श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें318 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/113-120 ] एइ सुख लागि' आमि करिलुँ संन्यास! आमार 'सर्वनाश'-तोमार 'परिहास'॥113॥ अपनी इन्द्रियोंके तर्पणरूपी सम्भोगको प्रिय माननेवाले संन्यासी वेशधारियोंकी निन्दा :- पथे याइते तैल गन्ध मोर येइ पाबे। 'दारी संन्यासी' करि' आमारे कहिबे॥"114॥ अनुवाद-मैंने ऐसे सुखके लिये ही संन्यास ग्रहण किया है! तुम्हारे इस परिहाससे मेरा तो सर्वनाश होगा। मार्गमें जाते हुए जिसको भी मेरे शरीरसे तेलकी सुगन्ध अनुभव होगी, वह मुझे 'दारी संन्यासी' [स्त्रीके सङ्गमें रहनेवाला संन्यासी] कहेंगे॥"113-114॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्रीके साथ रहनेवाला संन्यासी॥114॥ अनुभाष्य- 'दारी संन्यासी', - स्त्री-सम्भोगी, मिथ्याचारके कारण भ्रष्ट, तान्त्रिक संन्यासी॥114॥ महाप्रभुके रोषके कारण श्रीगोविन्द मौन :- शुनि' प्रभुर वाक्य गोविन्द मौन करिला। प्रातःकाले जगदानन्द प्रभु-स्थाने आइला॥115॥ अनुवाद-महाप्रभुके वचन सुनकर श्रीगोविन्द मौन रहे। अगले दिन प्रातःकालमें श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके वासस्थानपर आये॥115॥ स्वयं समस्त वस्तुओंके भोक्ता होनेपर भी श्रीजगदानन्दके आगमनसे लोक-शिक्षक आचार्यरूपमें महाप्रभुके द्वारा साधक अथवा आचार्यको इन्द्रियसुख-त्याग अथवा आदर्श वैराग्यके आचरणका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,-"पण्डित, तैल आनिला गौड़ हइते। आमि त' संन्यासी,-तैल ना पारि लइते॥116॥ श्रीजगदानन्दको उपदेशके छलसे समस्त चित् वस्तुओंके भोक्ता भगवान्की सर्वोत्कृष्ट द्रव्योंके द्वारा सेवासे ही जीवकी सेवाकी सफलताकी शिक्षा देना :- जगन्नाथे देह' लञा दीप येन ज्वले। तोमार सकल श्रम हइबे सफले॥"117॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "हे जगदानन्द पण्डित! तुम गौड़देशसे मेरे लिये सुगन्धित चन्दनका तेल लाये हो। मैं तो संन्यासी हूँ, इसलिये मैं उस तेलको स्वीकार नहीं कर सकता। तुम उस तेलको ले जाकर जगन्नाथ मन्दिरमें दे दो, जिससे वह दीपक जलानेके काम आ जायेगा। ऐसा होनेसे तुम्हारे द्वारा तेलको एकत्रित करके बनाने और यहाँ लानेका समस्त परिश्रम भी सफल हो जायेगा॥"116-117॥ महाप्रभुके प्रेमी श्रीजगदानन्दके द्वारा महाप्रभुके प्रति प्रणयाभिमानरूपी रोष :- पण्डित कहे,-"के तोमारे कहे मिथ्यावाणी? आमि गौड़ हैते तैल कभु नाहि आनि॥"118॥ महाप्रभुके सामने ही तेलके पात्रको तोड़ना :- एत बलि' घर हैते तैल-कलस आनिया। प्रभुर आगे आङ्गिनाते फेलिला भाङ्गिया॥119॥ अपने घरमें स्वयंको बन्द करना :- तैल भाङ्गि' सेइ पथे निज-घर गिया। शुइया रहिला घरे कपाट खिलिया॥120॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितने कहा,-"आपको कौन यह मिथ्या बातें कह रहा है? मैं तो गौड़देशसे कभी कोई तेल लाया ही नहीं।" यह कहकर वे कमरेके भीतरसे तेलकी मटकी लाये और उन्होंने महाप्रभुके सामने ही उस मटकीको आङ्गनमें फेंककर तोड़ डाला। वे तेलकी मटकीको फोड़कर उसी आङ्गनसे होते हुए अपने कमरेमें चले गये और कमरेको भीतरसे बन्द करके लेट गये [और मान करके खाना-पीना छोड़ दिया]॥118-120॥ अनुभाष्य-श्रीजगदानन्द समुद्रके तटपर श्रीहरिदास ठाकुरकी समाधि-स्थलीके निकटमें वर्तमानकालके 'सात-आसन' नामक भजन-कुटी-समूहमें-से एक 'गिरिधारी'-आसनमें रहते थे, -ऐसा श्रीरघुनाथ वैद्यके द्वारा लिखित ग्रन्थसे जाना जाता है॥120॥