श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 17/33-40 सतरहवाँ अध्याय 423 वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत-समान मिठा-बोले, अनुभाष्य- 'घोलेले,'-साधारण भाषामें 'घोल खिलाती अमृत-समान भूषण-शिञ्जित। है' अर्थात् आच्छादन अथवा पराजित करती है; तिन अमृते हरे काण, हरे मन, हरे प्राण, पाठान्तरमें 'रोले' अर्थात् शोरसे, शब्दसे; पाठान्तरमें केमने नारी धरिबेक चित? ?" 38 ॥ 'उगारे' अर्थात् डकारती है ॥ ३८ ॥ श्रीराधाभावमें महाप्रभुका श्रीकृष्णमाधुर्यका आस्वादन :- अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 33-38 ॥ एत कहि' क्रोधावेशे, भावेर तरङ्गे भासे, अमृतप्रवाह भाष्य - गोपियाँ भावमें आविष्ट होकर उत्कण्ठा-सागरे डुबे मन। रासलीलामें प्रवेश करके कृष्णके उपेक्षा-वचन अर्थात् राधार उत्कण्ठा-वाणी, पड़ि' आपने बाखानि, उदासीनता पूर्ण वचनोंको श्रवण करके 'कृष्णने उनका कृष्णमाधुर्य करे आस्वादन ॥ 39 ॥ त्याग कर दिया' -इसे सत्य मानकर कृष्णको रोषसहित अनुवाद - श्रीराधाके भावोंकी तरङ्गोंपर डूबते-उतराते वचन कह रही हैं, -"ओहे नागर, बोलो, इस त्रिजगत्में महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें यह कहा और फिर उनका जितनी योग्य नारियाँ हैं, तुम्हारी वेणु किसको आकर्षित मन उत्कण्ठाके सागरमें डूब गया। महाप्रभु श्रीराधिकाकी नहीं करती? जगत्में तुम्हारे द्वारा वेणुध्वनि करनेपर, उत्कण्ठामयी वाणीको पढ़कर श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन वह [ध्वनि] मन्त्रादि-सिद्धा योगिनीरूपमें दूती बनकर करते हुए स्वयं उसकी व्याख्या करने लगे ॥ ३९ ॥ नारियोंके मनको मोहित (प्रलोभित) करती है एवं उनकी अतिशय उत्कण्ठा बढ़ाकर (पति और गुरुजनों मधुरविग्रह मदनमोहन :- आदिकी सेवारूपी) वेद-विहित पथका परित्याग करवाकर गोविन्दलीलामृत (8/5) में- (परकीया-कान्ताभावमें) उन्हें तुम्हारे पास समर्पित नदज्ज्वलदनिस्वनः श्रवणकर्षिसञ्छिञ्जितः करती है। वह वेणुध्वनि और आपका कटाक्षरूपी सनर्मरससूचकाक्षरपदार्थभङ्ग्युक्तिकः। कामबाणके द्वारा हमें विद्ध करना, हमें धर्मपथ और रमादिक-वराङ्गणा-हृदयहारि-वंशीकलः लज्जा-भयसे छुड़ाकर तुम्हारे निकट ले आये हैं। स मे मदनमोहनः सखि तनोति कर्णस्पृहाम् ॥ 40 ॥ किन्तु पति-त्यागादि दोष दिखलाकर और करवाकर अब तुम धार्मिक व्यक्तिकी भाँति हमें धर्मकी शिक्षा दे अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ रहे हो ! तुम्हारा मन-एक प्रकारका, बात - दूसरी अमृतप्रवाह भाष्य - हे सखि, जिनके कण्ठका स्वर प्रकारकी और आचरण-तीसरे प्रकारका है। यह मेघके [मन्दगर्जनकी] भाँति गम्भीर है, जिनके आभूषणोंका सब - शठताकी परिपाटी (कुशलतामात्र) है; तुम तो शब्द कानोंको आकर्षित करता है, जिनके नर्म-वचनोंमें परिहास करना जानते हो, किन्तु उससे नारियोंका अनेक प्रकारकी परिपाटी है, जिनकी मुरलीध्वनि लक्ष्मी सर्वनाश होता है, इसलिये इस सब कपटताको छोड़ो। आदि स्त्रियोंके हृदयको आकर्षित करती है, वे मदनमोहन एक तो वेणुनादरूपी अमृतका घोल, उसपर तुम्हारी मेरे कानोंकी स्पृहाको वर्धित कर रहे हैं ॥ 40 ॥ वाक्यामृतरूपी मीठी-बोली, फिर उसपर भी अमृतके अनुभाष्य- समान तुम्हारे आभूषणोंकी ध्वनि, - ये तीन प्रकारके हे सखि, नदज्ज्वलदनिस्वनः (नदतः गर्जनशीलस्य जलदस्य अमृत मिलकर हमारे कान, मन और प्राणोंका हरण मेघस्य निस्वनः इव गम्भीरकण्ठध्वनिः यस्य सः) श्रवणकर्षिसत् कर रहे हैं।" शिञ्जितः (गोपीकर्णस्य कर्षणे शीलं यस्य तत् सच्छिञ्जितः 'शिञ्जित,' - ध्वनि ॥ 33-38 ॥ सुमधुरं भूषणानां ध्वनिः यस्य सः) सनर्मरससूचकाक्षर-
424 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/40-48 ] पदार्थ-भङ्ग्युक्तिकः (नर्मणा सह वर्त्तमानैः रससूचकैः अक्षरैः पदार्थानां भङ्गी परिपाटी यस्यां तथाभूता उक्तिः यस्य सः) रमादिकवराङ्गनाहृदयहारी-वंशीकलः (रमादिक-वराङ्गनानां लक्ष्मादि-श्रेष्ठरमणीनां हृदयहारिहृदयाकर्षी वंश्याः कलः शब्दः यस्य सः) मदनमोहनः मे (मम) कर्णस्पृहां (श्रवणाभिलाषं) तनोति (वर्धयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 40 ॥ श्लोकार्थ; श्रीकृष्णकी कण्ठध्वनिके माधुर्यका वर्णन :- पुनर्यथा राग- “कण्ठेर गम्भीर ध्वनि, नवघन-ध्वनि जिनि', यार गाने कोकिल लाज पाय। तार एक श्रुति-कणे, डुबाय जगतेर काणे, पुनः काण बाहुड़ि' ना आय॥ 41 ॥ कह सखि, कि करि उपाय? कृष्णेर से शब्द-गुणे, हरिले आमार काणे, एबे ना पाय, तृष्णाय मरि' याय॥ 42 ॥ ध्रु ॥ श्रीकृष्णकी नूपुरकी ध्वनिके माधुर्यका वर्णन :- नूपुर-किङ्किणी-ध्वनि, हंस-सारस जिनि', कङ्कन-ध्वनि चटके लाजाय ! एकबार येइ सुने, व्यापि' रहे तार काणे, अन्यशब्द से काणे ना याय॥ 43 ॥ श्रीकृष्णके वचन-माधुर्यका वर्णन :- से श्रीमुख-भाषित, अमृत हैते परामृत, स्मित-कर्पूर ताहाते मिश्रित। शब्द, अर्थ,-दुइ शक्ति, नाना रस करे व्यक्ति, प्रत्यक्षर-नर्म-विभूषित ॥ 44 ॥ से अमृतेर एककण, कर्ण-चकोर जीवन, कर्ण-चकोर जीये सेइ आशे। भाग्यवशे कभु पाय, अभाग्ये कभु ना पाय, ना पाइले मरये पियासे ॥ 45 ॥ वेणुध्वनिके माधुर्यका वर्णन :- येबा वेणु-कलध्वनि, एकबार ताहा शुनि', जगन्नारी-चित्त आउलाय। नीवि-बन्ध पड़े खसि', बिना-मूले हय दासी, बाउली हञा कृष्णपाशे धाय॥ 46 ॥ लक्ष्मीमें भी श्रीकृष्णमाधुर्य-आस्वादनका लोभ, किन्तु असमर्थ्य :- येबा लक्ष्मीठाकुराणी, तैं हो ये काकली शुनि', कृष्ण-पाश आइसे प्रत्याशाय। ना पाय कृष्णेर सङ्ग, बाड़े तृष्णा-तरङ्ग, तप करे, तबु नाहि पाय॥ 47 ॥ श्रीकृष्णसेवाविहीन कानोंकी निन्दा :- एइ शब्दामृत चारि, यार हय भाग्य भारि, सेइ कर्णे इहा करे पान। इहा येइ नाहि सुने, से काण जन्मिल केने, काणाकड़ि-सम सेइ काण॥" 48 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 41-48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नवीन मेघकी ध्वनिको पराजित करते हुए जिनके कण्ठकी गम्भीर ध्वनि विराजमान है; जिनके मीठे गानसे कोयल भी लज्जित होती है, -जिनका सामान्य थोड़ा-सा भी शब्द कानके भीतर जानेपर जगत्के (अन्यान्य) शब्दको ऐसा निमग्न (पराजित) करता है कि वह शब्द लौटकर नहीं आ पाता; हे सखि, कृष्णके उसी शब्द-गुणसे मेरा कान अपहृत हुआ है, अब उसे सुन नहीं पानेके कारण मैं तृष्णासे मर रही हूँ। उनके नूपुर और किङ्किणीकी ध्वनि हंस-सारसके स्वरको भी पराजित करती है, उनके कङ्कनकी ध्वनि चटक पक्षीको भी लज्जित करती है। जिनके कानमें वह एक बार भी प्रवेश करती है, वह अन्य किसी शब्दको कानमें प्रवेश ही नहीं करने देती। कृष्णके वचनकी माधुरी-अमृतकी अपेक्षा और भी परम अमृतमयी है; उसपर भी वह हास्यरूपी कर्पूरसे मिश्रित है; वह शब्दकी शक्ति, अर्थकी शक्ति और शृङ्गार आदि अनेक रसोंकी व्यञ्जना करती है एवं उसका प्रत्येक अक्षर-नर्म अर्थात् परिहास-भूषित है। उस अमृतका एक कण (बिन्दु)-कर्णरूपी चकोरका
