श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2336, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/121-131 बारहवाँ अध्याय 319 भक्तके प्रेमके वशीभूत भगवान्के द्वारा भक्तके मानका भञ्जन अथवा कृपा-प्रार्थना :- तृतीय दिवसे प्रभु ताँर द्वारे याञा। “उठह पण्डित”—करि' कहेन डाकिया ॥ 121 ॥ भक्तके घरमें भगवान्का स्वयं याचकके रूपमें भिक्षा स्वीकार करना :- “आजि भिक्षा दिबा आमाय करिया रन्धने। मध्याह्ने आसिमु, एबे याइ दरशने ॥” 122 ॥ अनुवाद—तीन दिन बाद महाप्रभु उनके द्वारपर गये और उन्हें पुकारते हुए कहा, —“हे जगदानन्द पण्डित, उठो। आज तुम स्वयं भोजन पाक करके मुझे खिलाना। मैं दोपहरके समय आऊँगा, अभी श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ॥” 121-122 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'याइ दरशने',—श्रीजगन्नाथके दर्शन करने जा रहा हूँ ॥ 122 ॥ महाप्रभुके प्रेमी पण्डितका महाप्रभुके लिये भोग बनाना और समर्पण :- एत बलि' प्रभु गेला, पण्डित उठिला। स्नान करि' नाना व्यञ्जन रन्धन करिला ॥ 123 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु चले गये। इधर श्रीजगदानन्द उठे और स्नान करनेके पश्चात् उन्होंने अनेक व्यञ्जन बनाये ॥ 123 ॥ मध्याह्न करिया प्रभु आइला भोजने। पादप्रक्षालन करि' बसिला आसने ॥ 124 ॥ अनुवाद—महाप्रभु मध्याह्न-कृत्य करनेके पश्चात् भोजन करनेके लिये आये। श्रीजगदानन्दने उनके चरण धुलवाये और महाप्रभु आसनपर बैठ गये ॥ 124 ॥ सघृत शाल्यन्न कलापाते स्तूप कैला। कलार डोङ्गा भरि' व्यञ्जन चौदिके धरिला ॥ 125 ॥ अन्न-व्यञ्जनोपरि तुलसी-मञ्जरी। जगन्नाथेर पिठा-पाना आगे आने धरि' ॥ 126 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने केलेके पत्तेपर घीसे मिश्रित शालि-चावलका स्तूप बनाकर उसके चारों ओर अनेक व्यञ्जनोंसे भरे केलेके पत्तोंसे बने दोने रख दिये। चावलके स्तूप और उन व्यञ्जनोंके ऊपर तुलसी मञ्जरी रखी हुई थी। फिर उन्होंने महाप्रभुके आगे भगवान् श्रीजगन्नाथका पीठा-पाना आदि प्रसाद भी लाकर रख दिया ॥ 125-126 ॥ अभिन्न-आत्मा प्रणयपात्र भक्तके साथ भक्तप्रेमवशतः भगवान्की एक साथ भोजन करनेकी इच्छा :- प्रभु कहे, —“द्वितीय-पाते बाड़' अन्न-व्यञ्जन। तोमाय आमाय आजि एकत्र करिमु भोजन ॥” 127 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“एक और पत्तेपर चावल और व्यञ्जन आदि रखो, क्योंकि आज तुम और मैं एक साथ भोजन करेंगे ॥” 127 ॥ हस्त तुलि' रहेन प्रभु, ना करेन भोजन। तबे पण्डित कहेन किछु सप्रेम वचन ॥ 128 ॥ श्रीजगदानन्दकी महाप्रभुसे प्रीतिपूर्ण उक्ति; बादमें बैठना ही स्वीकार :- “आपने प्रसाद लह, पाछे मुञि लइमु। तोमार आग्रह आमि केमने खण्डिमु ??” 129 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अपने हाथ ऊपर उठाकर रखे और कुछ खा नहीं रहे थे। तभी श्रीजगदानन्द पण्डितने प्रेमपूर्वक कहा, —“आप कृपया प्रसाद ग्रहण कीजिये, मैं बादमें ग्रहण करूँगा। मैं आपके आग्रहको कैसे मना कर पाऊँगा?” 128-129 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीजगदानन्दके प्रेमपूर्वक बनाये गये प्रसादकी स्तुति करते हुए उनके भाग्यकी प्रशंसा :- तबे महाप्रभु सुखे भोजने बसिला। व्यञ्जनेर स्वाद पाञा कहिते लागिला ॥ 130 ॥ “क्रोधावेशेर पाकेर हय ऐछे स्वाद ! एइ त' जानिये तोमाय कृष्णेर 'प्रसाद' ॥ 131 ॥