भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2341, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2341

324 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/5-13 ] महाप्रभुका कठोर वैराग्य :- कलार शरलाते शयन, अति क्षीण काय। शरलाते हाड़ लागे, व्यथा हय गाय॥ 5 ॥ अनुवाद—महाप्रभु भूमिपर केलेके तनेकी छालके ऊपर सोते थे, इसलिये उनकी शय्या बहुत कठोर थी। उनकी देहके अत्यन्त क्षीण होनेके कारण उनकी हड्डियाँ उस छालपर लगती थी, जिसके फलस्वरूप उनके शरीरमें पीड़ा होती थी॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कलार शरलाते',—केलेके तनेकी छालपर॥ 5 ॥ इसे देखकर महाप्रभुके सुखमें तत्पर भक्तोंको कष्ट; श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके सुख विधानकी चेष्टा :- देखि' सब भक्तगण महादुःख पाय। सहिते नारे जगदानन्द, सृजिला उपाय॥ 6 ॥ महाप्रभुके लिये गेरुए रङ्गके कपड़ेसे गद्दा और तकिया प्रस्तुत :- सूक्ष्म वस्त्र आनि' गेरि दिया राङ्गाइला। शिमुलीर तुला दिया ताहा पूराइला॥ 7 ॥ महाप्रभुके व्यवहारमें लानेके लिये श्रीगोविन्दसे अनुरोध :- एक तुलि-बालिश गोविन्देर हाते दिला। 'प्रभुरे शोयाइह इहाय'—ताहारे कहिला॥ 8 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको पीड़ामें देखकर सभी भक्त अत्यन्त दुःखी होते। श्रीजगदानन्द पण्डित इस बातको सहन नहीं कर पाये, इसलिये उन्होंने एक उपाय निकाला। उन्होंने एक महीन वस्त्र लाकर उसे गेरुए रङ्गमें रङ्ग दिया और फिर उसे सेमलकी रुईसे भर दिया। उन्होंने एक तुलाई और एक तकिया श्रीगोविन्दके हाथमें दिया और कहा,—“आप महाप्रभुको इसपर ही सुलाना॥” 6-8 ॥ अनुभाष्य—'तुलि',—रुईका गद्दा॥ 8 ॥ श्रीस्वरूपसे भी अनुरोध :- स्वरूप-गोसाञिके कहे जगदानन्द। “आजि आपने याञा प्रभुरे कराइह शयन॥” 9 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे भी कहा,—“आज आप स्वयं जाकर महाप्रभुको शयन कराना॥” 9 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दके द्वारा गद्दे और तकियेके द्वारा शय्याकी रचना, उसे देखकर महाप्रभुका क्रोध :- शयनेर काले स्वरूप ताँहाइ रहिला। तुलि-बालिश देखि' प्रभु क्रोधाविष्ट हइला॥ 10 ॥ महाप्रभुके द्वारा उसे बनानेवालेके नामके विषयमें पूछना; श्रीजगदानन्दका नाम श्रवण करके महाप्रभुका भय :- गोविन्देरे पुछेन,—“इहा कराइल कोन् जन?” जगदानन्देर नाम शुनि' सङ्कोच हैल मन॥ 11 ॥ तत्क्षणात् उस शय्याको दूर हटाना और केलेके पत्तेपर शयन :- गोविन्देरे कहि' सेइ तुलि दूर कैला। कलार शरला-उपर शयन करिला॥ 12 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके शयनके समय श्रीस्वरूप दामोदर वहींपर रहे। तुलाई और तकियेको देखकर महाप्रभुने क्रोधित होकर श्रीगोविन्दसे पूछा,—“इसे किसने बनवाया है?” जब महाप्रभुने श्रीगोविन्दके मुखसे श्रीजगदानन्द पण्डितका नाम सुना तो उनके मनमें सङ्कोच हुआ। उन्होंने श्रीगोविन्दको कहकर उस तुलाईको वहाँसे हटवाया और फिर केलेके तनेकी छालके ऊपर ही शयन किया॥ 10-12 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीजगदानन्दके दुःखी होनेकी सम्भावनाके विषयमें बतलाना :- स्वरूप कहे,—“तोमार इच्छा, कि कहिते पारि? शय्या उपेक्षिले पण्डित दुःख पाबे भारी॥” 13 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे कहा,—“आपकी जैसी इच्छा, मैं क्या कह सकता हूँ? किन्तु शय्याकी उपेक्षा करनेसे जगदानन्द पण्डितको बहुत दुःख होगा॥” 13 ॥