भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2439

422 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/22-37 ] उनके कण्ठकी ध्वनिके मेरे कानमें पड़नेपर कान उल्लसित हो रहे थे। किन्तु उसी समय तुम सब कोलाहल करके मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आये। इसलिये मैं श्रीकृष्णकी गोपियोंके साथ अमृतसम हास-परिहासकी वाणीको और नहीं सुन पाया और न ही मैं उनके आभूषणों और मुरलीकी ध्वनिको सुन पाया॥"22-28॥ भावावेशे स्वरूपे कहेन गद्गद-वाणी। “कर्ण-तृष्णाय मरि, पड़ 'रसामृत' शुनि॥"29॥ अनुवाद-भावके आवेशमें महाप्रभुने गद्गद वाणीके द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरसे कहा,-"श्रीकृष्णके गुणोंके श्रवणकी प्याससे मेरे कान मर रहे हैं, तुम रसामृत पढ़कर मेरे कानोंकी प्यास बुझाओ, मैं उसे सुनना चाहता हूँ॥"29॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कर्ण-तृष्णाय',-कृष्णके गुणोंके श्रवणकी प्याससे ॥ 29 ॥ श्रीगौरके आदेशसे श्रीस्वरूपके द्वारा श्लोकका पाठ :- स्वरूप-गोसाञि प्रभुर भाव जानिया। भागवतेर श्लोक पड़े मधुर करिया ॥ 30 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके भावको जानकर मधुर स्वरमें भागवतका एक श्लोक पढ़ा ॥ 30 ॥ श्रीकृष्णवेणुके माधुर्यसे सब प्रकारके सेवक ही मुग्ध और आकृष्ट :- श्रीमद्भागवत (10/29/40) में- का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत- सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत् त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्य-सौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद्गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥ 31 ॥ अनुवाद-हे कृष्ण, तुम्हारे अमृतमय वेणुगीतके द्वारा सम्मोहित होकर त्रिभुवनमें कौन-सी स्त्री आर्यचरितसे (धर्मसे) विचलित नहीं होती? त्रिभुवनके सौभाग्य-स्वरूप तुम्हारे इस रूपको देखकर समस्त गायें, पक्षी, वृक्ष और हिरन भी पुलक-धारण किया करते हैं॥31॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 24/52 संख्या देखें॥31॥ गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुका चित्रजल्प :- शुनि' प्रभु गोपीभावे आविष्ट हइला। भागवतेर श्लोकार्थ करिते लागिला ॥ 32 ॥ अनुवाद-इस श्लोकको सुनकर महाप्रभु गोपीभावमें आविष्ट हो गये और भागवतके इस श्लोकका अर्थ करने लगे॥ 32 ॥ श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंका अपना भाव-वर्णन (चित्रजल्प) :- यथा राग- हैल गोपी भावावेश, कैल रासे परवेश, कृष्णेर शुनि' उपेक्षा-वचन। कृष्णेर मुख-हास्य वाणी, त्यागे ताहा सत्य मानि', रोषे कृष्णे देन ओलाहन ॥ 33 ॥ श्लोकके अर्थका वर्णन-आरम्भ :- “नागर, कह, तुमि करिया निश्चय। एइ त्रिजगत् भरि', आछे यत योग्या नारी, तोमार वेणु काँहा ना आकर्षय??34॥ वेणुके माधुर्यके बलका वर्णन- कैला जगते वेणुध्वनि, सिद्धमन्त्रा योगिनी, दूती हञा मोहे नारी-मन। महोत्कण्ठा बाड़ाञा, आर्यपथ छोड़ाञा, आनि' तोमाय करे समर्पण ॥ 35 ॥ अप्राकृत नवीन-मदन अथवा कामदेव अनङ्ग :- धर्म छोड़ाय वेणुद्वारे, हाने कटाक्ष-कामशरे, लज्जा भय सकल छोड़ाय। एबे आमाय करि' रोष, कहिं 'पतित्यागे दोष', धार्मिक हञा धर्म शिखाओ ! ! 36 ॥ अन्यकथा, अन्यमन, बाहिरे अन्य आचरण, एइ सब शठ-परिपाटी। तुमि जान परिहास, हय नारीर सर्वनाश, छाड़ एइ सब कुटीनाटी ॥ 37 ॥