[ 17/41-51 सतरहवाँ अध्याय 425 जीवन-स्वरूप है; उसकी आशामें ही कर्ण-चकोर जीवित रहता है; कभी तो भाग्यवशतः उसे प्राप्त करता है, कभी अभाग्यवशतः उसे प्राप्त नहीं कर पाता; जब प्राप्त नहीं कर पाता, तब प्याससे वह मरणापन्न हो जाता है। पुनः उनकी वेणुकी मधुरध्वनि एकबार सुननेपर जगत्की नारियोंका चित्त शिथिल हो जाता है, नाड़ेका बन्धन ढीला पड़ जाता है एवं वे बिना मूल्यकी दासी होकर पागलोंकी भाँति कृष्णकी ओर दौड़ पड़ती हैं। और भी लक्ष्मी ठाकुराणी उनकी मुरलीकी ध्वनि श्रवण करके प्रत्याशासे कृष्णके निकट आकर भी कृष्णके सङ्गको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उनकी तृष्णा-तरङ्ग और बढ़ जाती है; उसीकी आशासे वे तपस्या करके भी कृष्णको प्राप्त नहीं कर पातीं। ये चार प्रकारके शब्दामृत अर्थात् वचन, नूपुर-कङ्कणका शब्द, कण्ठकी ध्वनि और मुरलीध्वनि भाग्यवान् लोगोंके कानोंमें ही प्रवेश करते हैं। जिनके कानोंमें इन चार प्रकारके शब्दामृतने प्रवेश नहीं किया, उन कानोंका जन्म ही व्यर्थ है; कानी-कौड़ीकी भाँति वे कान-निरर्थक हैं। अनुवाद-इस प्रकार विलाप करते-करते महाप्रभुके मनमें उद्वेग और भाव उदित हो आये, उनका मन निराश्रय होकर व्याकुल हो गया। उनमें उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति और स्मृति आदि अनेक सञ्चारी भाव एक साथ मिलित होकर उदित हो आये। भाव-शाबल्यसे [सञ्चारी भावोंमें परस्पर युद्ध होनेपर पूर्ववर्ती भावको दबाकर दूसरे भावका उदय होनेसे] श्रीराधाके मुखसे निकली वाणी लीलांशुक श्रीबिल्वमङ्गल ठाकुरके हृदयमें स्फुरित हुई थी। महाप्रभुने भी श्रीराधाके उन्हीं भावोंमें विभावित एक श्लोकका पाठ किया। महाप्रभु उन्मादकी अवस्थामें उस श्लोकका ऐसा अर्थ करने लगे, जिसे इस जगत्का कोई भी व्यक्ति नहीं जानता था॥ 49-50॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लीलांशुक',-बिल्वमङ्गल गोस्वामी॥ 50॥ अनुभाष्य-[लीलाशुकेके] पाठान्तरमें, -लीलासुख ॥ 50 ॥ 'घटक',-एक प्रकारका पक्षी। 'शब्द, अर्थ, दुइ शक्ति', - 'अभिधा' और 'लक्षणा', ये दो शब्दकी शक्तियाँ हैं; उनमें अर्थालङ्कार आदि ही अर्थशक्ति है॥ 41-48॥ श्रीराधाकी उक्ति :- बिल्वमङ्गल-कृत कृष्णकर्णामृतमें (42 वाँ श्लोक)- किमिह कृणुमः कस्य ब्रूमः कृतं कृतमाशया कथयत कथमन्यां धन्यामहो हृदयेशयः। मधुरमधुरस्मेराकारे मनो नयनोत्सवे कृपणकृपणा कृष्णे तृष्णा चिरं बत लम्बते॥ 51॥ महाप्रभुका भाव-शाबल्य :- करिते ऐछे विलाप, उठिल उद्वेग, भाव, मने काहो नाहि आलम्बन । उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति, स्मृति, नानाभावेर हइल मिलन॥ 49॥ श्रीकृष्ण विरहोन्माद :- भावशाबल्ये राधार उक्ति, लीलाशुके हैल स्फूर्ति, सेइ भावे पड़े एक श्लोक । उन्मादेर सामर्थ्ये, सेइ श्लोकेर करे अर्थे, येइ अर्थ नाहि जाने लोक॥ 50॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 51॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हाय, मैं क्या करूँ ! किसको कहूँ! उसकी आशामें मैंने जो किया है, सो किया, अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ। (कामरूपमें) वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव उनकी बात करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवरूप कृष्णमें मेरी दैन्यभावमयी (दीन) तृष्णा सर्वदा वृद्धिका अवलम्बन कर रही है (बढ़ रही है) ॥ 51॥ अनुभाष्य-
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426 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/51-53 ] हे सख्यः, [तत्] इह (विप्रलम्भे वैशसे) किं कृणमः [येन तद्दर्शनं स्यात्?] कस्य ब्रूमः [यूयम् अपि तुल्यावस्थाः एव, तस्य] आशया (कृष्णलाभाशया) यत्कृतम् (अनुष्ठितं), तत् कृतम्; अन्यां (कामपि) धन्यां (पुण्यां) कथां कथयत; अहो (कष्टम्) हृदयेशयः (कामः शत्रुः मम हृदयमध्ये वसतीति न त्याज्यः अतः अयमेव मां मारयतीति किं कुर्मः?) बत (खेदे) मधुरमधुरस्मेराकारे (मधुरादपि मधुरः स्मेरः मदनमदादिभिः उत्फुल्लश्च आकारः आकृतिः यस्य तस्मिन्) मनोनयनोत्सवे (मनोनयनयोः उत्सव यस्मात् तस्मिन्) कृष्णे कृपणकृपणा (कृपणादपि कृपाणा उत्कण्ठया सुकातरा) तृष्णा चिरम् (अनुक्षणं) लम्बते (वर्धते)। श्लोक-भावानुवाद—हे सखि! इस विरहके कष्टमें हाय, मैं क्या करूँ (जिससे उनका दर्शन मिले)? किसको कहूँ (तुम भी तो मेरे समान विरहमें दुःखी हो)! कृष्णको पानेकी आशामें मैंने जो किया है, सो किया, अब अन्य कोई अच्छी बात बतलाओ। (कामरूपमें) वे ही मेरे हृदयमें सोये हुए हैं, अतएव उनकी बात करना मैं किस प्रकार छोड़ूँ? उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवस्वरूप कृष्णमें मेरी दैन्यभावमयी (दीन) तृष्णा प्रतिक्षण वर्धित हो रही है॥ 51 ॥ अमृतानुकणिका—पहले आवेगके उदय होनेके कारण श्रीराधा कह रही हैं,―'हे सखियों! इस विपदाके समय मैं अब क्या करूँ, जिससे उनके दर्शन प्राप्त हों।' उसके पश्चात् सखियोंको भी दुःखी देखकर चिन्ताके उदय होनेपर कह रही हैं,―'किसको कहूँ, क्योंकि सखियाँ भी मेरे समान दुःखी हैं, मेरा और कौन है, किससे पूछूँ, कौन मेरे मङ्गलका उपाय बतलायेगा?' उसी समय चिन्ताको आच्छादित करके 'मति' नामक भावके उदय होनेपर पिङ्गलाके वचनके ('आशा ही परमं दुःखं'के) समान कह रही हैं,—'कृष्णप्राप्तिकी आशामें जो किया, सो किया, और कुछ करनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है। अर्थात् जो कुछ भी किया, वह सब व्यर्थ ही था, इसलिये उस आशाका परित्याग करना ही उचित है।' उसी समय 'अमर्ष'के उदय होनेपर एक सखीसे कह रही हैं,―'उन अकृतज्ञ कृष्णकी बातको छोड़कर तुम अन्य कोई पुण्य बात बोलो।' उसी समय ही हृदयमें कृष्णकी स्फूर्ति होते ही उन्हें बाणके द्वारा बींधनेवाले कामदेव मानकर उस अमर्षभावको आच्छादित करके 'त्रास'के उदय होनेपर व्याकुलता सहित कह रही हैं,―'हाय! कैसा कष्ट! जिनको छोड़नेका विचार कर रही हूँ, वे ही मेरे हृदयमें शयन कर रहे हैं, वह शत्रु काम मुझे पीड़ा दे रहा है, अब क्या करूँ?' उसके पश्चात् उस व्याकुलताको आच्छादित करके स्वाभाविक औत्सुक्यके उदय होनेपर कह रही हैं,―'वेश्या पिङ्गलाने भी नैराश्यको ही परम सुखका विषय कहा है, किन्तु हम श्रीकृष्णके विषयमें इस प्रकारकी आशाको त्याग करनेमें असमर्थ हैं। परित्यागकी बात तो दूर रहे, अपितु उन मधुर-हास्य-मूर्ति मन और नयनके उत्सवस्वरूप (आनन्दप्रदायक) कृष्णके प्रति तृष्णा प्रतिक्षण ही वर्धित हो रही है। वह तृष्णा दीन होनेपर भी उत्कण्ठावशतः अतिदीन हो रही है।'―(श्रील कविराज गोस्वामी टीका) ॥ 51 ॥ श्लोकार्थ; श्रीमतीकी श्रीकृष्णविरह-व्याकुलताका वर्णन :- यथा राग- “एइ कृष्णेर विरहे, उद्वेगे मन स्थिर नहे, प्राप्त्युपाय चिन्तन ना याय। येबा तुमि सखीगण, विषादे बाउल मन, कारे पुछौं, के कहे उपाय ?? 52 ॥ अनुवाद—“इन श्रीकृष्णके विरहमें उद्विग्न होनेके कारण मेरा मन स्थिर नहीं है, मैं उनकी प्राप्तिके उपायका भी चिन्तन नहीं कर पा रही हूँ। हे मेरी सखियों! विषादके कारण तुम्हारा मन भी पागल जैसा हो गया है, किससे पूछें, हमें कौन कोई उपाय बता सकता है ?52 ॥ हाहा सखि, कि करि उपाय! क्या करौं, काँहा याङ, काँहा गेले कृष्ण पाङ, कृष्ण बिना प्राण मोर याय ॥”53 ॥
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[ 17/53-58 सतरहवाँ अध्याय 427 अनुवाद—हाय-हाय! सखि, क्या उपाय करूँ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मुझे कहाँ जानेपर श्रीकृष्ण मिलेंगे? श्रीकृष्णके बिना तो मेरे प्राण ही निकले जा रहे हैं॥” 53 ॥ निराशाकी आकाङ्क्षा और आदर :— क्षणे मन स्थिर हय, तबे मने विचारय, बलिते हइल भावोद्गम। पिङ्ग्लार वचन-स्मृति, कराइल भाव-मति, ताते करे अर्थ-निर्धारण ॥ 54 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका मन क्षण भरके लिये स्थिर हो गया और उन्होंने मनमें कुछ विचार किया। वे जब कुछ बोलने लगे, तब उनमें एक भाव उत्पन्न हुआ जिसने उन्हें पिङ्गलाके वचनका स्मरण करा दिया। तब वे पिङ्गलाके वचनका अर्थ-निर्धारण करने लगे॥ 54 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पिङ्ग्लार वचनकी स्मृति,'—पिङ्गला वेश्याने जो कहा था,—“आशा हि परमं दुखं, नैराश्यं परमं सुखम्” [अर्थात् इस संसारमें आशा ही मनुष्योंके परम दुःख और आशाका त्याग ही परम सुखका कारण होता है]। उस बातको स्मरण करके महाप्रभुमें भावका उदय हुआ और वे उसका अर्थ निर्धारित करने लगे॥ 54 ॥ अनुभाष्य—'पिङ्गलोपाख्यान'—भाः 11/8/22-44 संख्या एवं महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वका 174 वाँ अध्याय देखें॥ 54 ॥ श्रीकृष्ण-विस्मरणकी चेष्टा :— “देखि एइ उपाये, कृष्ण-आशा छाड़ि दिये, आशा छाड़िले सुखी हय मन। छाड़ि' कृष्णकथा अधन्य, कह अन्यकथा धन्य, याते हय कृष्णविस्मरण ॥” 55 ॥ श्रीकृष्णके द्वारा अप्राकृत कामदेवके स्वरूपमें हृदयपर अधिकार :— कहिते हइल स्मृति, चित्ते हैल कृष्णस्फूर्त्ति, सखीरे कहे हञा विस्मिते। “यारे चाहि छाड़िते, से शुञा आछे चित्ते, कोन रीते ना पारि छाड़िते ॥” 56 ॥ राधाभावेर स्वभाव आन, कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान, काम-ज्ञाने त्रास हैल चित्ते। कहे, “ये जगत् मारे, से पशिल अन्तरे, एइ वैरी ना देय पासरिते ॥” 