भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2328

[ 12/49-58 बारहवाँ अध्याय 311 अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने महाप्रभुकी आज्ञानुसार उस बालकका नाम ‘परमानन्द-दास’ रखा था। महाप्रभु उपहास करते हुए उस बालकको ‘पुरीदास’ कहकर पुकारने लगे॥ 49॥ परमानन्द (पुरी)-दासके द्वारा महाप्रभुके चरणके अँगूठेको चूसना :— शिवानन्द यबे सेइ बालके मिलाइला। महाप्रभु पादाङ्गुष्ठ तार मुखे दिला॥ 50॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने जब अपने उस बालकको महाप्रभुसे मिलवाया, तब महाप्रभुने अपने चरणका अँगूठा उस बालकके मुखमें दे दिया॥ 50॥ अनुभाष्य—परवर्तीकालमें पिताके साथ पुरीमें आगमन और महाप्रभुके द्वारा कृष्ण-उच्चारण करनेके लिये बहुत साध्य-साधनाके पश्चात् अन्तमें उस बालकके द्वारा कृष्णलीलाके श्लोककी रचना—अन्त्यलीला 16/65-75 संख्या देखें॥ 50॥ श्रीशिवानन्दका परम सौभाग्य :— शिवानन्देर भाग्यसिन्धु के पाइबे पार? याँर सब गोष्ठीके प्रभु कहे ‘आपणार’॥ 51॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके भाग्यके समुद्रको कौन पार कर सकता है? जिनके समस्त परिवारको महाप्रभु ‘अपना’ कहते थे॥ 51॥ तबे सब भक्त लञा करिला भोजन। गोविन्दरे आज्ञा दिला करि’ आचमन॥ 52॥ सपरिवार श्रीशिवानन्दको महाप्रभुके द्वारा निजजन मानकर साक्षात् कृपा :— “शिवानन्देर ‘प्रकृति’, पुत्र—यावत् एथाय। आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” 53॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सब भक्तोंके साथ भोजन किया और आचमन करनेके पश्चात् श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“शिवानन्द सेनकी पत्नी और पुत्र जब तक यहाँ जगन्नाथ पुरीमें हैं, उन्हें मेरा उच्छिष्ट भोजन अवश्य ही मिले॥” 52-53॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘शिवानन्देर ‘प्रकृति’’,— श्रीशिवानन्दकी पत्नी॥ 53॥ श्रीमायापुरवासी परमेश्वर-मोदकका वृत्तान्त :— नदीयावासी मोदक, तार नाम—‘परमेश्वर’। मोदक बेचे, प्रभुर वाटीर निकट तार घर॥ 54॥ महाप्रभुकी बाल्यलीला और परमेश्वर :— बालक-काले प्रभु तार घरे बार बार यान। दुग्ध, खण्ड मोदक देय, प्रभु ताहा खान॥ 55॥ प्रभु-विषये स्नेह तार बालक-काल हैते। से वत्सर से आइल प्रभुरे देखिते॥ 56॥ अनुवाद—मिष्ठान्न बेचनेवाले ‘परमेश्वर’-नामक एक नदियावासी महाप्रभुके घरके निकट ही रहते थे। महाप्रभु बाल्यकालमें बार-बार उनके घरमें जाते थे और वे महाप्रभुको दूध, गुड़के लड्डू आदि देते थे एवं महाप्रभु उन्हें खाते थे। श्रीपरमेश्वरका महाप्रभुके बाल्यकालसे ही उनसे स्नेह था। उस वर्ष वे महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये जगन्नाथ पुरी आये॥ 54-56॥ परमेश्वरके द्वारा अपना परिचय देकर प्रणाम और पत्नीका आगमन-ज्ञापन :— “परमेश्वर्या मुञि” बलि’ दण्डवत् कैल। तारे देखि’ प्रभु प्रीते ताहारे पुछिल॥ 57॥ “परमेश्वर कुशल हओ, भाल हैल, आइला।” “मुकुन्दार माता आसियाछे,” प्रभुरे कहिला॥ 58॥ अनुवाद—उन्होंने महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करते हुए कहा,—“मैं परमेश्वर हूँ।” उन्हें देखकर महाप्रभुने उनसे प्रीतिपूर्वक पूछा,—“परमेश्वर! आप कुशलसे तो हैं ना। बहुत अच्छा हुआ कि आप श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये हैं।” श्रीपरमेश्वरने महाप्रभुसे कहा,—“मुकुन्दकी माता (मेरी पत्नी) भी आयी है॥” 57-58॥