श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें322 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/149-155 ] प्रसाद पा भी रहा है या नहीं। तुम शीघ्र आकर मुझे समाचार देना॥"149-150॥ श्रीजगदानन्दके भोजनके पश्चात् महाप्रभुका शयन; भक्तकी तृप्ति अथवा सन्तुष्टिमें ही महाप्रभुके द्वारा अपने कार्यके समाधानको समझना और सुख :- गोविन्द आसि' देखि' कहिल पण्डितेर भोजन। तबे महाप्रभु करिला स्वच्छन्दे शयन॥ 151 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने आकर देखा कि श्रीजगदानन्द पण्डित भोजन कर रहे हैं और उन्होंने यह बात जाकर महाप्रभुको बतलायी। तब महाप्रभुने निश्चिन्त होकर शयन किया॥ 151 ॥ श्रीगौरको वशमें करनेवाले श्रीजगदानन्द और महाप्रभुके प्रेमके साथ द्वापरमें सत्यभामा और वासुदेवके प्रेमकी उपमा :- जगदानन्दे-प्रभुते प्रेम चले एइमते। सत्यभामा-कृष्णे यैछे शुनि भागवते॥ 152 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित और महाप्रभुमें प्रेम इस प्रकार ही चलता है जैसे भागवतमें सत्यभामा और श्रीकृष्णके विषयमें सुना जाता है॥ 152 ॥ जगदानन्देर सौभाग्येर के कहिबे सीमा? जगदानन्देर सौभाग्येर तँह से उपमा॥ 153 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी सीमाको कौन जान सकता है? श्रीजगदानन्द पण्डितके सौभाग्यकी उपमा वे स्वयं ही हैं॥ 153 ॥ श्रीजगदानन्दके 'प्रेम-विवर्त्त'को सुननेसे श्रीगौरकृष्णके प्रति प्रेमका उदय :- जगदानन्देर 'प्रेमविवर्त्त' सुने येइ जन। प्रेमेर 'स्वरूप' जाने, पाय प्रेमधन॥ 154 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके प्रेमविवर्त्तके विषयमें अथवा उनके द्वारा रचित 'प्रेमविवर्त्त' नामक ग्रन्थका जो कोई श्रवण करता है, वह प्रेमके स्वरूपको जान पाता है और उसे प्रेमधनकी प्राप्ति होती है॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रेमविवर्त्त',—इसका एक अर्थ यह है कि प्रेमका 'विवर्त्त' अर्थात् प्रेमकार्यमें रोषका भ्रम होना—ऐसा व्यवहार; दूसरा अर्थ यह है कि श्रीजगदानन्दने महाप्रभुके चरित्रसे सम्बन्धित जो स्वरचित 'प्रेमविवर्त्त'-नामक ग्रन्थ लिखा है, वह॥ 154 ॥ बारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 155 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे जगदानन्द-तैल-भञ्जनं नाम द्वादशः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 155 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें जगदानन्द-तेल-भञ्जन नाम बारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।