57 ॥ अनुवाद—“मैं एक उपाय देख रही हूँ कि श्रीकृष्णकी प्राप्तिकी आशाको ही छोड़ दिया जाय। उस आशाको छोड़नेसे मन सुखी हो जायेगा। दुःख प्रदान करनेवाली कृष्णकथाको छोड़कर कोई अन्य सुखप्रद कथा सुनाओ, जिससे श्रीकृष्णका विस्मरण हो सके।” ऐसा कहते ही श्रीमती राधिकाको श्रीकृष्णका स्मरण हो आया और चित्तमें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति हो आयी। वे विस्मित होकर सखियोंसे कहने लगीं,—“मैं जिन्हें छोड़ना चाहती हूँ, वे तो मेरे हृदयमें शयन कर रहे हैं, मैं किसी भी प्रकारसे उन्हें छोड़ नहीं सकती।” श्रीराधाके स्वभावने उन्हें बोध करवा दिया कि श्रीकृष्ण साक्षात् कामदेव हैं और मनमें ऐसा भाव आते ही उनका चित्त भयभीत हो उठा। वे कहने लगीं,—“यह कामदेव जो समस्त जगत्को परास्त करता है और मेरे हृदयमें प्रवेश कर गया है, वह वैरी मुझे श्रीकृष्णको भुलाने नहीं देता!” 55-57 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कृष्णे कराय 'काम'-ज्ञान,'— कृष्णको कन्दर्प बोध कराता है॥ 57 ॥ अनुभाष्य—'मारे',—'मार' अर्थात् कामदेवके रूपमें पराजित करता है॥ 57 ॥ श्रीकृष्णके लिये उत्सुकता :— औत्सुक्येर प्राधान्य, जिनि' अन्य भाव-सैन्य, उदय हैल निज राज्य-मने। मने हइल लालस, ना हय आपन-वश, दुःखे मने करेन भर्त्सने ॥ 58 ॥
428 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/58-65 ] श्रीमतीकी श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :- “मन मोर वाम-दीन, जल बिना येन मीन, कृष्ण बिना क्षणे मरि' याय। मधुर हास्य वदने, मन-नेत्र-रसायने, कृष्णतृष्णा द्विगुण बाड़ाय ॥ 59 ॥ अनुवाद—तभी अन्य समस्त भावोंरूपी सेनाको परास्त करके औत्सुक्य (उत्सुकता) भाव प्रधान हो गया और वह उनके अपने राज्यरूपी मनमें उदित हुआ। औत्सुक्यके कारण श्रीराधा मनमें श्रीकृष्ण प्राप्तिकी लालसासे अवश हो गयीं, इसी दुःखसे वे मनमें अपनी भर्त्सना करने लगीं,–“वाम्य-स्वभावके कारण मेरा मन दीन हो रहा है, श्रीकृष्णके बिना यह जलके बिना मछलीके समान एक क्षणमें ही मर जायेगा। किन्तु दूसरी ओर मैं जब श्रीकृष्णका दर्शन करती हूँ तो उनका मधुर हास्यसे युक्त मुखमण्डल, जो मन और नेत्रोंके लिये रसायनस्वरूप है, उनको प्राप्त करनेकी तृष्णाको दोगुना बढ़ा देता है॥ 58-59॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वाम-दीन’,—वाम्यभावप्रयुक्त दीन; मन और नेत्रके रसायनस्वरूप मधुरहास्य मुखवाले कृष्णमें दोगुनी तृष्णाको बढ़ाता है॥ 59 ॥ श्रीकृष्णविरहमें विलाप :- हाहा कृष्ण प्राणधन, हाहा पद्मलोचन, हाहा दिव्य सद्गुण-सागर। हाहा श्यामसुन्दर, हाहा पीताम्बरधर, हाहा रासविलास नागर !॥60॥ विरहिणी राधाके भावमें महाप्रभुका दौड़ना :- काँहा गेले तोमा पाइ, तुमि कह,–ताँहा याइ,” एत कहि' चलिला धाञा। स्वरूप उठि' कोले करि', प्रभुरे आनिल धरि', निज स्थाने बसाइला निया॥ 61॥ अनुवाद—राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके विरहमें विलाप करते हुए कहने लगे,—“हा हा प्राणधन कृष्ण! हा हा कमलनयन! हा हा दिव्य सद्गुण-सागर! हा हा श्यामसुन्दर! हा हा पीताम्बरधारी! हा हा रासविलास नागर! तुम ही बताओ कि कहाँ जानेसे तुम मुझे मिलोगे, मैं वहीं चली जाऊँगी।” महाप्रभु यह कहकर दौड़ने लगे। श्रीस्वरूप दामोदरने उठकर महाप्रभुको पकड़कर गोदमें ले लिया और उन्हें वापस लाकर उनके स्थानपर बैठा दिया॥ 60-61॥ श्रीस्वरूपकी चेष्टासे चेतनताकी प्राप्ति; श्रीस्वरूपके द्वारा भावोपयोगी-गान :- क्षणेके प्रभुर बाह्य हैला, स्वरूपेरे आज्ञा दिला, “स्वरूप, किछु कर मधुर गान।” स्वरूप गाय विद्यापति, गीतगोविन्द-गीति, शुनि' प्रभुर जुड़ाइल काण॥ 62॥ अनुवाद—महाप्रभु अचानक बाह्यदशामें आ गये और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको कहा,—“हे स्वरूप! कुछ मधुर गान सुनाओ।” श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीविद्यापति द्वारा रचित गीत और श्रीगीतगोविन्दकी गीतिका गान किया। गान सुनकर महाप्रभुके कान शीतल हो गये॥ 62॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव—मर्त्यबुद्धिके द्वारा उन्हें समझना असम्भव :- एइमत महाप्रभु प्रतिरात्रि-दिने। उन्माद-चेष्टित हय प्रलाप-वचने॥ 63॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रति रात-दिन महाप्रभुकी चेष्टाएँ उन्मादग्रस्त व्यक्तिकी भाँति होतीं और प्रलापमय वचन होते॥ 63॥ एकदिने यत हय भावेर विकार। सहस्र मुखेते वर्णे यदि, नाहि पाय पार॥ 64॥ जीव दीन कि करिबे, ताहार वर्णन। शाखा-चन्द्र-न्याय करि' दिग्दर्शन॥ 65॥ अनुवाद—महाप्रभुमें एक ही दिनमें जितने भावोंके
[ 17/64-72 सतरहवाँ अध्याय 429 विकार उत्पन्न होते, जब अनन्तदेव केवल उन्हींका सैकड़ों मुखोंसे वर्णन करके भी उनका पार नहीं पा सकते, तब मेरे जैसा दीन-हीन जीव उनका क्या वर्णन करेगा? मैं तो केवल शाखाचन्द्र-न्यायकी भाँति दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 64-65 ॥ अनुभाष्य—श्रीगौराङ्गकी दिव्योन्माद-चेष्टा विषयिणी लीला वर्णन करनेमें सहस्र मुखोंसे अनन्त-शक्तिमान् अनन्तदेव भी समर्थ नहीं हैं; मैं—दीन शक्तिहीन, अत्यन्त असमर्थ जीव हूँ, इसलिये सम्पूर्ण रूपसे गौरलीलाका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हुआ हूँ; तथापि दिशा निरूपित करनेके लिये मैंने शाखाचन्द्रन्याय-मात्रका आश्रय लिया है॥ 65 ॥ महाप्रभुके दिव्योन्माद-श्रवणसे प्रेमतत्त्वके ज्ञानका उदय :— इहा येइ शुने, तार जुड़ाय मन-काण। अलौकिक गूढ़प्रेम चेष्टा हय ज्ञान॥ 66 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दिव्योन्मादके विषयमें जो कुछ मैंने संक्षेपमें वर्णन किया है, उसे जो भी श्रवण करता है उसके कान और मन आनन्दित हो जाते हैं एवं उसे अलौकिक गूढ़ कृष्णप्रेमकी चेष्टाओंको समझनेकी योग्यता प्राप्त हो जाती है॥ 66 ॥ श्रीमतीके भावमें महाप्रभुके द्वारा स्वयं श्रीकृष्णप्रेमका आस्वादन और जीवोंमें उसका वितरण :— अद्भुत निगूढ़ प्रेमेर माधुर्य-महिमा। आपनि आस्वादि' प्रभु देखाइला सीमा॥ 67 ॥ अनुवाद—प्रेमके माधुर्यकी महिमा आश्चर्यजनक रूपसे निगूढ़ है। महाप्रभुने उसका स्वयं आस्वादन करके उसकी सीमाको दिखलाया है॥ 67 ॥ महावदान्य और श्रीकृष्णप्रेम-प्रदाता :— अद्भुत-दयालु चैतन्य—अद्भुत-वदान्य। ऐछे दयालु दाता लोके शुने नाहि अन्य॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु अद्भुत दयालु हैं और अद्भुत उदार हैं। हमने इस जगत्में उनके अतिरिक्त किसी ऐसे दयालु दाताके विषयमें नहीं सुना है॥ 68 ॥ श्रीचैतन्यके भजनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य-चरण। याहा हैते पाइबा कृष्णप्रेमामृत-धन॥ 69 ॥ अनुवाद—आप सब श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका सभी प्रकारसे एकान्तिक भजन कीजिये, जिससे आपको कृष्णप्रेमामृतरूपी धनकी प्राप्ति होगी॥ 69 ॥ अनुभाष्य—'सर्वभावे',—सब प्रकारसे, एकान्त भावसे॥ 69 ॥ महाप्रभुका दिव्योन्माद (उद्घूर्णा और चित्रजल्प) वर्णित :— एइ त' कहिलुँ प्रभुर 'कूर्माकृति'-भाव। उन्माद-चेष्टित ताते उन्माद-प्रलाप॥ 70 ॥ अनुवाद—मैंने महाप्रभुकी भावावस्थामें प्रकाशित कूर्माकृतिका वर्णन किया है, जिसमें उनकी उन्मादग्रस्त चेष्टाओं और उन्माद-प्रलापका भी वर्णन हुआ है॥ 70 ॥ श्रीरघुनाथके द्वारा स्वरचित ग्रन्थमें महाप्रभुकी यह लीला-वर्णित :— एइ लीला स्वग्रन्थे रघुनाथ-दास। चैतन्यस्तवकल्पवृक्षे करियाछेन प्रकाश॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने स्वरचित चैतन्यस्तव- कल्पवृक्षमें उपरोक्त लीलाको प्रकाशित किया है॥ 71 ॥ (स्तवावलीमें चैतन्यस्तवकल्पवृक्ष स्तवका पाँचवाँ श्लोक)— अनुद्घाट्य द्वारत्रयमुरु च भित्त्रित्रयमहो विलङ्घ्योच्चैः कालिङ्गिकसुरभिमध्ये निपतितः। तनुद्यत्सङ्कोचात् कमठ इव कृष्णोरुविरहात्- विराजन् गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति॥ 72 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 72 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीकाशीमिश्रके घरके] बन्द
