भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2438, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2438

[ 17/16-28 सतरहवाँ अध्याय 421

प्रवाहित हो रही थी॥16॥ अचेतन पड़ियाछेन,—येन कुष्माण्ड-फल। बाहिरे जड़िमा, अन्तरे आनन्द-विह्वल॥17॥ अनुवाद—महाप्रभु अचेतन अवस्थामें पड़े थे, उनका शरीर कुम्हड़ेके (काशीफलके) समान दिख रहा था। यद्यपि महाप्रभु बाहरमें जड़वत् (निष्क्रिय) थे, किन्तु भीतरमें वे आनन्दसे विह्वल हो रहे थे॥17॥ गाभी-सब चौदिके शुँके प्रभुर श्रीअङ्ग। दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर श्रीअङ्ग-सङ्ग॥18॥ अनुवाद—सभी गायें महाप्रभुको चारों ओरसे घेरकर उनके श्रीअङ्गोंको सूंघ रही थी। उनको वहाँसे हटानेका प्रयास करनेपर भी वे महाप्रभुके दिव्य कलेवरको छोड़कर पीछे नहीं हट रही थीं॥18॥ महाप्रभुकी चेतनताको सम्पादित करनेमें बहुत प्रयत्न और घरमें लाना :- अनेक करिला यत्न, ना हय चेतन। प्रभुरे उठाञा घरे आनिला भक्तगण॥19॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंके द्वारा बहुत प्रयत्न करनेपर भी महाप्रभुकी चेतनता नहीं लौटी। सभी भक्त महाप्रभुको उसी अवस्थामें उठाकर गम्भीरामें ले आये॥19॥ उच्च-सङ्कीर्तनसे महाप्रभुकी चेतनता और अर्द्धबाह्यदशामें आना :- उच्च करि' श्रवणे करे नामसङ्कीर्त्तन। अनेकक्षणे महाप्रभु पाइला चेतन॥20॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके कानके निकट उच्च स्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब बहुत देरके बाद महाप्रभुमें चेतनता आयी॥20॥ चेतन हइले हस्त-पाद बाहिरे आइल। पूर्ववत् यथायोग्य शरीर हइल॥21॥ अनुवाद—महाप्रभुमें चेतनता आनेपर उनके हाथ-पाँव पेटसे बाहर आ गये, उनका दिव्य कलेवर पहलेकी भाँति सामान्य हो गया॥21॥ श्रीस्वरूपको अपनी अवस्थाके विषयमें बतलाना :- उठिया बसिलेन प्रभु, चाहेन इति-उति। स्वरूपे कहेन,—“तुमि आमा आनिला कति??22॥ वेणु-शब्द शुनि' आमि गेलाङ वृन्दावन। देखि,—गोष्ठे वेणु बाजाय व्रजेन्द्रनन्दन॥23॥ सङ्केते वेणुनादे राधा गेला कुञ्ज-घरे। कुञ्जेरे चलिला कृष्ण क्रीड़ा करिवारे॥24॥ ताँर पाछे पाछे आमि करिनु गमन। ताँर भूषण-ध्वनिते आमार हरिल श्रवण॥25॥ गोपीगण-सह विहार, हास-परिहास। कण्ठध्वनि-उक्ति शुनि' मोर कर्णोल्लास॥26॥ हेनकाले तुमि सब कोलाहल करि'। आमा लञा आइला बलात्कार करि'॥27॥ कृष्णकी ध्वनिका श्रवण करनेसे वञ्चित महाप्रभुका विलाप :- शुनिते ना पाइनु सेइ अमृतसम वाणी। शुनिते ना पाइनु भूषण-मुरलीर ध्वनि॥”28॥ अनुवाद—महाप्रभु उठकर बैठ गये और इधर-उधर देखने लगे। महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,—“तुम मुझे कहाँ ले आये हो? मैं वेणु-ध्वनिको सुनकर वृन्दावन गया था, वहाँ मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन गायोंके चरनेके स्थानमें वेणु बजा रहे हैं। वेणुकी ध्वनिके द्वारा किये गये सङ्केतके अनुसार श्रीराधाने कुञ्ज-कुटीरमें प्रवेश किया और श्रीकृष्ण भी उनके साथ क्रीड़ा करनेके लिये उस कुञ्जकी ओर चल दिये। मैं भी श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चलने लगा। उनके आभूषणोंकी ध्वनिसे मेरे कान मुग्ध हो गये। उनके द्वारा गोपियोंके साथ विहार, हास-परिहास करते समय

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