तथापि मैं हठ करके वृन्दावनकी ओर जा रहा हूँ। प्रेमका विवर्त मुझे नचा रहा है, मेरे हृदयको नचा रहा है। मन प्रबोध नहीं मानता और मैं मर रहा हूँ।” श्रीजगदानन्द वहीं नीलाचलमें पेड़के नीचे बैठकर यह सब सोच रहे हैं। वे जितना ही महाप्रभुको छोड़कर जाना चाहते हैं, उतनी ही महाप्रभुकी लीलाएँ, उनका प्रेमकलह सभी कुछ उनको स्मरण आता है और वे आगे नहीं बढ़ पाते। “गौराङ्गेर रङ्ग, बुझिते नारिनु, पड़िनु दुःख-सागरे। आमि चाइ याहा, नाहि पाइ ताहा, मन ये केमन करे।” वहीं बैठे मनमें विचार कर रहे हैं, – “महाप्रभुके आचरणको मैं समझ नहीं पाता, मैं दुःखके सागरमें पड़ा हुआ हूँ। गौरचन्द्रके प्रेमको मैं समझ नहीं पाता हूँ। उनके सिरमें दर्द होता है और उससे उन्हें बहुत कष्ट होता है। उसका निवारण करनेके लिये मैं उनके लिये तेल लेकर आया, किन्तु उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। थोड़ासा तेल लगानेमें क्या दोष है? मैंने देखा कि उनका शरीर अति क्षीण हो रहा है। वे भूमिपर केवल चटाईके ऊपर सोते हैं और उनकी हड्डियोंमें चुभन होती है। मुझसे यह सहन नहीं होता, इसलिये मैंने थोड़ी-सी रुई लाकर उनके लिये एक गद्दा बनाया, तो उन्होंने उसे भी ग्रहण नहीं किया। अपितु मुझे प्रताड़ित करते हुए कहने लगे, – 'मैं तुम्हारे रुईके गद्देपर लेट जाता हूँ और तेल लगानेके लिये एक अङ्ग-मर्दन करनेवाला भी ले आओ, बादमें स्त्रियाँ भी मेरी सेवा करेंगी। इस प्रकार मेरे संन्यासकी बहुत प्रशंसा होगी।' मैं कभी-कभी वनके शाक, इमलीके पत्तोंकी चटनी आदि बनाता हूँ, उसे वे बहुत प्रेमसे खाते हैं। यदि मैं नहीं रहूँगा, तो कौन बनायेगा? उनके कार्य-कलाप मैं नहीं समझ पाता हूँ। छोटा हरिदासने थोड़ासा चावल किसी वैष्णवीसे माँग लिया तो उसका जीवन भरके लिये त्याग कर दिया। यह उनका कैसा विचार है? इन सब विचारोंको मैं नहीं समझ पाता। मैं महाप्रभुको सुख प्रदान करनेके लिये उनकी सेवा करता हूँ, परन्तु वे उसे ग्रहण नहीं करते। मैं अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ और अच्छे-अच्छे पकवान भी बनाकर उन्हें परोसता हूँ, किन्तु वे तो बिना तेलके