430 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/72-73 ] तीनों द्वारोंको खोला नहीं गया, तथापि उस कमरेसे गोदावरी नदी जिस स्थानपर समुद्रसे मिली है, बाहर निकलकर तीन दीवारोंको लाँघकर तैलङ्गी वहाँपर तैलङ्गदेशकी राजधानी 'करिङ्ग' अथवा 'दक्षिण गायोंके बीचमें भूमिपर पड़े हुए और सम्पूर्ण शरीरके कलिङ्ग' अवस्थित थी। तैलङ्गी गायको संस्कृत भाषामें सिकुड़ जानेसे कृष्णविरहमें कछुएकी आकृतिको प्राप्त 'कालिङ्गिक-सुरभि' कहकर लिखा गया है॥72॥ करके जो श्रीगौराङ्गदेव वहाँ विराजमान थे, वे मेरे हृदयमें उदित होकर मुझे उन्मत्त बना रहे हैं॥72॥ सत्रहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सत्रहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥73॥ अनुभाष्य- इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे अहो, [काशीमिश्रगृहे] द्वारत्रयम् अनुद्घाट्य (अनुन्मुच्य) कूर्माकारानुभावोन्मादप्रलापो नाम सप्तदशः परिच्छेदः। उरु (उन्नत) भित्तित्रयं (प्राचीरत्रयं) च उच्चैः विलंघ्य अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी (उल्लङ्घ्य) कालिङ्गिकसुरभिमध्ये (त्रैलङ्गदेशान्तर्गत करिङ्ग- कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका देशोद्भव-गोषु मध्ये) निपतितः कृष्णोरुविरहात् (कृष्णस्य वर्णन कर रहा है॥73॥ विषमविच्छेदात्) तनूद्यत्सङ्कोचात् (तनौ शरीरे उदयन् यः सङ्कोचः खर्वत्वं तस्मात्) कमठः (कूर्मः) इव विराजन् गौराङ्गः मम हृदये उदयन् मां मदयति (आनन्दयति)। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें कूर्माकार-अनुभाव और श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। उन्माद-प्रलाप नामक सत्तरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
अठारहवाँ अध्याय कथासार—शरत् ऋतुकी ज्योत्स्ना रात्रिमें किसी एक दिन महाप्रभु आइतोटासे समुद्रके दर्शन करके उसमें यमुनाके भ्रमवशतः जलमें कूद पड़े;—राधाकृष्णकी जलकेलि-लीलाका आस्वादन ही इस लीलाका तात्पर्य है। इस प्रकार बहते-बहते महाप्रभु कोणार्ककी ओर चले गये। एक मछुवारेने उन्हें 'बड़ी मछली' समझकर उन्हें जालके द्वारा खींचकर देखा कि अचेतन अवस्थामें महाप्रभुकी आकृति अत्यन्त विकृत हो गयी है। महाप्रभुको स्पर्श करने मात्रसे ही उसमें प्रेमका आवेश हो गया। उसे भय हुआ कि उसके (कन्धेके) ऊपर यह भूत आकर बैठ गया है, इसलिये वह ओझाके पास जाने लगा। उसी समय महाप्रभुको अनेक स्थानोंपर नाना प्रकारसे ढूँढ़ते हुए श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदिकी तटके साथ-साथ चलते हुए उस मछुवारेसे भेंट हुई। उससे महाप्रभुके विषयमें पूछनेपर उस मछुवारेने अपना सारा वृत्तान्त बतलाया। तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने देखा कि वह मछुवारा महाप्रभुको तटपर ले आया है। उन्होंने कृष्णनामका थप्पड़ लगाकर मछुवारेको भयरूपी भूतसे छुड़वा दिया। बादमें महाप्रभुको नामकीर्तनके द्वारा सचेतन करके उठाया और उनकी लीला श्रवण करके उन्हें घरमें ले आये। —(अमृतप्रवाह भाष्य) समुद्रको यमुना समझकर उसमें बहनेवाले श्रीकृष्णविरही महाप्रभुकी कृपाकी याचना :— शरज्ज्योत्स्ना-सिन्धोरवकलनया जातयमुना- भ्रमाद्धावन् योऽस्मिन् हरिविरहतापार्णव इव । निमग्नो मूर्च्छानः पयसि निवसन् रात्रिमखिलां प्रभाते प्राप्तः स्वैरवतु स शचीसूनुरिह नः ॥ १ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो शरत्-कालीय [मेघरहित] ज्योत्स्ना-रात्रिमें समुद्रको देखकर यमुनाके भ्रमसे हरिविरहके ताप-समुद्रमें निमग्न होकर जलमें गिरकर सम्पूर्ण रात्रि मूर्च्छित थे और प्रातःकालमें (श्रीस्वरूपादि अपने अन्तरङ्ग भक्तोंके द्वारा) प्राप्त हुए थे, वे शचीनन्दन अपनी लीलाके द्वारा हमारा पालन करें ॥ १ ॥ अनुभाष्य— यः (शचीनन्दनः) शरज्ज्योत्स्ना-सिन्धोः (शरदि शरत्कालीन- मेघरहिते व्योम्नि वा ज्योत्स्ना तया विभावितः यः सिन्धुः तस्य) अवकलनया (सन्दर्शनेन) जातयमुना-भ्रमात् (जातः यः यमुनायाः भ्रमः तस्मात् हेतोः) धावन् हरिविरहतापार्णवे (कृष्णविच्छेदक्लेशसमुद्रे) इव अस्मिन् (पयसि) मूर्च्छानः (निमग्नः सन्) अखिलां (समस्तां) रात्रिं निवसन् प्रभाते स्वैः (स्वीयैः अन्तरङ्गभक्तैः) प्राप्तः, सः शचीसूनुः (गौरः) इह नः (अस्मान्) अवतु (रक्षतु)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, समस्त गौरभक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ महाप्रभुका तीव्र श्रीकृष्णविरह :— एइमते महाप्रभु नीलाचले बैसे। रात्रि-दिने कृष्णविच्छेदार्णवे भासे ॥ ३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें वास करते हुए रात-दिन कृष्णविरहरूपी समुद्रमें निमज्जित रहते थे ॥ ३ ॥
432 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/4-13 ] शारदीय ज्योत्स्ना-रात्रिमें रासलीलाका उद्दीपन :- शरत्कालेर रात्रि, सब चन्द्रिका उज्ज्वल। प्रभु निजगण लञा बेड़ान रात्रिसकल॥४॥ अनुवाद—शरत्-कालकी रात्रिमें पूर्णचन्द्र अपनी किरणोंसे सभी स्थानोंको उज्ज्वल कर रहा था और महाप्रभु अपने निजगणोंके साथ पूरी रात इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे॥४॥ उद्याने उद्याने भ्रमेन कौतुक देखिते। रासलीलार गीत-श्लोक पड़िते शुनिते॥५॥ अनुवाद—महाप्रभु एक उद्यानसे दूसरे उद्यानमें कौतुक देखनेके लिये रासलीलाके गीत और श्लोकोंको पढ़ते और सुनते हुए भ्रमण कर रहे थे॥५॥ कभु प्रेमावेशे करेन गान, नर्त्तन। कभु प्रेमावेशे रासलीलानुकरण॥६॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रेमके आवेशमें कभी गान, तो कभी नृत्य कर रहे थे। और कभी वे प्रेमावेशमें रासलीलाका अनुकरण कर रहे थे॥६॥ कभु भावोन्मादे प्रभु इति-उति धाय। भूमे पड़ि' कभु मूर्च्छा, कभु पड़ि' याय॥७॥ अनुवाद—महाप्रभु कभी भावोन्माद अवस्थामें इधर-उधर दौड़ने लगते, कभी भूमिपर गिर पड़ते, कभी मूर्च्छित हो जाते और कभी भूमिपर लोट-पोट खाने लगते॥७॥ रासलीलार एक श्लोक यबे पड़े, सुने। पूर्ववत् तबे अर्थ करेन आपने॥८॥ अनुवाद—जब महाप्रभु रासलीलाके किसी एक श्लोकको पढ़ते अथवा सुनते, तब पहलेकी भाँति वे स्वयं उसका अर्थ भी करते॥८॥ सम्पूर्ण रासपञ्चाध्यायके पाठ और व्याख्यामें महाप्रभुका एक ही समयमें हर्ष और विषाद :- एइमत रासलीलाय हय यत श्लोक। सबार अर्थ करे, पाय कभु हर्ष-शोक॥९॥ अनुवाद—महाप्रभुने इस प्रकार रासलीलाके पाँचों अध्यायोंमें जितने श्लोक हैं, उन सबका अर्थ किया। वे कभी हर्षित होते, तो कभी शोक करने लगते॥९॥ अनुभाष्य—कृष्णकी सम्भोग-लीलामें 'हर्ष' और गोपियोंकी विप्रलम्भ-लीलामें 'विषाद'॥९॥ ग्रन्थके विस्तारके भयसे उनका वर्णन नहीं करना :- से-सब श्लोकेर अर्थ, से-सब 'विकार'। से-सब वर्णिते ग्रन्थ हय अति विस्तार॥१०॥ अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा वर्णित उन सभी श्लोकोंके अर्थ और महाप्रभुमें उदित होनेवाले समस्त विकारोंका वर्णन करनेपर ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो जायेगा॥१०॥ द्वादश वत्सरे ये ये लीला क्षणे-क्षणे। अति बाहुल्य-भये ग्रन्थ ना कैलुँ लिखने॥११॥ अनुवाद—महाप्रभुने बारह वर्ष श्रीजगन्नाथपुरीमें रहकर क्षण-क्षणमें जो समस्त लीलाएँ कीं, मैंने ग्रन्थके अति वर्धित हो जानेके भयसे उन्हें नहीं लिखा॥११॥ पहले केवल दिग्दर्शन ही निर्दिष्ट :- पूर्वे येइ देखाञाछि दिक्दरशन। तैछे जानिह 'विकार' 'प्रलाप'-वर्णन॥१२॥ अनुवाद—मैंने पहले जिस प्रकार महाप्रभुकी लीलाओंका दिग्दर्शन करवाया है, उसी प्रकार ही महाप्रभुमें प्रकाशित होनेवाले विकार और उनके द्वारा किये गये प्रलापका अब (संक्षेपमें) वर्णन कर रहा हूँ॥१२॥ भगवान् शेष भी महाप्रभुकी लीलाका माप करनेमें असमर्थ :- सहस्र-वदने यबे कहये 'अनन्त'। एकदिनेर लीलार तबु नाहि पाय अन्त॥१३॥
