श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2327, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें310 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 12/39-49 ] महाप्रभुके द्वारा गौड़ीयभक्तोंका समाचार पूछना और उत्तर :- वैष्णवेर समाचार गोसाञि पुछिला। एके एके सबार नाम श्रीकान्त जानाइला ॥ ३९ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीकान्तसे वैष्णवोंका समाचार पूछा और श्रीकान्तने एक-एकका नाम लेकर समस्त वैष्णवोंके विषयमें बतलाया ॥ ३९ ॥ 'दुःख पाञा आसियाछे,'-एइ प्रभुर वाक्य शुनि' । जानिला 'सर्वज्ञ प्रभु'-एत अनुमानि' ॥ ४० ॥ अपने मनके भावोंको जाननेवाले महाप्रभुको अन्तर्यामी मानकर लात मारनेकी बातको गुप्त रखना :- शिवानन्दे लाथि मारिला,-इहा ना कहिला। एथा सब वैष्णवगण आसिया मिलिला ॥ ४१ ॥ अनुवाद- 'यह बहुत दुःखी होकर आया हैं'-महाप्रभुके इस वाक्यको सुनकर श्रीकान्तने अनुमान लगाकर जान लिया कि महाप्रभु सर्वज्ञ हैं। इसलिये श्रीकान्तसेनने महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको लात मारी-इस विषयमें नहीं बतलाया। इतनेमें सभी वैष्णव भी आकर महाप्रभुसे मिले ॥ ४०-४१ ॥ गौड़ीय भक्तोंका आगमन और स्त्रियोंका दूरसे ही महाप्रभुका दर्शन :- पूर्ववत् प्रभु कैला सबार मिलन। स्त्री-सब दूर हइते कैला प्रभुर दरशन ॥ ४२ ॥ अनुवाद-महाप्रभु पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति सभी भक्तोंसे मिले। परन्तु स्त्रियोंने दूरसे ही महाप्रभुके दर्शन किये ॥ ४२ ॥ सभीको वासस्थान आदि प्रदान :- वासाघर पूर्ववत् सबारे देओआइला। महाप्रसाद-भोजने सबारे बोलाइला ॥ ४३ ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पहलेकी भाँति सभी भक्तोंको रहनेका स्थान दिलवाया और फिर सभी भक्तोंको महाप्रसादका भोजन करनेके लिये बुलाया ॥ ४३ ॥ पुत्र सहित श्रीशिवानन्दपर महाप्रभुकी कृपा :- शिवानन्द तिनपुत्रे गोसाञिरे मिलाइला। शिवानन्द-सम्बन्धे सबाय बहुकृपा कैला ॥ ४४ ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने अपने तीनों पुत्रोंको श्रीचैतन्य महाप्रभुसे मिलवाया। महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनके सम्बन्धसे उनके पुत्रोंपर बहुत कृपा की ॥ ४४ ॥ प्रश्नोत्तरमें छोटे पुत्रका परमानन्दपुरी-दास-नाम-श्रवण :- छोटपुत्रे देखि' प्रभु नाम पुछिला। 'परमानन्ददास'-नाम सेन जानाइला ॥ ४५ ॥ अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनके सबसे छोटे पुत्रको देखकर महाप्रभुने उसका नाम पूछा। श्रीशिवानन्द सेनने बतलाया कि उसका नाम 'परमानन्ददास' है ॥ ४५ ॥ परमानन्दपुरी-दास-नामके आदि कारणके वृत्तान्तका वर्णन; महाप्रभुकी आज्ञासे नामकरण :- पूर्वे यबे शिवानन्द प्रभुस्थाने आइला। तबे महाप्रभु ताँरे कहिते लागिला ॥ ४६ ॥ "एबार तोमार येइ हइबे कुमार। 'पुरीदास' बलि' नाम धरिह ताहार ॥" ४७ ॥ अनुवाद-पहले किसी समय जब श्रीशिवानन्द सेन महाप्रभुके पास आये थे, तब महाप्रभु उनसे कहने लगे, -"इस बार आपका जो पुत्र होगा, आप उसका नाम 'पुरीदास' रखना ॥" ४६-४७ ॥ तबे मायेर गर्भे हय सेइ त' कुमार। शिवानन्द घरे गेले, जन्म हैल तार ॥ ४८ ॥ अनुवाद-उस समय वह बालक अपनी माताके गर्भमें था, जब श्रीशिवानन्द सेन अपने घर लौटकर गये थे, तब उस बालकका जन्म हुआ था ॥ ४८ ॥ प्रभु-आज्ञाय धरिला नाम-'परमानन्द-दास' । 'पुरीदास' करि' प्रभु करेन उपहास ॥ ४९ ॥