भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2329

312 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/59-66 ] माताके समान आयु होनेपर भी स्त्रीका नाम श्रवण करने मात्रसे जगद्गुरु लोक-शिक्षक संन्यासी-लीलाका अभिनय करनेवाले महाप्रभुको सङ्कोच-बोध :- मुकुन्दार मातार नाम शुनि' प्रभु सङ्कोच हैला। तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिा ॥ 59 ॥ अनुवाद-मुकुन्दकी माताका नाम सुनकर महाप्रभुको कुछ सङ्कोच हुआ, किन्तु उन्होंने श्रीपरमेश्वरके प्रति प्रीतिके कारण उन्हें कुछ भी नहीं कहा ॥ 59 ॥ सरल स्नेहके कारण बाहरी शिष्टाचार अथवा बाह्य- मर्यादा-ज्ञानके अभावके कारण दोष होनेपर भी भावग्राही महाप्रभुका उसके निष्कपट व्यवहार-गुणसे सन्तोष :- प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी ना जाने। अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥ 60 ॥ अनुवाद-श्रीपरमेश्वर सरल स्नेहके कारण वाक्-चतुरायी नहीं जानते थे, महाप्रभु उनके इसी गुणके कारण हृदयमें बहुत प्रसन्न हुए ॥ 60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मुकुन्दकी माता आयी हैं, '-यह बात संन्यासीसे बोलना-केवल पूर्व-स्नेहके कारण सरलतामात्र है। स्नेहके कारण सरलता कभी भी शुद्ध-वैदग्धी अर्थात् शुद्ध वाक्-चातुर्यको नहीं जानती ॥ 60 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - 'प्रश्रय-पागल शुद्ध-वैदग्धी ना जानें'; 'प्रश्रय' शब्दका अर्थ स्नेह, स्नेहयुक्त सम्मान, विनय, विश्वास, आबदार [बाल-हठ] है। 'प्रागल्भ्य'-शब्दका अर्थ प्रगल्भता, औधत्य, तेजस्विता है; 'वैदग्धी'- शब्दका अर्थ चतुरता, रसिकता, शोभा, पटुता, पाण्डित्य, कौशल, भङ्गिमा है ॥ 60 ॥ गुण्डिचा-मार्जन और रथके आगे नृत्य :- पूर्ववत् सबा लञा गुण्डिचा-मार्जन। रथ-आगे पूर्ववत् करिला नर्त्तन ॥ 61 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंके साथ गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया और रथके आगे नृत्य किया ॥ 61 ॥ ईश्वरकी यात्रादिके दर्शनके अन्तमें श्रीवासपत्नीके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :- चातुर्मास्य सब यात्रा कैला दरशन। मालिनी प्रभृति प्रभुरे कैला निमन्त्रण ॥ 62 ॥ अनुवाद-गौड़ीय भक्तोंने चातुर्मास्यके अन्तर्गत आनेवाले समस्त महोत्सवोंके दर्शन किये। श्रीमालिनी आदि महिला भक्तोंने अपने पतियोंके माध्यमसे महाप्रभुको निमन्त्रण किया ॥ 62 ॥ प्रभुर प्रिय नाना द्रव्य आनियाछे देश हैते। सेइ व्यञ्जन करि' भिक्षा देन घर-भाते ॥ 63 ॥ अनुवाद-सभी महिला भक्त अपने साथ गौड़देशसे महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले अनेक द्रव्य लायी थीं, उन्होंने उन द्रव्योंके साथ घरमें ही चावल-सब्जी आदि बनाकर महाप्रभुको भोजन करवाया ॥ 63 ॥ दिनमें भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन, रात्रिमें निर्जनमें कृष्ण-विरह :- दिने नाना क्रीड़ा करे लञा भक्तगण। रात्र्ये कृष्ण-विच्छेदे प्रभु करेन रोदन ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभु दिनके समय भक्तोंको साथमें लेकर अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते थे, किन्तु रात्रिमें कृष्ण-विरहमें विलाप करते थे ॥ 64 ॥ चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़-गमनके पहले भक्तोंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :- एइमत नाना लीलाय चातुर्मास्य गेल। गौड़देशे याइते तबे भक्ते आज्ञा दिल ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुका इस प्रकार अनेक लीलाएँ करते हुए चातुर्मास्यका समय व्यतीत हो गया, तब उन्होंने भक्तोंको गौड़देश लौट जानेकी आज्ञा दी ॥ 65 ॥ सब भक्त करेन महाप्रभुर निमन्त्रण। सर्वभक्ते कहेन प्रभु मधुर वचन ॥ 66 ॥