[ 18/13-22 अठारहवाँ अध्याय 433 अनुवाद—यदि अनन्तदेव भी अपने सैकड़ों मुखोंसे महाप्रभुकी केवल एक दिनकी लीलाका वर्णन करने लगें, तो भी वे उन लीलाओंका पूर्ण वर्णन नहीं कर पायेंगे॥ 13 ॥ स्वर्गके श्रेष्ठ लेखक गणेशके लिये भी वह सम्पूर्णतः असम्भव :— कोटियुग पर्यन्त यदि लिखये गणेश। एकदिनेर लीलार तबु नाहि पाय शेष ॥ 14 ॥ अनुवाद—करोड़ों युगों तक यदि गणेश भी लिखें, तो भी वे महाप्रभुकी एक दिनकी समस्त लीलाओंका वर्णन नहीं कर सकते ॥ 14 ॥ गोपियोंके प्रेमके दर्शनसे स्वयं श्रीकृष्णका भी विस्मित होना :— भक्तेर प्रेम-विकार देखि' कृष्णेर चमत्कार। कृष्ण यार ना पाय अन्त, केबा छार आर ?? 15 ॥ अनुवाद—भक्तोंके प्रेम-विकारको देखकर स्वयं श्रीकृष्ण भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण भी जिनका अन्त नहीं पा पाते, तो फिर एक क्षुद्र जीव कैसे उनका पूर्णरूपमें वर्णन कर सकता है ? 15 ॥ गोपीप्रेमको निर्धारित करने और आस्वादनका परिमाण करनेके उद्देश्यसे श्रीकृष्णके द्वारा गोपीभावको स्वीकार करना :— भक्त-प्रेमार ये-दशा, ये-गति-प्रकार। यत दुःख, यत सुख, यतेक विकार ॥ 16 ॥ कृष्ण ताहा सम्यक् ना पारे जानिते। भक्तभाव अङ्गीकारे, ताहा आस्वादिते ॥ 17 ॥ अनुवाद—भक्तकी प्रेमावस्थामें जैसी दशा होती है, जितनी प्रकारकी विभिन्न गतियाँ होती हैं, जितने प्रकारके दुःख-सुख और विकार होते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें सम्पूर्ण रूपसे नहीं जान पाते, इसलिये वे भक्तके भावको अङ्गीकार करके उसका आस्वादन करते हैं॥ 16-17 ॥ श्रीकृष्णप्रेमका अद्भुत विक्रम :— कृष्णेरे नाचाय प्रेमा, भक्तेरे नाचाइ'। आपने नाचये—तिने नाचे एकठानि ॥ 18 ॥ अनुवाद—प्रेम श्रीकृष्णको नचाता है, भक्तोंको नचाता है और स्वयं भी नाचता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण, भक्त और प्रेम—तीनों एक साथ नृत्य करते हैं॥ 18 ॥ श्रीकृष्णमाधुर्यास्वादनरूपी प्रेम—स्वयं भगवान्के वर्णनकी क्षमतासे भी अतीत :— प्रेमार विकार वर्णिते चाहे येइ जन। चान्द धरिते चाहे, येन हञा 'वामन' ॥ 19 ॥ अनुवाद—जो कोई भी व्यक्ति प्रेमके विकारोंका वर्णन करना चाहता है, तो यह ऐसा है जैसे एक बौना व्यक्ति चाँदको पकड़ना चाहता हो ॥ 19 ॥ चित्-परमाणु-कण जीवका अप्राकृत श्रीकृष्णप्रेमसिन्धुके बिन्दुमात्रको ही स्पर्श करनेका अधिकार :— वायु यैछे सिन्धुजलेर हरे एक 'कण'। कृष्णप्रेम-कण तैछे जीवेर स्पर्शन ॥ 20 ॥ क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरङ्ग अनन्त। जीव छार काँहा तार पाइबेक अन्त ?? 21 ॥ अनुवाद—वायु जैसे समुद्रके जलमें-से एक कणको ही ले पाती है, जीव भी वैसे ही कृष्णप्रेमके एक कणको ही स्पर्श कर पाता है। प्रेमकी अनन्त तरङ्गें क्षण-क्षणमें उठती रहती हैं, क्षुद्र-जीव उसका पार कहाँ पा सकता है ? 20-21 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीरामराय आदि श्रीकृष्णशक्तिवर्गका ही महाप्रभुके भावोंकी अनुभूतिमें अधिकार :— श्रीकृष्णचैतन्य याहा करेन आस्वादन। सबे एक जाने ताहा स्वरूपादि 'गण' ॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जिस वस्तुका आस्वादन करते हैं, उसे केवल श्रीस्वरूप दामोदरादि महाप्रभुके अन्तरङ्ग गण ही जानते हैं॥ 22 ॥
434 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/23-30 ] जीव हञा करे येइ ताहार वर्णन। आपना शोधिते तार छोंये एक ‘कण’ ॥ 23 ॥ अनुवाद-जीव होकर भी यदि कोई उस प्रेमविकारका वर्णन करता है, तो वह केवल स्वयंको पवित्र करनेके लिये उसके एक कणको स्पर्श करता है ॥ 23 ॥ गोपियोंके साथ श्रीकृष्णके जलकेलिके श्लोकका पाठ :- एइमत रासेर श्लोक सकल पड़िला। शेषे जलकेलिर श्लोक पड़िते लागिला ॥ 24 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु रासलीलाके समस्त श्लोक पढ़नेके बाद अन्तमें श्रीकृष्णकी जलकेलि लीलाके श्लोक पढ़ने लगे ॥ 24 ॥ श्रीमद्भागवत (10/33/22)में - ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्गसङ्ग- घृष्टस्रजः स कुचकुङ्कुमरञ्जितायाः। गन्धर्वपालिभिरणुद्रुत आविशद्वाः श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्नसेतुः ॥ 25 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हथनियोंके साथ गजराज जिस प्रकार जलक्रीड़ा करता है, उसी प्रकार लोक-धर्मसे अतीत भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ रासलीलामें थककर गन्धर्वपतिके समान भँवरोंके द्वारा अनुगत (पीछे पीछे कुन्दमालाकी गन्धसे आकृष्ट) होकर श्रमको दूर करनेकी आशासे जलमें प्रवेश किया। उस समय गोपियोंके कुच-कुङ्कुमसे रञ्जित माला उनके अङ्गसङ्गके द्वारा मर्दित हुई थी ॥ 25 ॥ अनुभाष्य-शुद्धचित्त परीक्षितके निकट महाभागवत परमहंसकुल-चूड़ामणि श्रीशुकदेव अप्राकृत गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी अप्राकृत रासलीलाका वर्णन कर रहे हैं- श्रान्तः, सः (श्रीकृष्णः) श्रमं (क्रीड़ा-क्लान्तिम्) अपोहितुम् (अपनेतुम्) अङ्गसङ्गघृष्टस्रजः (अङ्गसङ्गेन घृष्टा सम्मर्दिता स्रक् कुन्दमाला तस्याः अतएव) कुचकुङ्कुमरञ्जितायाः (कुचकुङ्कुमेन रञ्जितायाः सम्बन्धिनिः) गन्धर्वपालिभिः (गन्धर्वपाः गन्धर्वपतयः इव गायन्ति ये अलयः तैः) अनुद्रुतः (अनुसृतः सन् ताभिः युतः) भिन्नसेतुः (विदारितवप्रः स्वयं भगवान् कृष्णस्तु अतिक्रान्तलोकमर्यादः) गजीभिः इभराट् (गजेन्द्रः इव) वाः (जलम्) आविशत्। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 25 ॥ समुद्रको यमुना समझकर महाप्रभुका उसमें कूदना और मूर्च्छा :- एइमत महाप्रभु भ्रमिते भ्रमिते। आइटोटा हैते समुद्र देखेन आचम्बिते ॥ 26 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने इस प्रकार भ्रमण करते-करते अकस्मात् आइटोटासे समुद्रको देखा ॥ 26 ॥ चन्द्रकान्त्ये उथलिल तरङ्ग उज्ज्वल। झलमल करे,-येन 'यमुनार जल' ॥ 27 ॥ यमुनार भ्रमे प्रभु धाञा चलिला। अलक्षिते याइ' सिन्धुजले झाँप दिला ॥ 28 ॥ पड़ितेइ हैल मूर्च्छा, किछुइ ना जाने। कभु डुबाय, कभु भासाय तरङ्गेर गणे ॥ 29 ॥ तरङ्गे बहिया फिरे,-येन शुष्क काष्ठ। के बुझिते पारे एइ चैतन्येर नाट ? ? 30 ॥ अनुवाद-चन्द्रमाकी कान्तिसे समुद्रकी उमड़ती हुई उज्ज्वल तरङ्गैं ऐसे झलमल कर रही थीं जैसे यमुनाका जल हो। महाप्रभु यमुनाके भ्रमसे समुद्रकी ओर दौड़ने लगे और बिना किसीके देखे उन्होंने समुद्रके जलमें छलाँग लगा दी। वे समुद्रके जलमें प्रविष्ट होनेके साथ ही मूर्च्छित हो गये, उन्हें कोई ज्ञान नहीं रहा कि वे कहाँ हैं? समुद्रकी लहरें महाप्रभुको कभी तो डुबो देती और कभी उन्हें ऊपर लाकर तैराने लगतीं। वे समुद्रकी लहरोंके साथ ऐसे बहते जा रहे थे, मानो वे सूखी लकड़ी हों। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी ऐसी लीलाको कौन समझ सकता है ? 27-30 ॥
[ 18/31-39 अठारहवाँ अध्याय 435 मूच्छित अवस्थामें बहते-बहते कोणार्ककी ओर जाना :- कोणार्केर दिके प्रभुरे तरङ्गे लञा याय। कभु डुबाञा राखे, कभु भासाञा लञा याय॥ 31॥ अनुवाद—समुद्रकी लहरें महाप्रभुको कोणार्ककी ओर ले जा रही थीं, कभी वे उन्हें डुबोकर और कभी उन्हें ऊपर बहाते हुए ले जा रही थीं॥ 31॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कोणार्क',—'अर्कतीर्थ', जिसे आजकल 'कोणारक' कहते हैं॥ 31॥ अनुभाष्य—'कोणार्क',—उत्तर-अक्षांश 19°53′ 25″; पुरीसे उन्नीस मील उत्तरमें समुद्रतटपर स्थित। तेरहवीं शक-शताब्दीके प्रारम्भमें इस स्थानपर वास्तुशिल्पकी निपुणताके उत्कृष्ट उदाहरणस्वरूप काले पत्थरके सूर्य-मन्दिरके निर्माणका प्रयास हुआ॥ 31॥ भावमें निमग्न गोपी-किङ्करी-अभिमानी महाप्रभुकी उद्घूर्णा :- यमुनाते जलकेलि गोपीगण-सङ्गे। कृष्ण करेन, महाप्रभु मग्न सेइ रङ्गे॥ 32॥ अनुवाद—'श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ यमुनामें जलकेलि कर रहे हैं'—महाप्रभु इसी लीलाके आनन्दमें निमग्न थे॥ 32॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 18/80-82 संख्या देखें॥ 32॥ श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना :- इँहा स्वरूपादिगण प्रभु ना देखिया। 'काँहा गेला प्रभु?' कहे चमकित हञा॥ 33॥ अनुवाद—इधर श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुको नहीं देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे,—'महाप्रभु कहाँ चले गये?' 33॥ निरङ्कुश इच्छाशक्तिके परिचालक महाप्रभुके प्रति स्वतन्त्र-ज्ञान :- मनोवेगे गेला प्रभु, देखिते नारिला। प्रभुरे ना देखिया संशय करिते लागिला॥ 34॥ मन-मनमें वितर्क :- 'जगन्नाथ देखिते, किंवा देवालये गेला? अन्य उद्याने किंवा उन्मादे पड़िला?? 35॥ गुण्डिचा-मन्दिरे गेला, किंवा नरेन्द्ररे? चटक-पर्वते गेला, किंवा कोणार्के??'36॥ अनुवाद—महाप्रभु मनके वेगसे चले गये, कोई उन्हें देख नहीं पाया। श्रीस्वरूप दामोदरादि महाप्रभुको नहीं देखकर कुछ संशय करते हुए कहने लगे,—'कहीं वे श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये मन्दिर तो नहीं गये हैं अथवा किसी अन्य उद्यानमें उन्मादग्रस्त होकर गिर पड़े हैं? क्या महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिरमें गये हैं या नरेन्द्र सरोवर गये हैं अथवा चटक पर्वतपर गये हैं या फिर कोणार्क तो नहीं चले गये हैं?' 34-36॥ समुद्रके तटपर गमन :- एत बलि' सबे फिरे प्रभुरे चाहिया। समुद्रेर तीरे आइला कतजन लञा॥ 37॥ महाप्रभुके नहीं मिलनेपर उनके अन्तर्धानका अनुमान :- चाहिये बेड़ाइते ऐछे रात्रि शेष हैल। 'अन्तर्धान हइला प्रभु',—निश्चय करिल॥ 38॥ मन-ही-मन भक्तोंके द्वारा अमङ्गलकी आशङ्का :- प्रभुर विच्छेदे कार देहे नाहि प्राण। अनिष्टाशङ्का बिना कार मने नाहि आन॥ 39॥ अनुवाद—ऐसा कहते हुए सभी भक्त महाप्रभुको ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर समुद्रके तटपर आ गये। महाप्रभुको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रात्रि समाप्त हो गयी और उन्होंने यह निश्चय किया,—'महाप्रभु अन्तर्धान हो गये हैं।' महाप्रभुके विरहमें सभीको लगा कि उनकी देहमें प्राण नहीं हैं। महाप्रभुके अनिष्टकी आशङ्काको छोड़कर किसीके मनमें अन्य कोई बात नहीं आ रही थी॥ 37-39॥
436 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/40-51 ] प्रियहृदयमें प्रियके अदर्शन-हेतु अमङ्गलकी आशङ्का :- अभिज्ञानशकुन्तल-नाटकके चतुर्थ अङ्कमें शकुन्तलाके प्रति प्रियम्वदा-वचन- अनिष्टाशङ्कीनि बन्धुहृदयानि भवन्ति हि ॥ 40 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बन्धुका हृदय सदैव बन्धुके अनिष्टकी आशङ्का करता है॥ 40 ॥ अनुभाष्य—मूलग्रन्थमें—"सिनेहो पावसङ्की" अथवा "सिनेहो पावमासङ्कादि"—ऐसा पाठ देखा जाता है॥ 40 ॥ सभीके द्वारा मिलकर महाप्रभुको ढूँढ़ना :- समुद्रेर तीरे आसि' युकति करिला। चिरायु-पर्वत-दिके कतजन गेला ॥ 41 ॥ अनुवाद—उन सबने समुद्रके तटपर आकर कुछ विचार-विमर्श किया। तब कुछ भक्त चिरायु-पर्वतकी ओर गये ॥ 41 ॥ अनुभाष्य—'चिरायु-पर्वत',—चटक-पर्वत ॥ 41 ॥ पूर्व दिशाय चले स्वरूप लञा कतजन। सिन्धु-तीरे-नीरे करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 42 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर पूर्व दिशाकी ओर चल दिये। वे महाप्रभुको समुद्रके तटपर और जलमें भी ढूँढ़ने लगे ॥ 42 ॥ विषादे विह्वल सबे, नाहिक 'चेतन'। तबु प्रेमे बुले करि' प्रभुर अन्वेषण ॥ 43 ॥ अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके विरह-दुःखसे ऐसे विह्वल हो रहे थे मानो उनकी चेतना लुप्त हो गयी हो। तो भी वे महाप्रभुके प्रेमके कारण उन्हें ढूँढ़ते हुए इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे॥ 43 ॥ अद्भुत-भावाविष्ट एक मछुवारेके साथ साक्षात्कार :- देखेन, एक जालिया आइसे कान्धे जाल करि'। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, बले 'हरि' 'हरि' ॥ 44 ॥ अनुवाद—तभी श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने देखा कि एक मछुवारा अपने कन्धेपर जाल डालकर आ रहा है। वह 'हरि', 'हरि' बोलते हुए कभी हँस रहा था, कभी रो रहा था, कभी नाच रहा था और कभी गा रहा था॥ 44 ॥ मछुवारेसे उसके भावावेशके कारणकी जिज्ञासा :- जालियार चेष्टा देखि' सबार चमत्कार। स्वरूप-गोसाञि तारे पुछेन समाचार ॥ 45 ॥ ग्रह-आविष्ट मछुवारेके द्वारा महाप्रभुके संवाद और उनकी अवस्थाका वर्णन :- "कह जालिया, एइ दिके देखिला एकजने? तोमार एइ दशा केने,—कह त' कारण??" 46 ॥ अनुवाद—उस मछुवारेके व्यवहारको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीस्वरूप दामोदरने उस मछुवारेसे जानकारी लेनेके लिये पूछा,—"हे मछुवारे ! बतलाओ तो, क्या तुमने इस तरफ किसी एक अकेले व्यक्तिको देखा है? तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है—इसका कारण तो बतलाओ?" 45-46 ॥ जालिया कहे,—"इँहा एक मनुष्य ना देखिल। जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल ॥ 47 ॥ बड़ मत्स्य बलि' आमि उठाइलुँ यतने। मृतक देखिते मोर भय हैल मने ॥ 48 ॥ जाल खसाइते तार अङ्ग-स्पर्श हइल। स्पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल ॥ 49 ॥ भये कम्प हैल, मोर नेत्रे बहे जल। गद्गद वाणी रोम उठिल सकल ॥ 50 ॥ किवा ब्रह्मदैत्य, किवा भूत, कहने ना याय। दर्शनमात्रे मनुष्येर पशे सेइ काय ॥ 51 ॥ अनुवाद—मछुवारेने कहा,—"मैंने यहाँ किसी अकेले मनुष्यको नहीं देखा, किन्तु जब मैंने समुद्रमें जाल
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक पाठ (transcription) प्रस्तुत है:
[ 18/47-62 अठारहवाँ अध्याय 437 फेंका तो एक मृत व्यक्ति मेरे जालमें आ गया। मैंने उसे बहुत बड़ी मछली समझकर बहुत परिश्रमसे बाहर निकाला, किन्तु मेरे मनमें मृत व्यक्तिको देखकर भय उत्पन्न हो गया। उस व्यक्तिको जालसे छुड़ाते समय मेरा उसके शरीरसे स्पर्श हो गया। स्पर्शमात्रसे वह भूत मेरे हृदयमें प्रविष्ट हो गया। मैं भयसे काँपने लगा, मेरे नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और मुझमें रोमाञ्च होने लगा। वह कोई ब्रह्म-दैत्य है अथवा कोई भूत, यह मैं कह नहीं सकता। दर्शन करने मात्रसे ही वह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश कर जाता है॥ 47-51 ॥ शरीर दीघल तार-हात पाँच-सात। एक हस्त पद तार, तिन तिन हात ॥ 52 ॥ अस्थि-सन्धि छुटि' चर्म करे नड़बड़े। ताहा देखि' प्राण कार नाहि रहे धरे ॥ 53 ॥ मड़ा रूप धरि' रहे उत्तान-नयन। कभु गोँ गोँ करे, कभु देखि अचेतन ॥ 54 ॥ साक्षात् देखेछौं, - मोरे पाइल सेइ भूत। मुइ मैले मोर कैछे जीवे स्त्री-पूत ॥ 55 ॥ सेइ त' भूतेर कथा कहन ना याय। ओझा ठाञि याइछौं, - यदि से भूत छोड़ाय ॥ 56 ॥ अनुवाद-उसका शरीर पाँच-सात हाथ लम्बा है, उसका एक-एक हाथ-पाँव तीन-तीन हाथ लम्बा है। उसकी हड्डियोंके जोड़ खुल गये हैं और उसकी त्वचा लटक गयी है। उसे देखकर कोई प्राण धारण नहीं कर सकता। उसने मरे हुए व्यक्तिकी भाँति रूप धारण किया हुआ है और उसके नेत्र ऊपर चढ़े हुए हैं। कभी तो वह गोँ-गोँ करता है और कभी अचेतन दिखायी देता है। मैंने उस भूतको साक्षात् रूपमें देखा है, वह भूत मेरे पीछे लग गया है। मेरे मरनेपर मेरी पत्नी और पुत्रका जीवन कैसे चलेगा? उस भूतकी बात कही नहीं जा सकती, मैं ओझाके पास जा रहा हूँ, हो सकता है वह मुझे भूतसे छुड़ा दे॥ 52-56 ॥ अनुभाष्य- 'जीवे',-बचेंगे ॥ 55 ॥ श्रीनृसिंह-स्मरणसे समस्त विपत्तियोंका विनाश :- एका रात्र्ये बुलि' मत्स्य मारिये निर्जने। भूत-प्रेत आमार ना लागे 'नृसिंह'-स्मरणे ॥ 57 ॥ एइ भूत नृसिंह-नामे चापये द्विगुणे। ताहार आकार देखिते भय लागे मने ॥ 58 ॥ ओथा ना याइह, आमि निषेधि तोमारे। ताँहा गेले सेइ भूत लागिबे सबारे ॥ "59 ॥ अनुवाद-मैं अकेला ही रात्रिमें घूमकर निर्जन स्थानपर मछलियोंको मारता हूँ। मुझे श्रीनृसिंह भगवान्के स्मरणके प्रभावसे भूत-प्रेत आदि नहीं लगते। किन्तु यह भूत नृसिंह भगवान्का नाम लेनेसे मुझे दो गुणा अधिक बलसे दबाता है। उसका आकार देखते ही मनमें भय हो जाता है। मैं आप लोगोंको भी मना कर रहा हूँ कि आप उधर मत जाना। वहाँ जानेपर आप सब लोगोंपर भी वह भूत चढ़ जायेगा ॥ "57-59 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके सन्धान-प्राप्तिके विषयमें यथार्थ अनुमान :- एत शुनि' स्वरूप-गोसाञि सब तत्त्व जानि'। जालियारे किछु कय सुमधुर वाणी ॥ 60 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको आश्वासन और उसके भयको दूर करना :- “आमि-बड़ ओझा, जानि भूत छोड़ाइते।” मन्त्र पड़ि' श्रीहस्त दिला ताहार माथाते ॥ 61 ॥ तिन चापड़ मारि' कहे, - "भूत पलाइल। भय ना पाइह" बलि' सुस्थिर करिल ॥ 62 ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर सब कुछ समझ गये और उन्होंने मछुवारेको अत्यन्त मधुर वाणीसे कहा, - "मैं एक बहुत बड़ा ओझा हूँ, मैं भूत
