भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2445

428 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 17/58-65 ] श्रीमतीकी श्रीकृष्ण-परतन्त्रता :- “मन मोर वाम-दीन, जल बिना येन मीन, कृष्ण बिना क्षणे मरि' याय। मधुर हास्य वदने, मन-नेत्र-रसायने, कृष्णतृष्णा द्विगुण बाड़ाय ॥ 59 ॥ अनुवाद—तभी अन्य समस्त भावोंरूपी सेनाको परास्त करके औत्सुक्य (उत्सुकता) भाव प्रधान हो गया और वह उनके अपने राज्यरूपी मनमें उदित हुआ। औत्सुक्यके कारण श्रीराधा मनमें श्रीकृष्ण प्राप्तिकी लालसासे अवश हो गयीं, इसी दुःखसे वे मनमें अपनी भर्त्सना करने लगीं,–“वाम्य-स्वभावके कारण मेरा मन दीन हो रहा है, श्रीकृष्णके बिना यह जलके बिना मछलीके समान एक क्षणमें ही मर जायेगा। किन्तु दूसरी ओर मैं जब श्रीकृष्णका दर्शन करती हूँ तो उनका मधुर हास्यसे युक्त मुखमण्डल, जो मन और नेत्रोंके लिये रसायनस्वरूप है, उनको प्राप्त करनेकी तृष्णाको दोगुना बढ़ा देता है॥ 58-59॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वाम-दीन’,—वाम्यभावप्रयुक्त दीन; मन और नेत्रके रसायनस्वरूप मधुरहास्य मुखवाले कृष्णमें दोगुनी तृष्णाको बढ़ाता है॥ 59 ॥ श्रीकृष्णविरहमें विलाप :- हाहा कृष्ण प्राणधन, हाहा पद्मलोचन, हाहा दिव्य सद्गुण-सागर। हाहा श्यामसुन्दर, हाहा पीताम्बरधर, हाहा रासविलास नागर !॥60॥ विरहिणी राधाके भावमें महाप्रभुका दौड़ना :- काँहा गेले तोमा पाइ, तुमि कह,–ताँहा याइ,” एत कहि' चलिला धाञा। स्वरूप उठि' कोले करि', प्रभुरे आनिल धरि', निज स्थाने बसाइला निया॥ 61॥ अनुवाद—राधाभावमें आविष्ट महाप्रभु श्रीकृष्णके विरहमें विलाप करते हुए कहने लगे,—“हा हा प्राणधन कृष्ण! हा हा कमलनयन! हा हा दिव्य सद्गुण-सागर! हा हा श्यामसुन्दर! हा हा पीताम्बरधारी! हा हा रासविलास नागर! तुम ही बताओ कि कहाँ जानेसे तुम मुझे मिलोगे, मैं वहीं चली जाऊँगी।” महाप्रभु यह कहकर दौड़ने लगे। श्रीस्वरूप दामोदरने उठकर महाप्रभुको पकड़कर गोदमें ले लिया और उन्हें वापस लाकर उनके स्थानपर बैठा दिया॥ 60-61॥ श्रीस्वरूपकी चेष्टासे चेतनताकी प्राप्ति; श्रीस्वरूपके द्वारा भावोपयोगी-गान :- क्षणेके प्रभुर बाह्य हैला, स्वरूपेरे आज्ञा दिला, “स्वरूप, किछु कर मधुर गान।” स्वरूप गाय विद्यापति, गीतगोविन्द-गीति, शुनि' प्रभुर जुड़ाइल काण॥ 62॥ अनुवाद—महाप्रभु अचानक बाह्यदशामें आ गये और उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरको कहा,—“हे स्वरूप! कुछ मधुर गान सुनाओ।” श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीविद्यापति द्वारा रचित गीत और श्रीगीतगोविन्दकी गीतिका गान किया। गान सुनकर महाप्रभुके कान शीतल हो गये॥ 62॥ महाप्रभुके दिव्योन्मादादि महाभाव—मर्त्यबुद्धिके द्वारा उन्हें समझना असम्भव :- एइमत महाप्रभु प्रतिरात्रि-दिने। उन्माद-चेष्टित हय प्रलाप-वचने॥ 63॥ अनुवाद—इस प्रकार प्रति रात-दिन महाप्रभुकी चेष्टाएँ उन्मादग्रस्त व्यक्तिकी भाँति होतीं और प्रलापमय वचन होते॥ 63॥ एकदिने यत हय भावेर विकार। सहस्र मुखेते वर्णे यदि, नाहि पाय पार॥ 64॥ जीव दीन कि करिबे, ताहार वर्णन। शाखा-चन्द्र-न्याय करि' दिग्दर्शन॥ 65॥ अनुवाद—महाप्रभुमें एक ही दिनमें जितने भावोंके