भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2338

[ 12/141-150 बारहवाँ अध्याय 321 चन्दनादि लञा प्रभु बसिला सेइ स्थाने। “आमार आगे आजि तुमि करह भोजने॥”141॥ अनुवाद—महाप्रभु चन्दनादि धारण करके वहीं बैठ गये और उन्होंने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“आज तुम मेरे सामने ही भोजन करो॥”141॥ वाम्यस्वभाव श्रीजगदानन्दका ऐश्वर्य-बुद्धिसे महाप्रभुकी मर्यादाके संरक्षणके लिये महाप्रभुको विश्रामके लिये जानेकी प्रार्थना :— पण्डित कहे,—“प्रभु याइ' करुन विश्राम। मुइ, एबे प्रसाद लइमु करि' समाधान॥142॥ श्रीगोविन्दके सङ्गी महाप्रभुके सेवक रामाइ और रघुनाथभट्टके द्वारा उस भोगको बनानेके पश्चात् महाप्रभुके प्रसादकी प्राप्ति :— रसुइर कार्य करियाछे रामाइ, रघुनाथ। इँहा-सबाय दिते चाहि किछु व्यञ्जन-भात॥”143॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,—“हे महाप्रभो! आप जाकर विश्राम कीजिये, मैं सब कार्य निपटाकर प्रसाद पा लूँगा। रसोईका कार्य रामाइ और रघुनाथने किया है, मैं पहले इन्हें खानेके लिये कुछ व्यञ्जन और चावल आदि देना चाहता हूँ॥”142-143॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा किये गये भोजनके विषयमें बतलानेके लिये श्रीगोविन्दको आदेश देकर महाप्रभुका घर जाना :— प्रभु कहेन,—“गोविन्द, तुमि इँहाइ रहिबा। पण्डित भोजन कैले, आमारे कहिबा॥”144॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम यहींपर रहना। जब जगदानन्द पण्डित भोजन कर ले, तब मुझे आकर बतलाना॥”144॥ महाप्रभुके सुखमें एकनिष्ठ श्रीजगदानन्दके द्वारा आत्मेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा नहीं करके श्रीगोविन्दको महाप्रभुकी सेवाके लिये भेजना :— एत कहि' महाप्रभु करिला गमन। गोविन्देरे पण्डित किछु कहेन वचन॥145॥ “तुमि शीघ्र याह करिते पादसम्वाहने। कहिह,—'पण्डित एबे बसिल भोजने॥'146॥ महाप्रभुकी निद्राके पश्चात् महाप्रभुके उच्छिष्टके सम्मानके लिये आनेका अनुरोध :— तोमार प्रभुर 'शेष' राखिमु धरिया। प्रभु निद्रा गेले, तुमि खाइह आसिया॥”147॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु वहाँसे चले गये। श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीगोविन्दसे कहा,—“तुम शीघ्र ही जाकर महाप्रभुके चरण दबाओ। उनके पूछनेपर कहना,—'जगदानन्द पण्डित अभी-अभी भोजन करनेके लिये बैठे हैं।' मैं तुम्हारे लिये महाप्रभुका उच्छिष्ट रख लूँगा, उनके सो जानेपर तुम आकर प्रसाद पा लेना॥”145-147॥ सभीको प्रसाद बाँटनेके बाद महाप्रभुके उच्छिष्टका सम्मान :— रामाइ, नन्दाइ, आर गोविन्द, रघुनाथ। सबारे बाँटिया दिला प्रभुर व्यञ्जन-भात॥148॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने श्रीरामाइ, श्रीनन्दाइ, श्रीगोविन्द और श्रीरघुनाथके लिये महाप्रभुके उच्छिष्ट चावल तथा व्यञ्जन आदिको पत्तोंमें बाँटकर रख दिया॥148॥ स्वयं महाप्रभुके उच्छिष्टको ग्रहण करना :— आपने प्रभुर 'शेष' करिला भोजन। तबे गोविन्देरे प्रभु पाठाइला पुनः॥149॥ भक्तप्रेमके वशीभूत भगवान्‌के द्वारा भी अपने सुखकी चेष्टा छोड़कर भक्तके सन्तोषका अनुसन्धान :— “देख,—जगदानन्द प्रसाद पाय कि ना पाय। शीघ्र आसि' समाचार कहिबे आमाय॥”150॥ अनुवाद—इसके बाद श्रीजगदानन्द पण्डितने स्वयं भी महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको पा लिया। तभी महाप्रभुने पुनः श्रीगोविन्दको श्रीजगदानन्दके निकट भेजा और कहा,—“जाकर देखो कि जगदानन्द पण्डित