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छुड़ाना जानता हूँ।” ऐसा कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने मन्त्र पढ़कर अपने श्रीहस्तको उस मछुवारेके सिरपर रख दिया। तब उन्होंने उस मछुवारेको तीन थप्पड़ लगानेके बाद कहा,—“तुम्हारा भूत भाग गया है। अब डरनेकी कोई बात नहीं है।” ऐसा कहकर उन्होंने मछुवारेको सुस्थिर किया॥ 60-62 ॥
एके प्रेम, आरे भय—द्विगुण अस्थिर। भय-अंश गेल,—से हैल किछु धीर ॥ 63 ॥
अनुवाद—मछुवारेमें एक तो प्रेम, उसपर भी भय—इसलिये पहले वह दोगुना अस्थिर था। अब उसका भयवाला अंश तो दूर हो गया, इसलिये उसको कुछ धैर्य आ गया ॥ 63 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका परिचय देना :— स्वरूप कहे,—“याँरे तुमि कर ‘भूत’-ज्ञान। भूत नहे, तेंहो—कृष्णचैतन्य भगवान् ॥ 64 ॥ प्रेमावेशे पड़िला तेंहो समुद्रेर जले। ताँरे तुमि उठाइला आपनार जाले ॥ 65 ॥ ताँर स्पर्शे हैल तोमार कृष्णप्रेमोदय। भूत-प्रेत-ज्ञाने तोमार हैल महाभय ॥ 66 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको महाप्रभुको दिखलानेका आदेश :— एबे भय गेल, तोमार मन हैल स्थिरे। काँहा ताँरे उठाञाछ, देखाह आमारे ॥”67॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने मछुवारेसे कहा,—“जिन्हें तुम भूत मान रहे हो, वे भूत नहीं अपितु वे भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य हैं। वे प्रेमके आवेशमें समुद्रके जलमें जा पड़े थे, तुमने उन्हींको अपने जालमें पकड़कर उठाया है। उनके स्पर्शसे ही तुममें कृष्णप्रेम उदित हुआ है। उन्हें भूत-प्रेत समझनेके कारण तुम्हें बहुत भय लगा। अब तुम्हारा भय दूर हो गया है और तुम्हारा मन स्थिर हो गया है। अब तुम हमें दिखलाओ कि तुमने उन्हें समुद्रसे निकालकर कहाँ रखा है॥” 64-67॥
बुद्धिविभ्रम :— जालिया कहे,—“प्रभुरे देख्याछौं बारबार। तेंहो नहेन एइ अतिविकृत आकार ॥”68॥
अनुवाद—मछुवारेने कहा,—“मैंने महाप्रभुको अनेक बार देखा है। ये वे नहीं हैं, यह तो कोई बहुत-ही विकृत-आकारका व्यक्ति है॥”68॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके प्रेमका वर्णन :— स्वरूप कहे,—“ताँर हय प्रेमेर विकार। अस्थि-सन्धि छाड़े, हय अति दीर्घकार ॥”69॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“महाप्रभुमें प्रेमका विकार उत्पन्न होता है, उसी कारण उनकी हड्डियोंके जोड़ खुल जाते हैं और वे बहुत दीर्घकार हो जाते हैं॥”69॥
मछुवारेके द्वारा सभीको महाप्रभुके दर्शन करवाना; महाप्रभुकी अवस्था :— शुनि’ सेइ जालिया आनन्दित हइल। सबा लञा गेल, महाप्रभुरे देखाइल ॥ 70 ॥ भूमिते पड़िया आछेन दीर्घ सब काय। जले श्वेत-तनु, बालु लाग्याछे गाय ॥ 71 ॥ अतिदीर्घ शिथिल तनु-चर्म नट्काय। दूर पथ उठाञा आनन ना याय ॥ 72 ॥
अनुवाद—यह सुनकर मछुवारा आनन्दित हो गया। उसने सभी भक्तोंको ले जाकर महाप्रभुके दर्शन करवाये। महाप्रभु भूमिपर पड़े हुए थे, उनका शरीर बहुत लम्बा हो गया था। बहुत समय तक जलमें रहनेके कारण उनका शरीर सफेद पड़ गया था और उनके पूरे शरीरपर बालू लगी हुई थी। महाप्रभुकी देह बहुत लम्बी हो गयी थी और शिथिल होकर त्वचा लटक गयी थी, इसलिये उन्हें बहुत दूर तक उठाकर नहीं लाया जा सकता था॥ 70-72 ॥
[ 18/73-82 अठारहवाँ अध्याय 439
महाप्रभुको चेतनावस्थामें लानेके लिये बहुत प्रयत्न और सेवा :- आर्द्र कौपीन दूर करि' शुष्क पराञा। बहिर्वासे शोयाइला बालुका छाड़ाञा ॥ 73 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके गीले कौपीनको उतारकर सूखा कौपीन बाँध दिया, उन्होंने महाप्रभुकी देहसे बालूको हटाकर उन्हें बहिर्वास वस्त्रपर लिटा दिया ॥ 73 ॥
सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन :- सबे मेलि' उच्च करि' करेन सङ्कीर्त्तने। उच्च करि' कृष्णनाम कहेन प्रभुर काणे ॥ 74 ॥
अनुवाद-सभी भक्त मिलकर उच्च स्वरमें सङ्कीर्तन करने लगे। वे सभी उच्च स्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका कीर्तन करने लगे ॥ 74 ॥
महाप्रभुका अर्द्धबाह्यदशामें आगमन :- कतक्षणे प्रभुर काणे शब्द परशिल। हुङ्कार करिया प्रभु तबहिँ उठिल ॥ 75 ॥ उठितेइ अस्थि सब लागिल निज-स्थाने। 'अर्द्धबाह्ये', इति-उति करेन दरशने ॥ 76 ॥
अनुवाद-कुछ देरमें महाप्रभुके कानमें कृष्णनाम प्रविष्ट हुआ, तभी महाप्रभु हुङ्कार करते हुए उठ खड़े हुए। उठते ही उनकी सब हड्डियाँ अपने-अपने स्थानपर जुड़ गयी, वे अर्द्धबाह्य दशामें इधर-उधर देखने लगे ॥ 75-76 ॥
महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय :- तिन-दशाय महाप्रभु रहेन सर्वकाल। 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा', 'अर्द्धबाह्य' आर ॥ 77 ॥
अनुवाद-महाप्रभु सब समय 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा' और 'अर्द्धबाह्यदशा'-इन तीनों दशाओंमेंसे किसी-न-किसी एक दशामें रहते ॥ 77 ॥
स्वयंको गोपियोंकी दासी माननेवाले महाप्रभुकी अर्द्धबाह्य-दशाका वर्णन (चित्रजल्प) :- अन्तर्दशार किछु घोर, किछु बाह्य-ज्ञान। सेइ दशा कहेन भक्त 'अर्द्धबाह्य' नाम ॥ 78 ॥
अनुवाद-जब अन्तर्दशाकी प्रबलता रहती है और कुछ-कुछ बाह्य ज्ञान भी होता है, तो भक्त लोग उस दशाको 'अर्द्धबाह्य' दशा कहते हैं ॥ 78 ॥
'अर्द्धबाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप-वचने। आभासे कहेन प्रभु, शुनेन भक्तगणे ॥ 79 ॥ “कालिन्दी देखिया आमि गेलाङ वृन्दावन। देखि, - जलक्रीड़ा करेन व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 80 ॥ राधिकादि गोपीगण-सङ्गे एक मेलि'। यमुनार जले महारङ्गे करेन केलि ॥ 81 ॥ तीरे रहिं' देखि आमि सखीगण-सङ्गे। एकसखी सखीगणे देखाय सेइ रङ्गे ॥ 82 ॥
अनुवाद-महाप्रभु उस अर्द्धबाह्य दशामें प्रलापपूर्ण वचन कहने लगे। महाप्रभु मन्द वाणीसे कहने लगे और भक्तगण उन्हें ध्यानसे श्रवण करने लगे। [मञ्जरी भावमें विभावित] महाप्रभुने कहा, - “मैं कालिन्दीको (यमुनाको) देखकर वृन्दावन गयी थी, मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण कालिन्दीमें जल-क्रीड़ा कर रहे थे। वे श्रीराधिका आदि गोपियोंके साथ मिलकर यमुनाके जलमें महा-आनन्दसे क्रीड़ा कर रहे थे। मैं तटपर रहकर सखियोंके (मञ्जरियोंके) साथ वह क्रीड़ा देख रही थी। उनमें-से एक सखी अन्य सखियोंको श्रीकृष्णके साथ श्रीराधादि गोपियोंकी लीलाके आनन्दका वर्णन कर रही थी।॥ 79-82 ॥
अनुभाष्य-'अपनी-अपनी यूथेश्वरीके सेवानन्द-सुखमें तत्पर मैं और मेरी जैसी अन्यान्य नवीन लाल्य किङ्करियाँ (मञ्जरियाँ)'-इस वाक्यके द्वारा आत्मेन्द्रिय सम्भोगकी वाञ्छाके उद्देश्यसे साधकके लिये अहंग्रहोपासना
