श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 13/41 तेरहवाँ अध्याय 331 तनिक भी नहीं सह सकता, उनके बिना नहीं रह सकता। सब समय वे मेरे हृदयमें नाच रहे हैं, सब समय उनकी लीलाओंका स्मरण हो रहा है, उनके प्रेमका स्मरण हो रहा है। मैं मर भी नहीं सकता और जीवित रहनेपर प्रेम कलह, कैसे मैं अपने प्राण धारण करूँ? हेन अवस्थाय, गौरपद छाड़ि, मोर वृन्दावने आसा, ए बुद्धि हइल, केन नाहि जानि, इह-परलोक-नाशा॥ यह मेरी बुद्धि कैसे हुई कि महाप्रभुके प्रेममय चरणोंको छोड़कर मैं वृन्दावन जाऊँ? इससे तो मेरे इहलोक और परलोक, दोनों ही नष्ट हो जायेंगे। आज्ञा लइनु याइते, आज्ञा ना पालिले, ता'ते हय अपराध। गोराचाँदमुख, ना देखिया मरि, सब दिके मोर बाध॥ अब आज्ञा तो ले ली और यदि ना जाऊँ तो अपराध होगा। यह बड़ी भीषण समस्या हो गयी, अब मैं क्या करूँ? यदि महाप्रभुके आदेशका पालन नहीं करूँ तो अपराध होता है। और उनके आदेशका पालन करनेके लिये जाऊँ, तो मैं प्राण नहीं धारण कर पाऊँगा। अब मैं क्या करूँ? सभी ओर अब केवल विपत्ति ही विपत्ति है। गोराप्रेम या'र, सङ्कट ताहार, प्राण लञा टानाटानि। गदाधरगणे, एइ त' दुर्दशा, सबे करे काणाकाणि॥ जिसको श्रीकृष्ण या महाप्रभुसे ऐसा प्रेम हो गया है, उसके लिये सब समय सङ्कट ही सङ्कट है। प्राण लेकर ही खींचातानी है। सीताजीका रामचन्द्रजीसे प्रेम देखो। कैसा प्रेम है? जीवनमें जिसको हम सुख कहते हैं, वह सुख उन्हें कभी नहीं मिला। विवाहके बादसे ही केवल दुःख ही दुःख—वनवास, रावणके द्वारा हरण। कुछ समयके लिये अल्प सुख मिला, किन्तु पुनः रामचन्द्रने सदाके लिये उनको छोड़ दिया। राधाजीने कृष्णसे प्रेम किया, किन्तु अब विरहमें मर रही हैं। मिलनमें भी क्षणिक आनन्द होता है, किन्तु भावी विरहकी सम्भावनासे दुःखी हो जाती हैं और फिर जहाँ विरह अनुभव हुआ तो वे सब कुछ भूल जाती हैं। वे अनुभव करने लगती हैं कि आज तक कभी कृष्ण मुझसे नहीं मिले, मैंने कभी उनको देखा ही नहीं और विरहमें तड़पने लगती हैं। गोपियाँ कृष्णके विरहमें इतनी दुःखी हैं। उनकी विरह दशा देखकर उद्धवजी भी अत्यन्त विचलित हो गये और वृन्दावनमें रहनेकी अभिलाषा लेकर भी नहीं रह सके, पुनः मथुरा लौट गये। साधारण लोग इस विरह दशाको नहीं समझ पाते। जो गदाधरके गण हैं, वे ही समझ सकते हैं। जो गदाधरके गण नहीं हैं, वे आपसमें कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि गदाधरके गणोंकी ऐसी ही दुर्दशा होती है। भाइरे वृन्दावने याओया आर ह'लो ना! गोरामुख ना देखिया, गोरारूप धेयाइया, पथ भूलि' याइ अन्य देश। येखान हइते फिरि' पुनः याइ धीरे धीरे, पुनः आसि देखि से प्रदेश॥ वृन्दावन जा रहा था, गौरचन्द्रका दर्शन नहीं करके इतना तीव्र विरह हुआ कि उनका ही चिन्तन करने लगा और इसी चिन्तनमें मार्ग भूल गया। वृन्दावन जानेका सङ्कल्प किया था, किन्तु पैर किधर जा रहे हैं, यह पता नहीं। महाप्रभुका चिन्तन करते-करते अपनेमें खो गया। बहुत दूर आनेपर किसीसे वृन्दावन जानेका मार्ग पूछा, तो पता चला कि वह तो बहुत पीछे छूट गया। मैं वहाँसे लौटा, किन्तु पुनः महाप्रभुकी लीलाके स्मरणमें खो गया। एइरूपे कतदिने, याब आमि वृन्दावने, ना जानि कि हबे दशा मोर। वृक्षतले बसि' बसि' काटि आमि अहर्निशि, कभु मोर निद्रा आसे घोर॥'