श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें320 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/130-140 ] आपने खाइबे कृष्ण, ताहार लागिया। तोमार हस्ते पाक कराय उत्तम करिया ॥ 132 ॥ ऐछे अमृत-अन्न कृष्णे कर समर्पण। तोमार भाग्येर सीमा के करे वर्णन? ?" 133 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु आनन्दपूर्वक भोजन करने लगे और सभी व्यञ्जनोंका आस्वादन करते हुए कहने लगे, - "क्रोधके आवेशमें बनाये गये व्यञ्जनोंका ऐसा स्वाद! इससे ही पता चलता है कि तुम्हारे ऊपर कृष्णकी बहुत कृपा है। कृष्ण स्वयं खाना चाहते हैं, इसलिये वे तुम्हारे हाथोंसे स्वयंके लिये उत्तम-उत्तम वस्तुएँ पकवाते हैं। तुम कृष्णको ऐसे अमृत-तुल्य पकवान समर्पित करते हो, तुम्हारे भाग्यकी सीमाका कौन वर्णन कर सकता है?" 130-133 ॥ श्रीगौरको ही सर्वस्व माननेवाले, श्रीगौरगतप्राण श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको ही सब कुछ करवानेवालेके रूपमें मानना :- पण्डित कहे, - "ये खाइबे, सेइ पाककर्त्ता। आमि सब, - केवलमात्र सामग्री-आहर्त्ता ॥ " 134 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा, - "जो खायेंगे, वे ही पकवान बनानेवाले हैं। मैं तो केवलमात्र सामग्रीका संग्रह करनेवाला हूँ॥" 134 ॥ भक्तके अभिमानके भयसे भगवान्के द्वारा प्रचुर भोजन करना :- पुनः पुनः पण्डित नाना व्यञ्जन परिवेशे। भये किछु ना बलेन प्रभु, खायेन हरिषे ॥ 135 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित बार बार अनेक प्रकारके व्यञ्जन परोसने लगे। उनके भयके कारण महाप्रभु कुछ भी नहीं बोले, अपितु प्रसन्नतापूर्वक खाते रहे ॥ 135 ॥ आग्रह करिया पण्डित कराइला भोजन। आर दिन हैते भोजन हैल दशगुण ॥ 136 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने बार बार आग्रह करके महाप्रभुको इतना भोजन कराया कि उन्होंने अन्य दिनोंकी तुलनामें दस गुणा अधिक भोजन किया ॥ 136 ॥ बारबार प्रभु उठिते करेन मन। सेइकाले पण्डित परिवेशे व्यञ्जन ॥ 137 ॥ किछु बलिते नारेन प्रभु, खायेन तरासे। ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवासे ॥ 138 ॥ महाप्रभुका परिवेश समाप्त करनेके लिये श्रीजगदानन्दको कातरभावसे अनुरोध :- तबे प्रभु कहेन करि' विनय-सम्मान। "दशगुण खाओयाइला, एबे कर समाधान ॥" 139 ॥ अनुवाद-बार बार महाप्रभु जैसे ही उठनेकी इच्छा करते, श्रीजगदानन्द पण्डित उसी समय उनके पत्तलमें और व्यञ्जन परोस देते। महाप्रभु उन्हें कुछ बोल नहीं पा रहे थे और सब खाते रहे। महाप्रभुको भय था कि यदि मैं नहीं खाऊँगा तो जगदानन्द उपवास करेगा। अन्तमें महाप्रभुने विनती करते हुए सम्मानपूर्वक श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा, - "तुमने मुझे अन्य दिनोंकी अपेक्षा दस गुणा भोजन करवा दिया है, अब कृपा करके और मत खिलाओ ॥" 137-139 ॥ अनुभाष्य- 'समाधान', - निष्पत्ति, समापन, विराम, अन्त ॥ 139 ॥ बारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। आचमनके बाद महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दको अपने सामने बैठकर भोजन करनेके लिये अनुरोध :- तबे महाप्रभु उठि' कैला आचमन। पण्डित आनिल, मुखवास, माल्य, चन्दन ॥ 140 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने उठकर आचमन किया। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये मुखशुद्धि, माला और चन्दन ले आये ॥ 140 ॥