श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2440, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/33-40 सतरहवाँ अध्याय 423 वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत-समान मिठा-बोले, अनुभाष्य- 'घोलेले,'-साधारण भाषामें 'घोल खिलाती अमृत-समान भूषण-शिञ्जित। है' अर्थात् आच्छादन अथवा पराजित करती है; तिन अमृते हरे काण, हरे मन, हरे प्राण, पाठान्तरमें 'रोले' अर्थात् शोरसे, शब्दसे; पाठान्तरमें केमने नारी धरिबेक चित? ?" 38 ॥ 'उगारे' अर्थात् डकारती है ॥ ३८ ॥ श्रीराधाभावमें महाप्रभुका श्रीकृष्णमाधुर्यका आस्वादन :- अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33-38 ॥ एत कहि' क्रोधावेशे, भावेर तरङ्गे भासे, अमृतप्रवाह भाष्य - गोपियाँ भावमें आविष्ट होकर उत्कण्ठा-सागरे डुबे मन। रासलीलामें प्रवेश करके कृष्णके उपेक्षा-वचन अर्थात् राधार उत्कण्ठा-वाणी, पड़ि' आपने बाखानि, उदासीनता पूर्ण वचनोंको श्रवण करके 'कृष्णने उनका कृष्णमाधुर्य करे आस्वादन ॥ 39 ॥ त्याग कर दिया' -इसे सत्य मानकर कृष्णको रोषसहित अनुवाद - श्रीराधाके भावोंकी तरङ्गोंपर डूबते-उतराते वचन कह रही हैं, -"ओहे नागर, बोलो, इस त्रिजगत्में महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें यह कहा और फिर उनका जितनी योग्य नारियाँ हैं, तुम्हारी वेणु किसको आकर्षित मन उत्कण्ठाके सागरमें डूब गया। महाप्रभु श्रीराधिकाकी नहीं करती? जगत्में तुम्हारे द्वारा वेणुध्वनि करनेपर, उत्कण्ठामयी वाणीको पढ़कर श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन वह [ध्वनि] मन्त्रादि-सिद्धा योगिनीरूपमें दूती बनकर करते हुए स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ ३९ ॥ नारियोंके मनको मोहित (प्रलोभित) करती है एवं उनकी अतिशय उत्कण्ठा बढ़ाकर (पति और गुरुजनों मधुरविग्रह मदनमोहन :- आदिकी सेवारूपी) वेद-विहित पथका परित्याग करवाकर गोविन्दलीलामृत (8/5) में- (परकीया-कान्ताभावमें) उन्हें तुम्हारे पास समर्पित नदज्ज्वलदनिस्वनः श्रवणकर्षिसञ्छिञ्जितः करती है। वह वेणुध्वनि और आपका कटाक्षरूपी सनर्मरससूचकाक्षरपदार्थभङ्ग्युक्तिकः। कामबाणके द्वारा हमें विद्ध करना, हमें धर्मपथ और रमादिक-वराङ्गणा-हृदयहारि-वंशीकलः लज्जा-भयसे छुड़ाकर तुम्हारे निकट ले आये हैं। स मे मदनमोहनः सखि तनोति कर्णस्पृहाम् ॥ 40 ॥ किन्तु पति-त्यागादि दोष दिखलाकर और करवाकर अब तुम धार्मिक व्यक्तिकी भाँति हमें धर्मकी शिक्षा दे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ रहे हो ! तुम्हारा मन-एक प्रकारका, बात - दूसरी अमृतप्रवाह भाष्य - हे सखि, जिनके कण्ठका स्वर प्रकारकी और आचरण-तीसरे प्रकारका है। यह मेघके [मन्दगर्जनकी] भाँति गम्भीर है, जिनके आभूषणोंका सब - शठताकी परिपाटी (कुशलतामात्र) है; तुम तो शब्द कानोंको आकर्षित करता है, जिनके नर्म-वचनोंमें परिहास करना जानते हो, किन्तु उससे नारियोंका अनेक प्रकारकी परिपाटी है, जिनकी मुरलीध्वनि लक्ष्मी सर्वनाश होता है, इसलिये इस सब कपटताको छोड़ो। आदि स्त्रियोंके हृदयको आकर्षित करती है, वे मदनमोहन एक तो वेणुनादरूपी अमृतका घोल, उसपर तुम्हारी मेरे कानोंकी स्पृहाको वर्धित कर रहे हैं ॥ 40 ॥ वाक्यामृतरूपी मीठी-बोली, फिर उसपर भी अमृतके अनुभाष्य- समान तुम्हारे आभूषणोंकी ध्वनि, - ये तीन प्रकारके हे सखि, नदज्ज्वलदनिस्वनः (नदतः गर्जनशीलस्य जलदस्य अमृत मिलकर हमारे कान, मन और प्राणोंका हरण मेघस्य निस्वनः इव गम्भीरकण्ठध्वनिः यस्य सः) श्रवणकर्षिसत् कर रहे हैं।" शिञ्जितः (गोपीकर्णस्य कर्षणे शीलं यस्य तत् सच्छिञ्जितः 'शिञ्जित,' - ध्वनि ॥ 33-38 ॥ सुमधुरं भूषणानां ध्वनिः यस्य सः) सनर्मरससूचकाक्षर-