440 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/82-87 ] निषिद्ध हुई है; मध्यलीला 8/202-204 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 82 ॥ स्वयंको गोपियोंकी दासी जानकर महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकी श्रीराधादि गोपियोंके साथ जलक्रीड़ाका वर्णन (चित्रजल्प) :— यथा राग— पट्टवस्त्र, अलङ्कारे, समर्पिया सखी करे, सूक्ष्म-शुक्लवस्त्र परिधान। कृष्ण लञा कान्तागण, कैला जलावगाहन, जलकेलि रचिला सुठाम ॥ 83 ॥ अनुवाद—[श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा कर रही] गोपियोंने अपने रेशमी वस्त्र और अलङ्कार तटपर खड़ी सखियोंके (मञ्जरियोंके) हाथोंमें सौंपकर स्वयं सूक्ष्म श्वेत वस्त्र पहन लिये। तब श्रीकृष्णने कान्ताओंको अपने साथ लेकर जलमें प्रवेश किया और अत्यन्त सुन्दर जलकेलि की ॥ 83 ॥ सखि हे, देख कृष्णेर जलकेलि रङ्गे। कृष्ण—मत्त करिवर, चञ्चल कर-पुष्कर, गोपीगण करि' निज सङ्गे ॥ 84 ॥ ध्रु॥ आरम्भिला जलकेलि, अन्योऽन्ये जल फेलाफेली, हुड़ाहूड़ि, वर्षे जलधार। सबे जय-पराजय, नाहि किछु निश्चय, जलयुद्ध बाड़िल अपार ॥ 85 ॥ अनुवाद—हे सखियों! श्रीकृष्णकी आनन्दमयी जलकेलिको देखो। मत्त गजराजकी भाँति श्रीकृष्णने गोपियोंको अपने साथ लेकर अपने चञ्चल हस्तरूपी कमलके द्वारा जलकेलि आरम्भ की है। श्रीकृष्ण और गोपियाँ एक-दूसरेके ऊपर जल उड़ेल रहे हैं और उनमें होड़ लग गयी है। उस होड़में जलकी बड़ी धाराओंका वर्षण हो रहा है, इस कारण किसकी जय हो रही है, किसकी पराजय—कुछ भी निश्चित नहीं हो पा रहा है। इस जलक्रीड़ामें जल उड़ेलनाका युद्ध अपार बढ़ गया है ॥ 84-85 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'करपुष्कर',—करकमल; (मतान्तरमें सूँडका अग्रभाग) ॥ 84 ॥ वर्षे स्थिर तड़िद्घन, सिञ्चे श्याम नवघन, घन वर्षे तड़ित्-उपरे। सखीगणेर नयन, तृषित चातकीगण, सेइ अमृत सुखे पान करे ॥ 86 ॥ अनुवाद—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे। प्यासे चातककी (पपीहेकी) भाँति मञ्जरियोंके नयन उस अमृतका सुखपूर्वक पान कर रहे थे ॥ 86 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे ॥ 86 ॥ प्रथमे युद्ध 'जलाञ्जलि', तबे युद्ध 'कराकरिं', तार पाछे युद्ध 'मुखामुखि'। तबे युद्ध 'हृदाहृदि', तबे हैल 'वादावादि', तबे हैल युद्ध 'नखानखि' ॥ 87 ॥ अनुवाद—पहले एक दूसरेपर जल फेंकते हुए युद्ध प्रारम्भ हुआ, उसके बाद हाथसे हाथका युद्ध होने लगा, फिर वह मुखसे मुखके युद्धमें परिवर्तित हो गया। तब हृदय-हृदयमें युद्ध होने लगा, फिर युद्धने वाद-विवादका रूप धारण किया और फिर नखसे नखका युद्ध होने लगा ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'रदा-रदि' ॥ 87 ॥
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[ 18/88–91 अठारहवाँ अध्याय 441 ] सहस्र-करे जल-सेके, सहस्र-नेत्रे गोपी देखे, सहस्रपाद निकटे गमने। सहस्रमुख-चुम्बने, सहस्रवपु-सङ्गमे, गोपीमर्म सुने सहस्र-काणे॥ 88॥ अनुवाद—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो श्रीकृष्ण सैंकड़ों हाथोंसे जल उड़ेल रहे हैं, सैंकड़ों नेत्रोंसे गोपियोंको देख रहे हैं, सैंकड़ों पदोंसे उनके निकट जा रहे हैं, सैंकड़ों मुखोंसे उनका चुम्बन कर रहे हैं, सैंकड़ों शरीरोंसे गोपियोंके साथ सङ्गम कर रहे हैं और सैंकड़ों कानोंसे गोपियोंके हास-परिहासको श्रवण कर रहे हैं॥ 88॥ अमृताणुकणा—"सहस्रपाद निकटे गमन",—सहस्रपाद अर्थात् सूर्य; सिञ्चित जलके अतिवेगके कारण सूर्यके निकट अर्थात् बहुत ऊँचा जाना। पाठान्तरमें "सहस्र-पदे निकटे गमन"। यहाँ 'सहस्र'का अर्थ असंख्य है। श्रीकृष्ण और गोपियोंके जलयुद्धके छलसे प्रेमात्मक मिलनमें परस्परके असीम अनुरागके प्रकाशरूपमें 'सहस्र'-शब्दका व्यवहार हुआ है, जैसे, "तुण्डे ताण्डविनी-रतिं वितनुते तुण्डावली लब्धये" (विदग्धमाधव) अर्थात् "जब ये (कृष्ण—ये दो अक्षर) मुखमें (जिह्वापर) नृत्याङ्गनाकी भाँति नृत्य करते हैं, तब अनेकानेक मुख पानेकी अपूर्व लालसा होती है।"॥ 88॥ कृष्ण राधा लञा बले, गेला कण्ठलग्न-जले, छाड़िला ताँहा, याँहा अगाध पानी। तेंहो कृष्णकण्ठ धरि', भासे जलेर उपरि, गजोद्घाते यैछे कमलिनी॥ 89॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण बलपूर्वक श्रीराधाको अन्य एक स्थानपर ले गये जहाँपर श्रीराधाके कण्ठ तक जल था। फिर श्रीकृष्णने श्रीराधाको वहाँ छोड़ दिया जहाँपर अगाध जल था। श्रीराधा श्रीकृष्णके कण्ठको पकड़कर जलके ऊपर ऐसे तैरने लगीं जैसे जलमें निमग्न हाथीकी सूँडके द्वारा उखाड़ी हुई कमलिनी जलपर तैरती है॥ 89॥ यत गोपसुन्दरी, कृष्ण तत रूप धरि', सबार वस्त्र करिला हरणे। यमुना-जल निर्मल, अङ्ग करे झलमल, सुखे करे कृष्ण दरशने॥ 90॥ अनुवाद—जितनी गोप-सुन्दरियाँ थी, श्रीकृष्णने उतने ही रूप धारण करके जलके भीतर ही उन सबके वस्त्रोंका हरण कर लिया। यमुनाजीका जल निर्मल स्वच्छ होनेके कारण श्रीकृष्ण आनन्दपूर्वक गोपियोंके झलमल कर रहे अङ्गोंके दर्शन करने लगे॥ 90॥ पद्मिनीलता-सखीचय, कैल कारो सहाय, तार हस्ते पत्र समर्पिल। केह मुक्त-केशपाश, आगे कैल अधोवास, हस्ते केह कञ्चुलि धरिल॥ 91॥ अनुवाद—कमलकी नाल गोपियोंकी सखियाँ हैं और सखीके रूपमें सहायता करते हुए उन्होंने किसी-किसी गोपीके हाथमें उनके अङ्गोंको ढकनेके लिये जलके ऊपर तैरते अपने बड़े-बड़े पत्ते दिये। कुछ गोपियोंने अपने केशोंको खोलकर उन्हें अधोवासकी (लहँगेकी) भाँति व्यवस्थित किया और अन्य कुछ गोपियोंने अपने हाथोंको वक्षःस्थलको ढकनेवाली चोलीके रूपमें उपयोग किया॥ 91॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग आवरणके लिये हाथरूपी कमलका पत्ता; किसीने केशोंको खोलकर लहँगेके जैसी रचना की; किसी-किसीने हाथोंको 'चोली' बना लिया॥ 91॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वस्तिके काँचुली रचिलं॥ 91॥ अमृताणुकणा—जलमें तैरती हुई कमल-नालने सखीरूपमें सहायताके लिये किसी-किसी गोपीके हाथोंमें पत्ते समर्पित किये, उसके द्वारा उन्होंने वक्षके आवरणकी रचना की। किसीने केश खोलकर अपने आगे उनका
442 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/91-98 ] विस्तार करके लहँगेका निर्माण किया, किसी किसीने अपने हाथोंको 'चोली'के अर्थात् वक्षके आवरणरूपमें धारण किया॥91॥ कृष्णोर कलह राधा-सने, गोपीगण सेइक्षणे, हेमाब्ज-वने गेला लुकाइते। आकण्ठ-वपु जले पशे, मुखमात्र जले भासे, पद्मे-मुखे ना पारि चिन्ते॥92॥ अनुवाद—फिर श्रीकृष्णका श्रीराधाके साथ प्रेम-कलह हुआ, तब अन्य सब गोपियाँ स्वर्ण-कमलके समूहमें जाकर छिप गयीं। कण्ठ तक उनका शरीर जलमें डूबा हुआ था, केवल उनका मुख ही स्वर्ण कमलोंके साथ जलके ऊपर तैर रहा था। उन गोपियोंके मुखोंकी स्वर्ण-कमलोंसे पृथक् पहचान ही नहीं हो रही थी॥92॥ एथा कृष्ण राधा-सने, कैला ये आछिल मने, गोपीगणे अन्वेषिते गेला। तबे राधा सूक्ष्ममति, जानिया सखीर स्थिति, सखीमध्ये आसिया मिलिला॥93॥ अनुवाद—इधर, श्रीकृष्णने श्रीराधाके साथ एकान्तमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा की। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अन्यान्य गोपियोंको ढूँढ़ने लगे। श्रीराधा तीक्ष्ण बुद्धिवाली हैं, इसलिये उन्हें सखियोंकी स्थितिका सहज ही पता लग गया और वे तुरन्त सखियोंके बीचमें आकर मिल गयीं॥93॥ यत हेमाब्ज जले भासे, तत नीलाब्ज तार पाशे, आसि' आसि' करये मिलन। नीलाब्जे हेमाब्जे ठेके, युद्ध हय प्रत्येके, कौतुके देखे तीरे गोपीगण॥94॥ अनुवाद—जितने स्वर्णकमल जलके ऊपर तैर रहे थे, उतने ही नीलकमल उनके पास आ-आकर उनसे मिल रहे थे। नीलकमलसे स्वर्णकमलके टकरानेपर प्रत्येकमें युद्ध हुआ। यमुनाके तटपर खड़ी हुई मञ्जरियाँ इस कौतुकको देखने लगीं॥94॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हेमाब्ज',—गोपी; 'नीलाब्ज',—कृष्ण; सेवापरायणा गोपियाँ तटपर खड़ी होकर दोनोंकी क्रीड़ा देखने लगीं॥94॥ चक्रवाक-मण्डल, पृथक् पृथक् युगल, जल हैते करिल उद्गम। उठिल पद्ममण्डल, पृथक् पृथक् युगल, चक्रवाके कैल आच्छादन॥95॥ उठिल बहु रक्तोत्पल, पृथक् पृथक् युगल, पद्मगणेर कैल निवारण। 'पद्म' चाहे लुटि' निते, 'उत्पल' चाहे राखिते, 'चक्रवाक लागि' दुँहार रण॥96॥ पद्मोत्पल-अचेतन, चक्रवाक-सचेतन, चक्रवाके पद्म आस्वादय। इँहा दुँहार उलटा स्थिति, धर्म हैल विपरीत, कृष्णेर राज्ये ऐछे अन्याय हय॥97॥ मित्रेर मित्र सहवासी, चक्रवाके लुटे आसि', कृष्णेर राज्ये ऐछे व्यवहार। अपरिचित शत्रुर मित्र, राखे उत्पल,—ए बड़ चित्र, एइ बड़ 'विरोध-अलङ्कार'॥98॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य एवं अनुभाष्य देखें॥95-98॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके स्तन-चक्रवाक (एक प्रकारका जलपक्षी) मण्डल हैं; सभी जब पृथक् पृथक् युगलस्वरूपमें जलसे उठे, उस समय पृथक् पृथक् कृष्णके नीलकमलस्वरूप दोनों हाथोंने चक्रवाकोंका आच्छादन किया। गोपियोंके हाथ—रक्तकमल (लालकमल) हैं; वे युगल-युगल (दो-दो) उठकर नीलकमलोंको रोकने लगे। नीलकमल चक्रवाकोंको लूटना चाहते थे और रक्तकमल उनकी रक्षा करना चाहते थे, इसलिये दोनोंमें विवाद होने लगा। नीलकमल और रक्तकमल—प्रेममें