श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2340, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुके द्वारा केलेके तनेकी छालपर शयन करनेसे उन्हें बड़ा कष्ट होता होगा, ऐसा सोचकर श्रीजगदानन्दने तुलाई-तकिया आदि तैयार करवाया, किन्तु महाप्रभुने उसे स्वीकार नहीं किया। श्रीस्वरूप गोस्वामीने केलेके वृक्षकी छालको चीर-चीरकर उसे तुलाई-तकियेकी भाँति तैयार कर दिया, महाप्रभुने उसके लिये भी बहुत आपत्ति की, किन्तु अन्तमें उसे स्वीकार कर लिया। श्रीजगदानन्दने महाप्रभुकी आज्ञा लेकर वृन्दावन जाकर श्रीसनातनके साथ बहुत प्रकारसे भक्तिका आस्वादन किया। उन्होंने मुकुन्द सरस्वतीके बहिर्वासके सम्बन्धमें आचार्य-अभिमानरूपी परम उपाय निर्धारित किया था। श्रीजगदानन्दके द्वारा सनातनकी भेंटको महाप्रभुको देनेपर उसके द्वारा पीलूके फलको खानेका रहस्य प्रकट हुआ। देवदासीके गानको सुनकर महाप्रभु काँटोंकी मेड़को तोड़कर, गायक कोई स्त्री है, इसे नहीं जानकर उसकी ओर दौड़ रहे थे। श्रीगोविन्दके द्वारा रोके जानेपर, उन्होंने 'स्त्री' नाम सुनकर श्रीगोविन्दको धन्यवाद दिया। संन्यासी अथवा वैष्णवके लिये परस्त्रीके मुखसे कृष्णगीतका साक्षात् श्रवण करना अनुचित है,—यह इस आख्यायिकामें (शिक्षाप्रद कथामें) मिलता है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीको काशीसे श्रीपुरुषोत्तममें आनेके समय मार्गमें कायस्थ रामदास-विश्वास-पण्डितका सङ्ग प्राप्त हुआ था। विश्वास-पण्डितके हृदयमें विद्याका गर्व होनेके कारण मुक्तिकी अभिलाषा रहनेपर महाप्रभुने उसपर विशेष कृपा नहीं की। भट्टगोस्वामीकी आंशिक जीवनी इस अध्यायके अन्तमें संक्षेपमें कही गयी है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीकृष्णविरहमें कृश (दुबले) किन्तु भावके कारण प्रफुल्लित महाप्रभुका आश्रय ग्रहण :- कृष्णविच्छेदजातात्र्या क्षीणे चापि मनस्तनू। दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं गौरमाश्रये ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कृष्णवियोगसे उत्पन्न आर्त्तिके कारण मन और शरीरके दुर्बल होनेपर भी [सात्त्विकादि] भावोदयके समय जो प्रफुल्लताको धारण करते थे, मैं उन श्रीगौरचन्द्रका आश्रय ग्रहण करता हूँ ॥ १ ॥ अनुभाष्य— यस्य (चैतन्यदेवस्य) मनः तनूः कृष्णविच्छेदजातात्र्या (कृष्णविरहजनितपीड़या) क्षीणे अपि च भावैः (सात्त्विकादिभिः) क्वचित् फुल्लतां (स्फीततां) दधाते (धारयतः), तं गौरम् [अहम्] आश्रये (शरणं प्रपद्ये)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। समस्त गौर भक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ हेनमते महाप्रभु जगदानन्द-सङ्गे। नानामते आस्वादय प्रेमेर तरङ्गे ॥ ३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीजगदानन्द पण्डितके साथ अनेक भावोंसे प्रेमकी तरङ्गोंका आस्वादन करते थे॥ ३॥ उक्त श्लोकका अर्थ :- कृष्णविच्छेदे दुःखे क्षीण मन-काय। भावावेशे प्रभु कभु प्रफुल्लित हय ॥ ४ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-विरहरूपी दुःखमें महाप्रभुका मन क्लान्त और उनका शरीर क्षीण हो गया था। किन्तु जब कभी उनमें भावका आवेश आता तो वे प्रफुल्लित हो जाते थे ॥ ४ ॥